Sunday, 28 October 2012

ईमानदारी का एक दीया

शादी शादी बोल बोल के शादी करवा दी। ऐसा हो रहा था जैसे मै शादी नहीं करती तो कयामत आ जाती। यार कोई  मैं दुनिया की पहली लड़की तो  होती नही बस सात फेरे  लेलो और जि़न्दगी भर सर फोड़ते रहो।
शान्त  गुडिया
क्या शान्त  जि़न्दगी तो मेरी बरबाद हो गयी आप लोगों के चक्कर में, मै बता रही हूं अब मैं उस भिखारी को और नहीं झेल सकती। मुझे डाईवोर्स चाहिए एट एनी कॉस्ट।
हां गुडिया हम डाईवोर्स लेंगे।
हद कर रही हो समझा नही सकती तो घर तो मत तोड़ो बेटी का।
ओह पापा  प्लीज आप मेरे मामले मे  चुप ह़ी  रही ये वो घर नही जेल है।
गुडिया इनके मुह मत लग इन्होने आज तक कभी हम लोगो का भला सोचा है? वर्मा की बेटी होती तो अभी तक वकील भी करवा   लिया होता और वो आर्य की बेटी के लिए पुलिस स्टेशन तुम ही गए थे। दुनिया वालों के लिए महान बना और घर के लोगों की परवाह नहीं.... ऐसा आदमी मिला है।
क्या बकवास है, आर्यजी की बेटी की बात अलग थी उसकी सास ने उसे मारने की कोशिश की थी इसलिए उनके संग खड़ा हुआ था और यहाँ ये हवा में लड़ के आई है।
अच्छा मतलब मेरी गुडिय़ा जब तक उन जाहिलों से पिट न जाये, जब तक उसकी चालाक सास उसे जलाये नहीं तब तक आप हाथ पर हाथ रखे टीवी देखते रहेंगे। एक अच्छे   पति तो कभी बने नही, एक अच्छे बाप तो बन जाओ।
अरे तुम शहीद होना बंद करो अपनी लड़ाई बाद में सुलझा लेंगे।
तुम से बात कर कौन रहा है, मैंने जो नरक भोगा है वो मैं अपनी बेटी को नहीं भोगने दूंगी, मै इसे भी अपनी तरह संस्कारों की भेंट नहीं चढऩे दूंगी। अब नारी अबला नहीं रही है। गुडिय़ा मैं तुझे  डाईवोर्स दिलवाउंगी चाहे मुझे इस इन्सान के खिलाफ खड़ा होना पड़े।
थैंक्स, लव यू आपने  मेरे लिए कभी मना नहीं किया ।
माँ हूं कोई ज़ालिम सास नहीं।
पागलपन  छोड़ो वो सिल्क का सूट नही मांग रही। अपने पति से तलाक मांग रही है।
मांगे मेरी जूती से मुह पर मारूंगी, बहुत मांग लिया उस भिखारी से। कुछ भी मंगलो न न न के अलावा कोई लफ्•ा नहीं निकला कभी। हर समय अभी नहीं बाद में पता नहीं उसका बाद कब आता मेरे मरने के बाद।
तुम्हें नहीं पता उसकी कितनी सेलरी है जो बच्चों की तरह कुछ भी कभी भी डिमांड करती रहती हो, क्या वो कहीं गलत जगह खर्च करता है?
