अमेरिका द्वारा वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को उनके घर से सैन्य बल के माध्यम से उठा ले जाना केवल एक गिरफ्तारी नहीं है, यह अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था के सीने पर किया गया खुला प्रहार है। इस कार्रवाई में मादुरो की पत्नी को भी हिरासत में लिया गया। आरोप लगाए गए—ड्रग तस्करी के। लेकिन असली प्रश्न आरोपों का नहीं, अधिकार का है। किसने अमेरिका को यह अधिकार दिया कि वह किसी संप्रभु राष्ट्र के राष्ट्रपति को उसकी भूमि से जबरन उठा ले?
यह घटना बताती है कि जब साम्राज्यवादी ताक़तें स्वयं को कानून से ऊपर मानने लगती हैं, तब अंतरराष्ट्रीय नियम केवल घोषणापत्र बनकर रह जाते हैं।
संयुक्त राष्ट्र चार्टर: शब्द या शपथ?
संयुक्त राष्ट्र चार्टर का अनुच्छेद 2(4) स्पष्ट करता है कि कोई भी देश दूसरे देश के विरुद्ध सैन्य बल का प्रयोग नहीं करेगा। यह केवल कानूनी वाक्य नहीं, बल्कि विश्व शांति की मूल शपथ है। अमेरिका की यह कार्रवाई इस शपथ का खुला उल्लंघन है।
संयुक्त राष्ट्र ने स्वयं स्वीकार किया है कि उसे इस सैन्य ऑपरेशन की कोई जानकारी नहीं थी। न ही इसे सुरक्षा परिषद की स्वीकृति प्राप्त थी। इसका अर्थ साफ है—यह कार्रवाई न तो अंतरराष्ट्रीय सहमति से हुई, न ही वैश्विक कानून के दायरे में।
वैधता की आड़ में बल प्रयोग
यह तर्क बार-बार दोहराया जा रहा है कि मादुरो को विवादित चुनावों के बाद वैध नेता नहीं माना गया। किंतु अंतरराष्ट्रीय कानून ‘किसे अच्छा लगता है’ या ‘किससे राजनीतिक असहमति है’ के आधार पर नहीं चलता। यदि किसी नेता की वैधता पर सवाल उठना ही सैन्य हस्तक्षेप का आधार बन जाए, तो दुनिया में शायद ही कोई सरकार बचे जिसे गिराया न जा सके।
यह तर्क दरअसल एक बहाना है—बल प्रयोग को वैध ठहराने का।
अमेरिकी दलीलें और लोकतंत्र की विडंबना
ट्रंप प्रशासन कहता है कि यह न्यायिक प्रक्रिया का हिस्सा था और न्याय विभाग ने सेना की सहायता मांगी थी। यदि ऐसा है, तो सवाल उठता है कि अमेरिकी कांग्रेस को क्यों अंधेरे में रखा गया? क्या अमेरिका का लोकतंत्र अब इतना कमजोर हो गया है कि युद्ध जैसे फैसले भी संसद की सहमति के बिना लिए जाएं?
अटॉर्नी जनरल द्वारा सोशल मीडिया पर यह घोषणा करना कि मादुरो और उनका परिवार अमेरिकी अदालतों में पेश होगा, इस बात का संकेत है कि न्याय नहीं, शक्ति प्रदर्शन प्राथमिक उद्देश्य है।
तेल, नियंत्रण और असली मंशा
राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का यह कहना कि वेनेजुएला अमेरिका का तेल “चुरा रहा है” और अमेरिका उस पर नियंत्रण करेगा, इस पूरे घटनाक्रम की असली मंशा उजागर कर देता है। यह भाषा कानून की नहीं, उपनिवेशवादी लालच की भाषा है।
आज मादुरो निशाने पर हैं, कल कोई और होगा। संसाधनों से संपन्न, लेकिन राजनीतिक रूप से असहमत देश हमेशा ऐसे ही अभियानों का शिकार रहे हैं।
आज वेनेजुएला, कल दुनिया
यदि इस कार्रवाई को वैश्विक समुदाय ने सामान्य मान लिया, तो अंतरराष्ट्रीय कानून की अवधारणा ही निरर्थक हो जाएगी। तब ताकत ही न्याय होगी, और कमजोर देशों की संप्रभुता केवल काग़ज़ पर बचेगी।
यह समय है जब दुनिया तय करे—क्या वह नियमों से चलेगी या बंदूक की नली से। क्योंकि जिस दिन ताक़त को कानून का विकल्प मान लिया गया, उस दिन वैश्विक अराजकता अपरिहार्य हो जाएगी।


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