एक साल बाद-एकदम से ट्रेन रुकी और मेरा बेटा उतरा। आते ही उसने मेरे पैर छुए। और मुझ मूर्ख को समझ ही नहीं आया कि क्या करूं। मैं स्तब्ध खड़ा रहा। तीन महीने बच्चे से युवा का सफर कैसे निकल गया। और मैं देख भी न पाया। फिर दूसरे ही दिन से राकेश नौकरी ढूंढऩे लग गया। उसे मिलेगी। जरूर मिलेगी। क्योंकि नहीं मिलेगी। आखिर उसने बीएससी पास की है। बिल्कुल मिलनी चाहिए। वो थोड़ा परेशान रहने लगा है, मैं नहीं। मुझे यकीन है कि उसे नौकरी मिलेगी। मैं बिल्कुल भी चिंतित नहीं हूं। आज नहीं तो कल तो अवश्य ही उसे नौकरी मिल जाएगी। आखिर इतने सालों का संघर्ष हमारा व्यर्थ थोड़े ही जाएगा व ऊपर वाले के यहां देर है अंधेर थोड़े ही है। वह हमारे लिए भी कुछ करेगा। लेकिन अब कर ही दे। आंखों में मोतियाबिंद हो गया है। आंखें पूरी सफेद हों उससे पहले राकेश की नौकरी तो देख लूं। दिन से महीने हो गए हैं अब तो मुंबा देवी नौकरी तो दिला दें ये प्रार्थना कर सोच ही रहा था कि एक आवाज आई। बेहतरीन ऑफर, लाजवाब ऑफर। मुंबई में पहली बार 10 रुपए के पांच पेन। जी हां 10 के पांच पेन। एक बार लीजिए और पांच साल तक लिखिए। उस सख्श की आवाज में जोश था। जो शुरू में मेरी आवाज में हुआ करता था। मेरी अंदर जिज्ञासा जागृत हुई कि ये सख्श कौन है। भीड़ में से दूसरी तरफ देखा तो राकेश खड़ा पेन बेच रहा था। एकदम से चक्कर आया मैं और हमारे सपने कट गये….
Saturday, 15 October 2011
दस के चार
एक साल बाद-एकदम से ट्रेन रुकी और मेरा बेटा उतरा। आते ही उसने मेरे पैर छुए। और मुझ मूर्ख को समझ ही नहीं आया कि क्या करूं। मैं स्तब्ध खड़ा रहा। तीन महीने बच्चे से युवा का सफर कैसे निकल गया। और मैं देख भी न पाया। फिर दूसरे ही दिन से राकेश नौकरी ढूंढऩे लग गया। उसे मिलेगी। जरूर मिलेगी। क्योंकि नहीं मिलेगी। आखिर उसने बीएससी पास की है। बिल्कुल मिलनी चाहिए। वो थोड़ा परेशान रहने लगा है, मैं नहीं। मुझे यकीन है कि उसे नौकरी मिलेगी। मैं बिल्कुल भी चिंतित नहीं हूं। आज नहीं तो कल तो अवश्य ही उसे नौकरी मिल जाएगी। आखिर इतने सालों का संघर्ष हमारा व्यर्थ थोड़े ही जाएगा व ऊपर वाले के यहां देर है अंधेर थोड़े ही है। वह हमारे लिए भी कुछ करेगा। लेकिन अब कर ही दे। आंखों में मोतियाबिंद हो गया है। आंखें पूरी सफेद हों उससे पहले राकेश की नौकरी तो देख लूं। दिन से महीने हो गए हैं अब तो मुंबा देवी नौकरी तो दिला दें ये प्रार्थना कर सोच ही रहा था कि एक आवाज आई। बेहतरीन ऑफर, लाजवाब ऑफर। मुंबई में पहली बार 10 रुपए के पांच पेन। जी हां 10 के पांच पेन। एक बार लीजिए और पांच साल तक लिखिए। उस सख्श की आवाज में जोश था। जो शुरू में मेरी आवाज में हुआ करता था। मेरी अंदर जिज्ञासा जागृत हुई कि ये सख्श कौन है। भीड़ में से दूसरी तरफ देखा तो राकेश खड़ा पेन बेच रहा था। एकदम से चक्कर आया मैं और हमारे सपने कट गये….