वो करे या नहीं करे पर इतना तो दे कि घर चला सकूं। हर छोटी सी छोटी चीज के लिए मन को मारती रहूं।
मन को मारो नहीं। मन को समझाओ और काल्पनिक दुनिया से बहार आओ।
आप बस बाहर वाले का पक्ष लीजिये मै चाहे मर जाऊं।
मुझसे फिल्मी बातें तो करना मत, किसी का पक्ष नहीं ले रहा हूं बस बात समझाने की कोशिश कर रहा हूं। महंगाई हर क्षण बढ़ रही है  घोटाले बीमारी से ज्यादा तेज़ी से फैल रहे हैं।  इस समय तुम्हारा फर्ज है उस के साथ खड़ी रहो न की उस के सामने।
सब ऐश से रह रहे हैं हमारे अलावा।
गुडिय़ा कौन ऐश से जी रहा है? लगभग 80 करोड़ तो 2 वक्त की रोटी जुटा नही पा रहे हैं। और सरकार द्वारा उन्हें मध्य वर्ग का साबित करने के लिए कभी 25 तो कभी  35 कमाने वाले को मध्यवर्ग का घोषित कर दिया जाता है। आम आदमी सुन कर चुप हो जाता है क्योंकि अब वो भी जानता है नेताओं की घोषणा और वास्तविक जीवन में अंतर है।
गुडिय़ा इनसे बहस मत कर ये आदमी तो बेतुके तर्क देता रहता है। अगर कमा नहीं सकता था तो शादी ही क्यों की?
रोज 16-16 घंटे तुम काम नही करती हो वो ही करता है ।
ऐसे काम का क्या फायदा जिससे घर भी न चल सके।
तो क्या डाका डाले ?
डाका नहीं डाले कम से कम  एनजीओ खोल के अपाहिजों की बैसाखी तो छीन  सकता है, बीमारो की दवईयों में तो कमीशन खा सकता है। युवराज के जीजा को देखो कितनी जल्दी बिना इन्वेस्टमेंट के करोड़पति बन गया।
हे राम!
कोन राम...?
पुरुषोत्तम राम जिनके वनवास से लोटने के बाद से दिवाली मनाई जाती है ...
टिंग टिंग टिंग
पड़ोसी आ गये लगता है, दरवाज़ा खोलने दो
नमस्कार अंकल
नमस्कार बेटा
हम दिए लाये हैं इससे अंधकार मिटेगा और सतयुग का प्रकाश विद्यमान होगा....आप लेंगे ?
जरूर लूंगा 38 दे दो  हमारे घर और देश को इसकी अत्यंत आवश्यकता है
ये लो गुडिय़ा दिया घर में स्थापित करना, केवल लक्ष्मीजी को ही मत बुलाना सरस्वतीजी और विनायकजी को भी बुलाना, क्योंकि घर तब तक घर रहता है जब तक उस के सदस्यों को पैसे खर्च करने की विद्या हो और उसे सम्भालने का विवेक।
इसलिए मेरी गुडिया टीवी सीरियल और दिखावे की चकाचौंध के भ्रम में फंस कर अपने घर में अँधियारा मत करो। ईमानदारी के एक दिये से घर और संसार में प्रकाश फैलता है ।

