Tuesday, 15 January 2013

कुम्भ से कैनेडा.........

बच्चा चाय बना देना
प्रगति - नही बनाऊंगी, मै आपका बच्चा नहीं हूं? मै आप की कोई नहीं हूं ?
तू तो मेरी लाडो है, मेरा बेटा है...
प्रगति - नहीं.. नहीं आप सिर्फ ऐसा कहते हैं, दिल से नहीं मानते। ऐसा होता तो आप गर्व से कहते तूं मेरी बेटी  है। मै भी 30 साल की हो गयी हूं, कब तक सौतेला व्यवहार करते रहेंगे...
लाडो किया हो गया, क्यों गुस्सा हो रही हो, दो पल बैठ... फिर लड़ना आराम से।
प्रगति -  नहीं बैठूंगी, जब तक आप ये नहीं कहते मैं आपकी बेटी हूं, गर्व है...
लाडो अब मुझे इस बात का भी प्रमाण देना पड़ेगा की मैं तुझसे कितना प्यार करता हूं कितना गर्व करता हूं। लाडो रो मत... क्या हुआ मेरे बच्चे क्या हुआ कोई समस्या है तो बोलो.... लाडो रो मत्त घर में कुछ हुआ ?
प्रगति - नहीं, मुझे आप से लड़ना है...
लड ले... इस में रोने की क्या बात है... तुझे तो आदत है लड़ने की, मुझे भी अच्छा नहीं लग रहा था कि एक हफ्ता से आई हुई है और लड़ नही रही है।
प्रगति - पापा कभी नही लडूंगी मेरे संग चलिये ना...
लाडो -   आऊँगा...
प्रगति - नहीं ... अभी चलिये और हमारे संग रहिये...
नहीं प्रगति, मैं यहां आराम से हूं
प्रगति - तो वहा कौनसी तकलीफ है, हमें हर समय आपका ख्याल रहता है, पापा मकान छोटा है पर मकान तो है, पापा हम दोनों मेहनत कर रहें है जल्दी बड़ा घर ले लेंगे।
लाडो ये बात नही है... घर तो घर होता है और मेरी बेटी का तो कैनेडा मै घर है...
प्रगति - तो चलिये ना, पापा माँ के देहांत को 6 महीने हो गये है कब तक अकेले रहेंगे और कैनेडा से इतनी जल्दी -जल्दी आना आसान  नही है इस बार मिक्की को छुटी ही नहीं मिली मिक्की बोल रहा था जॉब छोड़ देता हूं पापा को मनाकर ले आता हूं... मैंने समझाया जॉब मत छोड़ो मुझे छुट्टी मिल रही है.... मैं जाती हूं और पापा को संग लाती हू, पापा चलेंगे ना, अब आप क्यों रो रहे हैं?
कुछ नहीं प्रगति ये तो ख़ुशी के आंसू हैं... लाडो तुमने इतनी चिंता की मेरे लिए बहुत है ये घर नहीं छोड़ सकता.. बड़े अरमानों से बनाया व सजाया था मैंने और तुम्हारी माँ ने इस उम्र में....
प्रगति - मुझे मालूम है आप क्यों नहीं चल रहे हैं मैं बेटी हूं ना अगर बेटा होती तब आप उसके संग रहते
ऐसा कुछ नहीं है....
प्रगति- ऐसा ही है, क्या हमें आप के आशीर्वाद की जरुरत नहीं है...
अच्छा चलता हूं पर.. पर 1 महीने के लिए...
प्रगति - नहीं नहीं नहीं सादा के लिए...
फिर ये  घर ?
प्रगति - बेच देंगे...
नही बेचेंगे नहीं...
प्रगति -  फिर आप 1 महीने बाद ही आ जाएंगे हमें छोड़ के...
नही आऊंगा
प्रगति - अरे पापा आपकी आंखें बता रही हैं, बस अब घर बेचेंगे और कैनेडा चलेंगे, क्या हुआ आप मुस्करा रहें है?
कुछ नहीं लाडो पहले बच्चे चार धाम की यात्रा करते थी अब कैनेडा ले जाते हैं...
प्रगति - आप भी, चार धाम की यात्रा हम सब संग करेंगे। पापा पर मिक्की को एक डर है कही आप केनेडा में नयी मम्मी तो नहीं लाएंगे जो हम मासूम बच्चों से घर का कम कराएगी- हाहा हा हा...

आज के समय में जहां कोई अपने स्वार्थ के बिना किसी से पानी तक नहीं पूछता वहां एक बेटी ने अपने पिता का सारा कम बड़ी निष्ठा से पूर्ण किया और हक़ से घर बिकवा दिया और सारे अकाउंट बंद करवा दिए...