Monday, 14 February 2011
हमारा भी
विनती - हैप्पी वेलंटाइन डे।प्रयास - हैप्पीजी तो सिंह थे, वेलंटाइन कब से हो गए?
Monday, 31 January 2011
मैं क्यों हार मानूं
मैं क्यों हार मानूं।मैं अभी हारा नहीं हूं।।
सूर्य में रोशनी है बाकी।
शरीर में रक्त बहाव है बाकी।।
मैं क्यों हार मानूं।
मैं अभी हारा नही हूं ।।
चंद्रमा में चमक है बाकी।
पैरों में चाल है बाकी।।
मैं क्यों हार मानूं ।
मैं अभी हारा नही हूं ।।
पृथ्वी में गति है बाकी।
मुझ में धैर्य है बाकी।।
मैं क्यों हार मानूं........
Monday, 15 November 2010
देंगे ना?
आदरणीय परम पूज्यनीय देवो के देव महादेव को मै नेत्रहीन शंकर शत्त शत्त प्रणाम करता हूँ। काफी समय से आप को पत्र लिखने का सोच रहा था पर हिम्मत ही नही हुई । डर लगता था की जन्म लेने की गलती पर तो आप ने नेत्र खुलने से पहले ही बंद कर दिये कही कुछ और गलती कर दी तो ना जाने क्या दंड देंगे । पर अब डर नही लगता क्यों की अब समझ गया हूँ की नेत्रहीन से बड़ी सज़ा शायद नही हो सकती। आप ये कदापि ना समझे की यह पत्र आप की इस कृति की आलोचना करने के लिए लिख रहा हूँ क्यों की ना मुझ में क्षमता है ना इच्छा है।बस छोटा सा अनुरोध है की देश मै करोड़ो बच्चो के पास रोटी तक नही है सम्पूर्ण आहार ,स्वस्थय व शिक्षा की कल्पना तो करते ही नही है। इसलिए कृपा निधान कुछ कीजिये एक रोटी का अधिकार तो दीजिये या आप भी हमे आधा अधुरा (कईयों को अंग नही और अधिकतरो की किस्मत नही) बना के भूल गये जैसे चुने हुए लोग हमें भूल गये और व्यस्त हो गये करोड़ो कमाने में कोई खेल के नाम पर कमा रहा है ,कोई शहीदों की विधवाओ की ज़मीं पर इमारते बना के और कोई करोडो की बईमानी कर के राजा बन रहा है और जनता गुलाम जो गरीब से गरीब होती जा रही है। फिर कैसे हर दिन देश विकास दर पार कर रहा है जहाँ लाखो में किसान मर रहें है लाखो मै बेरोजगार घुट रहें है करोड़ो भूखे इन्सान सो रहें है, उस देश मै सेव टाइगर का नारा बुलंद हो रहा है।शंकर
Friday, 5 November 2010
दिवाली
विद्या का प्रसार है दिवाली।कल्पनाओ की उड़ान है दिवाली।।
क्षमताओ का विश्लेषण है दिवाली।।
उम्मीदों की किरण है दिवाली।
बदमाशी का मैदान है दिवाली।।
अपनों का मिलन है दिवाली।।।
Tuesday, 12 October 2010
कौन
मम्मी सो रहा हू ,गुड नाईटगुड नाईट अददु
आदित्य सो रहें हो
हाँ
कब तक सोगे ?
ओह बाउजी सोने दो ना क्यों नींद खराब कर रहें हो ।
अच्छा आप की नींद खराब हो रही है यहाँ हमारा बलिदान व्यर्थ हो रहा है।
हद है, तमीज़ से बात कर रहा हूँ तो सर पे चढ़ रहें हो।
मम्मी भी किसी को भी नौकर रख लेती है।
सुनो अगर रूम से अभी नही गये तो मै अभी के अभी काम से निकाल बाहर करूंगा ।फिर चाहें कितना भी रो नही रखूंगा, समझ जाओ और रूम से बाहर निकलो और दरवाज़ा बंद कर के जाना।
आदित्य कौन सा दरवाज़ा? ये लकड़ी का दरवाज़ा तो मै बंद करदूंगा पर तुम्हारे मस्तिष्क का दरवाज़ा कौन खोलेगा?