Wednesday, 1 August 2012

देश मेरा फिर दहल गया

देश मेरा फिर दहल गया ।
किसी के लिए चार धमाके हुए ।।
किसी के लिए ब्रेकिंग न्यूज़ बनी ।
किसी के लिए रियलटी  शो  शुरू  होगया ।।
किसी के लिए फेसबुक का स्टेटस हुआ ।
किसी के लिए ट्विट हुआ ।
किसी के लिए व्यपार होगया ।।
किसी के लिए राजनिति का मंच  हो गया ।

सब चल रहें है।
क्योकि  जीवन चलने का नाम है ।।
पर ना जाने क्यों ?
मुर्ख रसोई ये ना समझ पाई,
अभी भी किसी के इंतजार मे ना चलती है ना जलती है !!

Wednesday, 27 June 2012

नई शुरुआत

प्यारे पापा,
सॉरी जो मैंने जन्म लिया और आप की तकलीफों का कारण बनी ये आखरी मेल  लिख रही हू आज के बाद ना मैं कष्ट में होउंगी ना आप को आसुओं से सराबोर मेसेज करुंगी।
पापा मैं बहुत थक गयी हूं व टूट गयी हूं। अब मुझ मे जरा सी भी हिम्मत नहीं बची है कि समझ और परिवार के बारे मे कुछ सोच सकूं। सच्ची पापा अब थक गयी।
पापा जो करने जा रही हू पता नहीं सही है या गलत पर अब करके ही रहूंगी। शादी के बाद पहली बार कोई निर्णय लेने की हिम्मत हुई है अब नहीं सोचुंगी बस करके रहूंगी।
9 साल से खौफ के साये में मरे जारही हूं सुबह आंख खुलती है तो सिहर जाती हूं की आंख क्यों खुल गयी। अब फिर घर के काम का डर, नाश्ते से रात्रि भोज तक मे कुछ गलत ना हो जाये नहीं तो बेल्ट फिर काली से लाल हो जाएगी। पापा भूखे पेट खाली रात खा के सोना आसान नही होता। जि़न्दगी कचोटने लगती है। ऐसा लगता है दिन जल-जल के रात हो गई है और फिर लगता है दिन नही जि़न्दगी रात हो गयी है। अब शारीर और आत्मा साथ नही दे रहा है इसलिए पति को परमेश्वेर से मिला रही हू जैसे मे भी ख़ुशी से कह सकूं मेरे पति परमेश्वेर  हो गये।
पापा आज पति का जीवन मुक्त कर के आराम से भय मुक्त सोउगी  और कल से नया जीवन शुरू करुंगी इसलिए अगर आप ये मेल सुबह-सुबह पड़े तो प्लीज जगाइएगा नहीं जब उठुगी तो अपने आप पुलिस को बुला लूंगी।

