सोमनाथजी कोई इतिहास नहीं हैं।
वे भारत की आत्मा का रणघोष हैं।
हजार वर्षों तक इस भूमि पर आक्रमण हुए, फरमान चले, तलवारें उठीं और अग्नि बरसी। उद्देश्य एक ही था—भारत की चेतना को तोड़ना, उसकी आस्था को अपमानित करना और उसकी स्मृति को मिटा देना। हर आक्रमण में पहली चोट सोमनाथजी पर की गई, क्योंकि आक्रांताओं को भलीभांति ज्ञात था कि यदि इस राष्ट्र के हृदय पर प्रहार करना है, तो उसकी आस्था की धड़कन को कुचलना होगा।
पर जो इस भूमि को नहीं समझ पाए, वे यह भी नहीं समझ सके कि भारत की आत्मा युद्धभूमि में हारती नहीं है। वह गिरती है, टूटती है, जलती है—और फिर पहले से अधिक प्रखर होकर उठ खड़ी होती है। सोमनाथजी उसी अविनाशी आत्मा का साक्षात स्वरूप हैं।
यह मंदिर जितनी बार ध्वस्त किया गया, उतनी ही बार उसने इतिहास को चुनौती दी।
आक्रांताओं के नाम धूल में दब गए,
पर सोमनाथजी आज भी शिखर पर खड़े हैं—अडिग, अमिट, अविचल।
जनवरी 1026 में गजनी के महमूद द्वारा किया गया आक्रमण केवल एक मंदिर के ध्वंस की घटना नहीं था। वह भारत की सभ्यतागत चेतना पर किया गया सुनियोजित प्रहार था। आक्रमणकारियों को भलीभांति ज्ञात था कि यदि भारत की आत्मा को विचलित करना है, तो उसके आस्था-केंद्रों को लक्ष्य बनाना होगा। और इसी कारण सोमनाथजी को बार-बार निशाना बनाया गया।
आज, जब उस पहले आक्रमण के 1000 वर्ष पूर्ण हो रहे हैं, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का यह कथन अत्यंत प्रासंगिक है कि सोमनाथजी भारत की सभ्यतागत चेतना, आस्था और आत्मबल का स्थायी प्रतीक हैं। यह स्मरण केवल अतीत की पीड़ा का नहीं, बल्कि उस अदम्य शक्ति का है, जिसने हर विध्वंस के बाद पुनर्निर्माण का संकल्प लिया।
सोमनाथजी का इतिहास पराजय का इतिहास नहीं है।
वह पुनरुत्थान की परंपरा है।
महमूद गजनवी, खिलजी, गुजरात सल्तनत और औरंगजेब—सब आए। सबने तोड़ा। सब चले गए।
वे इतिहास की फुटनोट बन गए।
किन्तु सोमनाथजी—आज भी खड़े हैं।
इस मंदिर को बार-बार ध्वस्त किया गया, क्योंकि आक्रांताओं को भ्रम था कि भारत की आस्था पत्थरों में बसती है। वे यह नहीं समझ सके कि भारत की चेतना ईंटों और शिलाओं से परे, जनमानस में निवास करती है। इसीलिए हर बार जब मंदिर गिराया गया, वहीं से उसके पुनर्निर्माण का संकल्प जन्मा—और वह संकल्प सोमनाथजी के रूप में साकार हुआ।
प्रधानमंत्री ने 2026 को दोहरे अर्थों में ऐतिहासिक वर्ष बताया है। यह वर्ष जहाँ पहले आक्रमण के सहस्राब्दी का साक्षी है, वहीं आधुनिक सोमनाथजी मंदिर के पुनर्निर्माण के 75 वर्ष भी इसी कालखंड में पूर्ण हो रहे हैं। 11 मई 1951 को राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद द्वारा मंदिर का उद्घाटन केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं था, बल्कि नवस्वतंत्र भारत के सांस्कृतिक आत्मविश्वास की उद्घोषणा थी।
इस पुनर्निर्माण के केंद्र में सरदार वल्लभभाई पटेल का दूरदर्शी संकल्प था। वे भलीभांति जानते थे कि राजनीतिक स्वतंत्रता तब तक अधूरी है, जब तक सभ्यतागत आत्मसम्मान का पुनर्स्थापन न हो। के.एम. मुंशी और असंख्य राष्ट्रनिष्ठ नागरिकों ने सोमनाथजी के पुनर्निर्माण को सरकारी परियोजना नहीं, बल्कि राष्ट्रीय चेतना का अभियान बनाया।
स्वामी विवेकानंद के विचारों की स्मृति में यह तथ्य निहित है कि तीर्थ और मंदिर केवल पूजा-स्थल नहीं होते, वे सभ्यता की जीवंत स्मृति होते हैं। उन्हें नष्ट करने का अर्थ होता है इतिहास को मिटाने का प्रयास। किंतु भारत के इतिहास में यह प्रयोग बार-बार विफल हुआ है—और उसका सबसे बड़ा प्रमाण सोमनाथजी हैं।
औरंगजेब द्वारा जारी 1669 का फरमान इस मानसिकता का चरम उदाहरण था, जिसमें मंदिरों के ध्वंस को वैचारिक रणनीति का हिस्सा बनाया गया। काशी, मथुरा, उज्जैन और सोमनाथजी—सब निशाने पर थे। उद्देश्य स्पष्ट था—भारत की सांस्कृतिक रीढ़ को तोड़ना। परंतु इतिहास ने सिद्ध किया कि यह रीढ़ झुक सकती है, टूट नहीं सकती।
आज समुद्र तट पर खड़े सोमनाथजी केवल एक स्थापत्य चमत्कार नहीं हैं। वे यह उद्घोष करते हैं कि भारत की सभ्यता समय से बड़ी है, सत्ता से व्यापक है और आक्रमणों से परे है। मंदिर की दीवारों पर अंकित दिशासूचक चिन्ह यह स्मरण कराता है कि यहाँ से आगे केवल समुद्र नहीं, भारत की चेतना का विस्तार है।
प्रधानमंत्री के शब्दों में, यदि सोमनाथजी हजार वर्षों के संघर्ष के पश्चात अपने वैभव के साथ खड़े हो सकते हैं, तो भारत भी अपने सभ्यतागत गौरव को पुनः प्राप्त कर सकता है। यह कथन केवल प्रेरणा नहीं, एक राष्ट्रीय दायित्व का आह्वान है।
सोमनाथजी हमें सिखाते हैं कि
भारत गिर सकता है, पर मिट नहीं सकता।
भारत घायल हो सकता है, पर पराजित नहीं।
जब तक सोमनाथजी खड़े हैं,
तब तक भारत की आत्मा जीवित है।


यह लेख पढ़कर मन अपने आप सोमनाथ के शिखर पर पहुँच जाता है। आप इतिहास को बोझ की तरह नहीं, बल्कि जीवित अनुभव की तरह सामने रखते हैं। मुझे सबसे ज़्यादा यह बात छूती है कि आस्था पत्थरों में नहीं, लोगों के मन में रहती है। बार-बार टूटकर भी सोमनाथ का खड़ा रहना हमें हिम्मत देता है।
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