यही प्रॉब्लम है तुम नौकरों के साथ इज्ज़त दे दी तो हज़म नही हो रही है।
आदित्य मै नौकर नही हू मै चौरसिया हूँ व भारतीय हर किसी से तमीज़ से ही बात करते है,हम अँगरेज़ नही है जो छोटा बड़ा करे।
ओये नौकर का नाम नही होता उसे नौकर ही कहते है हिंदी समझ नही आ रही हो तो सुन सर्वेंट, अब गले ना पड़।
आदित्य तुम्हे अपने शब्द स्वयं सुनाई नही देते,सभ्य समाज के हो तो भाषा पर नियंत्रण रखो। रही नौकर की बात तो ये स्पष्ट कर दू कोई तुम्हारा नौकर नही है वो तुम्हारे सहायक है इसलिए क्यों की तुम स्वयं काम करने में सक्षम नही हो,और मै नौकर नही स्वतंत्रता सेनानी हूँ।
क्या
क्या हुआ आदित्य पहली बार ये शब्द सुना?
नही कई बार भाषणों मै सुना है और कई बार पार्टियों मै भी यूज़ कीया है,यार तुम वो नही हो सकते।
क्या नही हो सकता आदित्य
वही जो तुम ने कहा
आदित्य मै स्वतंत्रता सेनानी क्यों नहीं हो सकता और तुम यदि नहीं मानो तो मुझे कोई फरक नहीं पड़ता क्यों की मुझे किसी प्रमाण पत्र की आवश्यकता नहीं है।
वो बात नही है पर तुम्हारा नाम कभी सुना भी तो नही।
आदित्य तो मत मानो वैसे तुम ने कितने स्वतंत्रता सेनानियो के नाम सुने या पढ़े है?
ह्म्म्म ४-५
शाबाश
नही अराऊंड १०-१५ बट नोट श्युर
अच्छा तो तुम्हे लगता है २०० साल की गुलामी में सिर्फ १०-१५ ही स्वतंत्रता सेनानी थे,आज़ादी कोई पदक नही थी जो चंद लोग गये और जीत कर ले आये।
अरे भड़क क्यों रहे हो?
नही आदित्य भड़क नही रहा हूँ बस हास्य पूर्ण लगता है की आज़ाद युवा में बस इतनी समझ है की किसी ने कुछ कह दिया और उसी को मान लिया।
अरे जो देखेगे वही तो मानेगे।
आदित्य मस्तिष्क जैसी चीज़ इश्वर ने हमे केवल रखने के लिए नही दी है।
क्या
कुछ नही
नही अब जो बोलना है बोल दो ,नींद तो खराब कर ही दी।
बस यूं ही धरती पे आज़ाद भारत को देखने आया था पर अब अफ़सोस हो रहा की क्यों आया।
तुम लोग इतना अफ़सोस क्यों करते हो ,हर समय रोना रोना।
आदित्य किस बात पर खुश हूँ की लाखो शहीदों ने जिन्हें निकालने के लिये अपना कण कण अर्पण कर दिया आज वो फिर मेरी धरती पर अपनी महारानी का सन्देश सुना के हमारे बलिदान पर सवाल उठा रहें है। चलो हमने जो क्या उसे छोड़ भी दे फिर भी आप सब को आत्मग्लानी क्यों नही हो रही है की आज़ाद भारत राष्ट्रमण्डल खेलो मै खेल रहा है?
पर आत्मग्लानी क्यों हो?