आप की सदा
करुणा

Sunday, 18 December 2011

उधारी बंद


इच्छा – उठो, उठो। क्या सरकार की तरह हर समय सोते रहते हो। कभी तो कुछ काम भी कर लिया करो।
विकास – उठ गया भाग्यवान। सो नहीं सोच रहा था, विश्वास रखो।
इच्छा – एक बार विश्वास किया तो अभी तक भुगत रही हूं, वैसे किसी ने सही ही कहा है, विश्वास में ही विष का वास होता है।
विकास – क्या बोल रही हो?
इच्छा – बस। उठो। बिजली का भी बिल नहीं भरा है। अंधकार में जी रहे हैं। उफ! फिर सो गए। पूरे नेता हो गए हो। कितना भी सुना लो कोई असर नहीं।
विकास – क्या?
इच्छा – कुछ नहीं। सो जाओ।
विकास – सोया कहां हूं? चाय पिला दो।
इच्छा – घर में चाय की पत्ती भी नहीं है।
विकास – चाय नहीं तो उठूंगा कैसे?
इच्छा – जिस तरह से तुम घर को देश की तरह चला रहे हो, एक दिन हम भी उठ जाएंगे…
विकास – गरम पानी ही पिला दो, शायद उससे ही स्फूर्ति आ जाए। ये पानी भी क्या गजब चीज है? ऐसा लगता है कि ईश्वर ने हम लोगों के लिए ही बनाई है। हल्दी डाल दो तो दाल का काम करती है, वैसे ही पी लो तो चाय का काम करती है।
इच्छा – उफ! रुको लाती हूं। प्लीज अब मत सो जाना।
विकास – नहीं भाग्यवान नहीं। मेरी मजाल कि तुम्हारे रहते चैन की नींद ले लूं।
इच्छा - ये लीजिए, पीजिए और प्रवीण के यहां से सामान ले आइए जल्दी।
विकास – जल्दी ही जा रहा हूं। अब पानी भी चैन से पीने दोगी कि नहीं? गरम पानी में भी किट-किट। लाओ थैला लेकर आओ।
इच्छा – थैला किसलिए? किस जमाने में हैं आप? इसलिए कहती हूं कि कभी कभार घर का काम करते रहेंगे तो पता चलेगा कि महंगाई आबादी की तरह हर पल बढ़ रही है।
विकास – अरे यार! हर समय पत्रकारों की तरह उट पटांग मत बोला करो।
इच्छा – वो कागज की पुडिय़ा देगा, लेकर आ जाइएगा। अब जाइए।
विकास – आता हूं।
इच्छा – ठीक से जाइएगा। बच्चे क्रिकेट खेलते हैं बॉल न लग जाए। सड़क पर ध्यान रखिएगा। कार या बस न टक्कर मार दे। किसी पेड़ या किसी इंसान से मत टकरा जाना…..
(टहलते हुए हम प्रवीण की दुकान पर जा पहुंचे)
प्रवीण – अंकल जी नमस्कार।
विकास – खुश रहो।
(हम सदा बड़प्पन दिखाते हैं और आशीर्वाद दे देते हैं। कभी भी हम दान पुण्य में पीछे नहीं रहे)
प्रवीण – अंकल जी क्या सेवा करुं?
विकास – ये लो आपकी आंटीजी ने लिस्ट दी है। संडे को भी घर की ड्यूटी करते हैं।
प्रवीण – हा..हा…ह.ह.
विकास – अब लाद के ले जाएंगे घर।
प्रवीण – अरे कैसी बात कर दी। मैं किसी लड़के को भेज दूंगा।
विकास - अरे… ठीक है।
प्रवीण - अंकल जी एक बात पूछनी थी और समझनी थी।
विकास – पूछो।
प्रवीण – ये एफडीआई से मेरी परचून की दुकान बंद हो जाएगी क्या?
विकास – हा.. हा.. ह.ह. नहीं बंद क्यों होगी? तुम्हे कोई फर्क नहीं पड़ेगा। जो अच्छा काम करेगा उसका व्यापार अच्छा चलेगा।
प्रवीण – हं.. पर विदेशी कंपनियां तो काफी बड़ी होंगी।
विकास – हां तो उससे क्या?
प्रवीण – वो तो अधिक तादात में सामान खरीदेंगी। तो उन्हें सस्ता मिलेगा।
विकास – हां.. तो तुम भी खरीदो।
प्रवीण – हं.. टीवी वाले बोल रहे थे.. वो पांच-छह साल तक नुकसान सह सकती हैं।
विकास – हां.. तुम भी मुनाफा कम कर देना। बदमाश.. कितना कमाया है तुमने हमसे।
प्रवीण - अंकल जी .. पर वो तादात में लेंगे तो उन्हें वैसे ही सस्ता मिलेगा। उसमें भी वे कम दाम में बेचेंगे तो मैं किस दाम पर बेचूं्ंगा?
विकास – तुम भी उनकी तरह प्रोफेशनल हो ना… इससे तुम्हें भी फायदा होगा… हम जैसे ग्राहकों को भी। मेरी मानो किताबें पढ़ा करो। ज्ञान मिलेगा। प्रोफेशनल हो जाओ। भविष्य के लिए अच्छा होगा।
प्रवीण – हं..
विकास - अब हं छोड़ो… सामान घर पर पहुंचवा देना..
प्रवीण – विकास पहले की उधारी चुकाओ प्लस होम डिलीवरी चार्ज भी लगेगा।
विकास – अंकलजी से सीधे विकास.. और उधारी भी बंद? बेटा उधार बंद होगा तो घर कैसे चलेगा…
प्रवीण – आपने ही तो कहा, प्रोफेशनल हो जाओ…
विकास – हूं..
(प्रवीण प्रोफेशनल हो गया और हम इमोशनल हो गया)