ट्रिंग ट्रिंग - हेलो ब्रिजेश बेटा, कैसे हो ? बच्चे कैसे हैं, मै ठीक हूं, चिंता नहीं करना...
हेलो... जी ब्रिजेश नहीं, एअरपोर्ट से सिक्युरिटी ऑफिसर बोल रहा हूं...
जी क्षमा चाहूंगा मुझे लगा मेरे बेटे का फ़ोन है...
सिक्युरिटी ऑफिसर - कोई बात नहीं जी 15 साल की सर्विस में आदत हो गई है... युवा भागते हुए आते हैं अगर एअरपोर्ट पर सामान छूट जाये,  और अगर बुज़ुर्ग छूट जाये तो कोई नहीं आता... क्योंकि वो छूटते नहीं छोड़े जाते हैं...
जी साहब
सिक्युरिटी ऑफिसर - कोई नही अंकल इनका भी बुढ़ापा आयेगा...
ऐसा न कहिये बच्चे ही हैं हमारे...
सिक्युरिटी ऑफिसर - तड़पो... कुछ नहीं हो सकता - आप किसी आशीष विद्यार्थी को जानते हैं...
जी साहब आशीष विद्यार्थी जी मेरे मित्र हैं, बड़े भाई समान हैं, कल रात अपनी बेटी के संग कैनेडा गए हैं...
सिक्युरिटी ऑफिसर - अंकलजी कहीं नहीं गये हमारे पास बेठे हैं न टिकेट है न पासपोर्ट... बोल रहे हैं बेटी ने टैक्सी में  पासपोर्ट अपने पास रख लिया था। उतर के ट्रोली लेने गयी, अभी हमने अंदर चेक कराया है बिटियारानी तो 1 बजे की फ्लाइट से उड़ गयी....
साहब आप उन्हें 1 घंटा अपने पास ही रखिये और कही मत जाने दीजियेगा मैं बस अभी निकल के आता हूं
(एक घंटे बाद ..... एअरपोर्ट पर)
सिक्युरिटी ऑफिसर कहां मिलेंगे
सिक्युरिटी ऑफिसर- कहिये मैं ही हूं...
साहब मेरे मित्र आशीष विद्यार्थी जी को घर ले जाना है...
सिक्युरिटी ऑफिसर - चलिए, आप लोग इतने तजुर्बेदार हैं फिर ऐसे कैसे बच्चों से फंस जाते हैं...
साहब बच्चे होते हैं न इसलिए...
विद्यार्थी जी नमस्कार, चले घर हम आप को कही नही जाने देंगे...
आशीष विधियार्थी- मेरा घर भी नही है...
भाई साहब मुस्कराइए अब हम दोनों पड़ोसी संग रहेंगे और शेरो-शायरी करेंगे हा हा...
आशीष विधियार्थी- प्रगति ने ऐसा क्यों किया...
प्रगति ही की है हमारा लड़का हमें कुम्भ छोड़ के आया था और आप की बेटी एअरपोर्ट....

14 comments:

  1. मार्मिक चित्रण...उम्दा प्रस्तुति...बहुत बहुत बधाई...

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  2. बहुत मार्मिक...यद्यपि बेटियां ऐसी होती तो नहीं हैं, पर बदलते समय में कुछ नहीं कहा जा सकता..बहुत सुन्दर प्रस्तुति..

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  3. lekin ladkiyaan aisa nahi karti aadi...

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  4. मेरी टिप्पणी स्पैम में चली गयी है


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  5. समय के साथ बदलता है बहुत कुछ ...... बेटियां ऐसा अक्सर नहीं करतीं

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  6. हे भगवान! क्या ऐसा भी होता है ???? हम तो पढ़कर सन्न ही रह गये......
    शब्द नहीं मिल रहे कुछ लिखने को.... :((
    ~सादर!!!

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  7. आह....
    कुछ कड़वा सा आया जुबां पर...सच्चाई ही होगी..

    सादर
    अनु

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  8. क्या वाकई ऐसा भी होता है...अविश्वसनीय....डिस्टर्बिंग ....!!!!

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  9. This comment has been removed by the author.

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  10. अविश्वसनीय..

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  11. बहुत दुखद अंत, पर जीवन के सच से सामना. यूँ बेटियाँ ऐसी नहीं होती, मुमकिन है बेटे भी नहीं. बस जो सुना कहानी में सच से अब तक सामना नहीं हुआ. मार्मिक कहानी.

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  12. समाज की स्थिति और पात्रों के नामों में छुपे व्यंग्य .....सराहनीय लेखन है आपका

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