आदित्य राष्ट्रमण्डल खेल १९३० में हेमिल्टन शहर, ओंटेरियो, कनाडा में आयोजित किए गए और इसमें ११ देशों के ४०० खिलाड़ियों ने हिस्सा लिया। तब से हर चार वर्ष में राष्ट्रमंडल खेलों का आयोजन किया जाता है। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान इनका आयोजन नहीं किया गया था। इन खेलों के अनेक नाम हैं जैसे ब्रिटिश एम्पायर गेम्स, फ्रेंडली गेम्स और ब्रिटिश कॉमनवेल्थ गेम्स । वर्ष १९७८ से इन्हें सिर्फ कॉमनवेल्थ गेम्स या राष्ट्रमंडल खेल कहा जाता है। आज जब हम आज़ाद है फिर हमे इन खेलो में क्यों हिस्सा लेना चहिये हम किसी के अधीन नही है जो उनके गुलामो की पंक्ति मै खड़े रहें उनकी रानी का सन्देश सुने।
उफ़ क्यों भाग ना ले हम कुछ ना कमाये $१८०० का खेल हम ने $७०,००० का करवा दिया,पहले गोरो ने नोचा अब हमारी बारी है।
अददु उठो सुबह होगयी
अंग्रेजो को शहीदों ने भगाया और इन्हें कौन भगायेगा ..........
चित्र www.google.com से लिया गया है।
Saturday, 2 October 2010
आज नहीं तो कल
आज नहीं तो कल,मैं भी मोक्ष प्राप्त करूंगा।
इस जीवन रूपी दुनिया को छोड़,
कहीं दूर चला जाऊंगा।
आज नहीं तो कल,
मैं भी क्षितिज पार करूंगा।
विवेक की मशाल जला,
परमात्मा में मिल जाऊंगा।
आज नहीं तो कल ,
मैं भी पूजा जाऊंगा।
पत्थर की मूरत बना,
कहीं कोने में खड़ा कर दिया जाऊंगा।
आज नहीं तो कल.....
चित्र www.google.com से लिया गया है।
Sunday, 15 August 2010
संकल्प
आज स्वतंत्रता दिवस के पावन अवसर पर झंडा-रोहन समारोह के बाद सलोनी और गली के सब बच्चे घूमने समुंदर के तट पर गये। सुनहरी बालू, धूप में चमक रही थी, बच्चे खुले आकाश में पंछी की तरह इधर-उधर दौड़ रहे थे, सब खुश थे। सलोनी ने वैसे ही देखा की एक बोतल बालू में धंसी हुई है।उसने अपने सारे दोस्तों से कहा देखो वह बोतल कैसी है? एक ल़ड़के ने कहा 8-9 शताब्दी पुरानी लग रही है। सलोनी ने कहा चलो उस बोतल को देखें। सलोनी और सब बच्चे उत्सुकता से भागे, सलोनी ने बोतल उठाई और सब बच्चे उसके पीछे दौड़े जैसे ही एक बच्चे ने कहा इस में बम हो सकता है वैसे ही सलोनी ने बोतल बालू पर फेंक दी। सब बच्चे पीछे हट गए और आश्चर्य भरी आंखों से देखने लगे, कुछ समय पश्चात् सलोनी ने कहा बोतल खोलकर देखते हैं क्या मालूम इसके अंदर क्या हो?
सलोनी और सारे बच्चों ने अपने-अपने इश्वर को याद किया और उस बोतल को खोला। एक दम से काला धुआं चारों ओर फैल गया सब बच्चे चारों ओर भागे किसी ने कहा मां बचाओ तो किसी ने कहा अम्मी बचाओ और किसी ने कहा बेबे मैंनू बचा। बच्चे चिल्लाते हुए भाग रहे थे की एकदम से काला धुआं एक छोटे से बच्चे में बदल गया। सलोनी ने कहा अरे यहां सब आओ ये तो जिन्न है ये बच्चों का दोस्त है। सब धीरे-धीरे सहमे से आए - सब में हल्का सा डर था लेकिन कुछ समय पश्चात् सब उसके पास आ गये,किसी को अब उससे डर नहीं लग रहा था।
सलोनी ने उस बोतल से निकले बच्चे से पूछा "तुम्हारा नाम क्या है ?
"मैं सत्य हूं।
सलोनी ने फिर पूछा,तुम कहां से आए हो?