Saturday, 15 October 2011

दस के चार

अहा.. एक और नई सुबह एक और नया दिन। एक और नया दिन संघर्ष के लिए बुलाता हुआ। मैं तैयार नहीं था शारीरिक तौर पर। मानसिक रूप से तो मैं कल रात से ही तैयार था। मेरा शरीर टूट रहा था। दिमाग दर्द फटा जा रहा था। बस एक ही शक्ति थी जो मुझे प्रेरित कर रही थी, वो थी राकेश की पढ़ाई। शायद इसलिए ही लोग ऊपर वाले की ताकत पर यकीन करते हैं कि वो निढाल शरीर से भी काम करवा सकता है। भविष्य का सपना दिखाके। यही सोचते हुए कि राकेश का ये आखिरी साल है, फिर आराम से उम्र कट जाएगी, जो बची हुई है। मैं अपना एकमात्र प्रिय बैग कंधे पर डालकर लोकल ट्रेन में चढ़ गया। और 10 रुपए में चार बॉलपेन बेचना शुरू कर दिया। इसमें ज्यादा कमाई तो नहीं थी पर गुजारा चल जाता था। इतने सालों से ट्रेन में बेचता आ रहा हूं कि कई तो हर तनख्वाह पर मुझसे ही पेन खरीदते थे। उनमें से कई लोग मुझे बहुत अच्छे लगते हैं, क्योंकि उनको मैंने अपनी आंखों के सामने बढ़ते देखा है। स्कूल से कॉलेज और अब ऑफिस उसी लोकल ट्रेन में। पर कई बार बड़ा दुखी होता था, जब बच्चे कई बार अपने आपको और माता-पिता को कोसते थे। कभी पूछो तो भरी हुई आवाज से कहते थे कि हमें पढ़ाया ही क्यों? हमें बचपन से कोई काम क्यों नहीं सिखाया। कम से कम सपने तो दफन हो जाते बचपन में और एक मंत्रमुग्ध करने वाली मुस्कान दे देते। मुझे गुस्सा आता पर मैं व्यक्त करता। कहीं मेरे हाथ से बंधे हुए ग्राहक न चले जाएं, क्योंकि हर (स्वार्थी) इंसान की तरह मुझे अपने जीवन से ज्यादा अपने ग्राहक प्यारे थे। और जो भी हो उनका अपना मामला है, मुझसे तो अच्छे से ही बात करते हैं। 10 रुपए के चार पेन .. 10 रुपए के चार पेन .. 10 रुपए के चार पेन … बोलते-बोलते रात की आखिरी लोकल ट्रेन से मैं आ गया कोलीवाड़ा। यही मेरी 10 बाय 10 की खोली है। हम सात दोस्त इसमें रहते हैं। बाहर के लोगों के लिए छोटी हो सकती है। पर हमारे लिए नहीं। यहां पर सात लोगों के सात परिवारों के सात सपने रहते हैं। जिसे खाली पेट में भी खोली बड़ी हसीन नजर आती है। बस यही अफसोस है 35 सालों में भी ये खोली घर नहीं बन पाई, क्योंकि हममें से कोई अपने परिवार के साथ नहीं रहता। मैं तकरीबन 15 साल का था, जब नौकरी करने बॉम्बे आया था। क्योंकि तब हमारे गांवों में काम नहीं था और आज भी। सच कहूं तो मैं यहां पर साहब बाबू बनने आया था, पर जब यहां आया तो पता चला कि 10वीं पास यहां चपरासी भी नहीं बन सकता। इसलिए मैं अपने लाल (राकेश) को कॉलेज करवा रहा हूं, वो भी बीएससी। जी हां बीएससी मैंने राकेश को आखिरी बार जब देखा था तो मात्र तीन महीने का था। उसके बाद मौका ही नहीं मिला। पैसे जोड़ते-जोड़ते आज वो बीएससी के आखिरी साल में आ गया। लेकिन ऐसा नहीं है कि मैं उसे नहीं जानता। वो लगातार खत भेजता रहता है और बताता रहता है कि हर दिन वो बड़ा हो रहा है और अम्मा बूढ़ी। चलिए यह बात यहीं खतम करता हूं, आंख में कुछ गिर गया है।
एक साल बाद-एकदम से ट्रेन रुकी और मेरा बेटा उतरा। आते ही उसने मेरे पैर छुए। और मुझ मूर्ख को समझ ही नहीं आया कि क्या करूं। मैं स्तब्ध खड़ा रहा। तीन महीने बच्चे से युवा का सफर कैसे निकल गया। और मैं देख भी न पाया। फिर दूसरे ही दिन से राकेश नौकरी ढूंढऩे लग गया। उसे मिलेगी। जरूर मिलेगी। क्योंकि नहीं मिलेगी। आखिर उसने बीएससी पास की है। बिल्कुल मिलनी चाहिए। वो थोड़ा परेशान रहने लगा है, मैं नहीं। मुझे यकीन है कि उसे नौकरी मिलेगी। मैं बिल्कुल भी चिंतित नहीं हूं। आज नहीं तो कल तो अवश्य ही उसे नौकरी मिल जाएगी। आखिर इतने सालों का संघर्ष हमारा व्यर्थ थोड़े ही जाएगा व ऊपर वाले के यहां देर है अंधेर थोड़े ही है। वह हमारे लिए भी कुछ करेगा। लेकिन अब कर ही दे। आंखों में मोतियाबिंद हो गया है। आंखें पूरी सफेद हों उससे पहले राकेश की नौकरी तो देख लूं। दिन से महीने हो गए हैं अब तो मुंबा देवी नौकरी तो दिला दें ये प्रार्थना कर सोच ही रहा था कि एक आवाज आई। बेहतरीन ऑफर, लाजवाब ऑफर। मुंबई में पहली बार 10 रुपए के पांच पेन। जी हां 10 के पांच पेन। एक बार लीजिए और पांच साल तक लिखिए। उस सख्श की आवाज में जोश था। जो शुरू में मेरी आवाज में हुआ करता था। मेरी अंदर जिज्ञासा जागृत हुई कि ये सख्श कौन है। भीड़ में से दूसरी तरफ देखा तो राकेश खड़ा पेन बेच रहा था। एकदम से चक्कर आया मैं और हमारे सपने कट गये….

