कुछ दिन पहले राहुल गांधी के एक बयान पर लिखने का विचार आया था। लिखते-लिखते देर होती गई। सच कहूं तो इसमें मेरी अपनी सुस्ती और कमजोरी थी। इसलिए देर से लिखने का दोष मैं किसी और के सिर नहीं डाल सकता। अपनी अक्षमता का हिसाब दूसरों से मांगना मुझे उचित नहीं लगता।
लेकिन शायद इसी आत्मस्वीकार से एक बात और समझ में आती है—यदि मैं स्वयं समय पर कुछ नहीं कर पाया, तो क्या मुझे किसी दूसरे की मेहनत, क्षमता या सफलता पर प्रश्न उठाने का अधिकार मिल जाता है?
यदि कोई व्यक्ति वर्षों तक मेहनत करके अपने क्षेत्र में स्थान बनाता है, कठिन परिस्थितियों से गुजरता है और अपनी योग्यता से एक मुकाम हासिल करता है, तो केवल इसलिए कि मैं उससे असहमत हूं या मैं वहां तक नहीं पहुंच पाया, उसकी उपलब्धियों पर प्रश्नचिह्न लगाने लगूं—तो यह आलोचना नहीं होगी।
यह मेरी अपनी कुंठा का सार्वजनिक प्रदर्शन होगा।
और शायद ऐसे व्यक्ति को ही अंग्रेजी में frustrated loser कहा जाता है—जो अपनी असफलता या असंतोष का उत्तर स्वयं में खोजने के बजाय दूसरे की सफलता में दोष खोजने लगे।
यही विचार राहुल गांधी के उस बयान को पढ़ते हुए मेरे मन में आया।
क्योंकि मामला केवल एक बयान का नहीं है।
मामला उस भाषा का है।
मामला उस दृष्टिकोण का है।
और मामला उस राजनीतिक संस्कार का है, जिसके माध्यम से राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे विषयों को देश के सामने प्रस्तुत किया जा रहा है।
राहुल गांधी को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की आलोचना करने का पूरा अधिकार है। सरकार की नीतियों पर सवाल उठाना विपक्ष का अधिकार है। सत्ता से असहमति लोकतंत्र की स्वाभाविक प्रक्रिया है।
लेकिन क्या राष्ट्रीय सुरक्षा भी उसी राजनीतिक कटाक्ष और आरोप-प्रत्यारोप की भाषा में रखी जाएगी?
यहीं से मेरा प्रश्न राहुल गांधी से है।
इंदौर में ‘छात्रों की गूंज’ कार्यक्रम में राहुल गांधी ने राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल पर फोन और डिजिटल संचार की निगरानी से जुड़े गंभीर आरोप लगाए।
राहुल गांधी जी, मेरा सीधा प्रश्न है—
यदि आपके पास प्रमाण है तो देश के सामने रखिए।
यदि प्रमाण नहीं है तो इतना गंभीर आरोप सार्वजनिक मंच से क्यों?
प्रधानमंत्री की आलोचना कीजिए। सरकार की नीतियों को कठघरे में खड़ा कीजिए। यह आपका अधिकार है। लेकिन राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार जैसे पद पर बैठे व्यक्ति पर आरोप लगाते समय शब्दों के साथ प्रमाण और जिम्मेदारी भी होनी चाहिए।
और यहां एक प्रश्न उससे भी बड़ा है—
क्या आपको लगता है कि अजित डोभाल जैसे व्यक्ति के पूरे जीवन और कार्य का आकलन कुछ राजनीतिक वाक्यों में किया जा सकता है?
अजित डोभाल ने अपना अधिकांश जीवन पुलिस और खुफिया सेवाओं में बिताया। वे इंटेलिजेंस ब्यूरो के निदेशक रहे और उन्हें कीर्ति चक्र से सम्मानित किया गया। उनके काम का एक बड़ा हिस्सा स्वभावतः ऐसा है, जिसे सार्वजनिक नहीं किया जा सकता।
खुफिया अधिकारी की सफलता कई बार इसी में होती है कि उसकी सफलता की कहानी कभी सामने ही न आए।
तो फिर सवाल है—
जिस व्यक्ति के काम का बड़ा हिस्सा देश के सामने आ ही नहीं सकता, उसके योगदान का पूरा आकलन करने का दावा हम किस आधार पर कर सकते हैं?
प्रश्न हैं तो पूछिए। प्रमाण हैं तो रखिए। आलोचना है तो कीजिए।
लेकिन किसी व्यक्ति की वर्षों की मेहनत, अनुभव और उपलब्धियों को समझे बिना उसके पूरे काम पर ही प्रश्नचिह्न लगा देना—क्या यह आलोचना है या अपनी राजनीतिक कुंठा का प्रकटीकरण?