वह बच्चा रो दिया, सलोनी ने कहा, " तुम रोओ मत, नहीं बताना चाहते हो तो मत बताओ लेकिन रोओ मत।
मैं रो इसिलए रहा हूं कि मेरे देश वाले मुझसे पूछ रहें हैं कि मैं कौन हूं अरे मैं भारत का हूं यह देश मेरा है। यहां के लोग केवल सत्य बोलते थे। विश्व में सिर्फ एक यही देश था जिस देश में सब शांति और भाईचारे से रहते थे। क्योंकि मैं यहां पर रहता था। सत्य। लेकिन व्यक्तियों के स्वार्थ ने मुझे इस बोतल में बंद कर दिया था उसके बाद हिंदू, मुस्लिम, सिक्ख आदि धर्मों का जन्म हुआ, उससे पहले यहां मनुष्य ही रहता था। इन सबके जन्म के बाद से ही शोषण, दंगे, खून खराबा शुरू हो गया। अब मैं आजाद हूं। मैं सत्य हूं। मैं हर बच्चे, जवान, ब़ूढे में मिल जाऊंगा और फिर से भारत को महान बनाऊंगा।
फिर सत्य -सत्य को फैलाने के लिए चल दिया। सलोनी और सब बच्चे शांत खड़े रहे। कुछ समय उपरांत सलोनी ने कहा अरे हम सब तो एक हैं और रहेंगे। दूर से सत्य ने देखा और सोचा मेरा अस्तित्व खत्म नहीं हुआ है मैं आज भी अपने देश में सत्य फैला सकता हूं। सिर्फ संकल्प की आवश्यकता है। सलोनी औरसारे बच्चे सत्य के साथ हैं और हम .............
चित्र www.
Friday, 6 August 2010
प्रदर्शनी
आज हम सब प्रदर्शनी देखने जा रहे है। वहा पर कई तरह की सब्जियां,दालें और फल होगे। स्वादिष्ट और रसीले फल, मैंने तो कुछ बचपन मै खाये भी है{हाउ लककी आइ ऍम} पर पाषण और आर्य नेतो बस तस्वीरो में ही देखे है ।भाभी कल से समझा रही है सब तमीज़से और दूर से देखना कुछ छूना मत ,कही कुछ खराब मत कर देना । वैसे पाषाण और आर्य शैतान भी है।जहाँ खाने की चीज़ देखते है मचलजाते हैं ।आप मानेंगे नही कल रात एक चैनल पर जैसे ही दाल कीतस्वीर दिखायी - दोनों जिद्द करने लगे की हमे चाहिये बड़ी मुश्किलसे माने और समझे की ये दाल की पुरानी तस्वीर है जैसे पिछले हफ्ते डायनासोर के बारे मै बतया था ।इसका मतलब ये तो नही की डायनासोर अभी तक है, वो इतिहास के पन्नो में है और इतिहास केपन्नो में जो कैद हो गया वो वापस कभी नही आटा हँ हँ आटा नहीआता क्या करू ऐसी हालत कर दी है की दिमाग पर भूख ही हावी रहती है ।चित्र www.
Sunday, 25 July 2010
चरित्रवान
ना जाने आज सुबह मैंने कैसे अपने भतीजे से पूछ डाला।बेटा तुम्हारा चरित्र कहां है दिखाई नहीं दे रहा?
बेटा मुस्करा कर बोला वो तो कब का खो गया।
कैसे तुम्हारी इतनी मूल्यवान वस्तु खो गई?
और तुमने बताया भी नहीं ,बेटा फिर मुस्कुराया।
हां जब खो गई थी तो मुझे भी अफसोस हुआ था।
मगर जब ज्ञात हुआ वस्तु खोई है तो गम लुप्त हो गया।
वैसे भी दादी ही तो कहती हैं वस्तु का मोह नहीं होना चाहिए।
मगर बेटा चरित्र आजकल मिलता कहां है।
ना मिले मुझे चाहिए भी नहीं उसको लादने से मेरी लुक खराब होती है।
जीवन जीने में भी तकलीफ होती है ,फैशन में भी तो नहीं है चरित्र रखना।
बेटा हमारी खानदानी धरोहर थी।
चाचा मगर किस काम की थी।
जिसे गरीब भी न रख सके, रोटी भी न आ सके।
जिसे रखने पर सब दया का भाव दिखाते हैं।
बेचारा चरित्रवान कहकर पुकारते हैं।