और चिंता तब और बढ़ जाती है, जब ऐसी बातें बच्चों और युवाओं के बीच कही जाती हैं।
बच्चों को प्रश्न करना सिखाइए। तर्क करना सिखाइए। सत्ता से सवाल करना सिखाइए। लेकिन क्या उनके मन में देश की सुरक्षा संस्थाओं के प्रति अविश्वास भरना भी राजनीति का हिस्सा होना चाहिए?
जेएनयू के परिसर में लगे विवादित और देश-विरोधी नारों को लेकर देश पहले भी एक तीखी बहस देख चुका है। लेकिन प्रश्न आज भी वही है—
क्या हम युवाओं को संस्थाओं से प्रश्न करना सिखाएंगे या संस्थाओं के प्रति अविश्वास पैदा करेंगे?
असहमति लोकतंत्र की शक्ति है।
लेकिन अंधा अविश्वास लोकतंत्र की शक्ति नहीं है।
और राहुल गांधी जी, बात यहीं समाप्त नहीं होती।
आपके ही दल के वरिष्ठ नेता संदीप दीक्षित ने 2017 में तत्कालीन सेना प्रमुख जनरल बिपिन रावत के लिए ‘सड़क का गुंडा’ जैसी आपत्तिजनक टिप्पणी की थी। बाद में उन्होंने माफी मांगकर अपना बयान वापस लिया।
मेरा प्रश्न तब भी था और आज भी है—
क्या सेना प्रमुख के लिए ऐसी भाषा को केवल ‘व्यक्तिगत बयान’ कहकर समाप्त कर देना पर्याप्त है?
यदि कोई नेता देश के सेना प्रमुख के लिए ऐसी भाषा इस्तेमाल करता है, तो क्या पार्टी नेतृत्व की जिम्मेदारी केवल इतनी है कि वह उसे उसका निजी बयान कहकर आगे बढ़ जाए?
नेतृत्व का अर्थ केवल विरोधियों को मर्यादा का पाठ पढ़ाना नहीं है।
नेतृत्व का अर्थ अपने साथ खड़े लोगों की भाषा और मर्यादा की जिम्मेदारी लेना भी है।
यही कसौटी आज राहुल गांधी पर भी लागू होती है।
प्रधानमंत्री की आलोचना कीजिए—पूरी शक्ति से कीजिए।
सरकार की नीतियों पर सवाल उठाइए।
अडानी-अंबानी पर प्रश्न हैं—पूछिए।
लेकिन हर असहमति को आरोप और हर आरोप को सत्य की तरह प्रस्तुत करना लोकतांत्रिक विमर्श को मजबूत नहीं करता।
राष्ट्रीय सुरक्षा राजनीति की अखाड़ेबाजी का विषय नहीं है।
जिस अधिकारी का काम देश की सुरक्षा से जुड़ा है, वह हर आरोप का सार्वजनिक उत्तर भी नहीं दे सकता। क्योंकि उसके उत्तर में कई बार ऐसी सूचनाएं छिपी होती हैं, जिन्हें देशहित में सार्वजनिक करना संभव नहीं होता।
इसलिए सार्वजनिक जीवन में बैठे व्यक्ति से अपेक्षा होती है कि जहां प्रमाण उपलब्ध न हो, वहां शब्दों पर संयम हो।
राहुल गांधी जी, आपको बोलने का अधिकार है। विरोध करने का अधिकार है। सरकार को घेरने का अधिकार है।
लेकिन देश को आपसे प्रश्न पूछने का अधिकार भी है—
क्या आपके आरोप प्रमाणित हैं?
क्या आपके शब्द जिम्मेदारी से निकले हैं?
क्या राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे विषय पर राजनीतिक असहमति को व्यक्तिगत आरोपों में बदलना उचित है?
और क्या युवाओं के सामने ऐसी भाषा उनके भीतर प्रश्न पैदा करेगी या संस्थाओं के प्रति अविश्वास?
राजनीतिक संघर्ष कीजिए—पूरी शक्ति से कीजिए।
लेकिन अपनी राजनीतिक निराशा को राष्ट्रीय सुरक्षा के विमर्श पर मत उतारिए।
विरोध कीजिए, लेकिन विष मत घोलिए।
प्रश्न कीजिए, लेकिन प्रमाण के साथ।
सरकार को घेरिए, लेकिन राष्ट्र की सुरक्षा से जुड़ी संस्थाओं की गरिमा को अपना राजनीतिक हथियार मत बनाइए।
क्योंकि सरकारें बदलती रहती हैं।
राजनीतिक दल आते-जाते रहते हैं।
नेता बदलते रहते हैं।
लेकिन—
राष्ट्र रहता है।
और राष्ट्र की सुरक्षा किसी पार्टी की नहीं—पूरे भारत की जिम्मेदारी है।
जय माँ भारती।