चित्र www.google.com से लिया गया है।

Monday, 14 February 2011

हमारा भी

विनती - हैप्पी वेलंटाइन डे।
प्रयास
- हैप्पीजी तो सिंह थे, वेलंटाइन कब से हो गए?
विनती - उफ्फ! गलती हो गई।
प्रयास - गलती नहीं, ये तो पाप है। मैं तो धर्म परिवर्तन के बिल्कुल खिलाफ हूं..
विनती - अरे बाबा! किसी ने धर्म नहीं बदला है।
प्रयास - तो फिर हैप्पीजी को सिंह से वेलंटाइन क्यों बना दिया? किसी के लिए ऐसी बात करना अच्छी बात नहीं है।
प्रगति - हे.. हे! पापा! यू आर वेरी स्वीट.. मम्मी सही में आपने हैप्पी अंकल को बदनाम कर दिया, अभी तक तो मुन्नी ही बदनाम थी।
प्रयास - ये मुन्नी कौन है, और बदनाम क्यों हुई?
प्रगति - बस, हो गई... पापा अब मैं काम पर जा रही हूं..
प्रयास - विनती ! बच्ची कॉलेज पढऩे जाती है या काम करने? हर समय यही कहती है कि काम करने जा रही हूं तो पढऩे कब जाती है?
विनती - शाम को आएगी तब पूछ लेना, अभी 1200 रुपए दो।
प्रयास - हां पूछूंगा, पर 1200 रुपए किस बात के?
विनती - बच्ची के लिए ड्रेस खरीदी थी, घर के खर्चे में से।
प्रयास - क्या? क्यों? नये साल पर तो ली थी!
विनती - उफ्फ! कितने सवाल करते हो? वो न्यू इयर की पार्टी के लिए ली थी और ये वेलंटाइन की पार्टी के लिए।
प्रयास - अरे हर महीने इतने महंगे-महंगे कपड़े खरीदे जाएंगे क्या?
विनती- हर महीने नहीं। वो दिसंबर था और ये फरवरी है।
प्रयास - हां, एक महीने ही तो हुआ है, दिसंबर वाला ही पहन लेती।
विनती - कोई बच्चा त्यौहार पर पुराने कपड़े नहीं पहनता है।
प्रयास - हम तो पहनते हैं, और आज कौन सा त्यौहार है?
विनती - कोई सा नहीं, 1200 रुपए के लिए मैं अपना दिमाग नहीं चटा सकती...
प्रयास - चटा लो, कम से कम महंगाई के बहाने ही सही, बात तो कर रहे हैं। वरना उठो, चाय ले लो, नहा लिए?, टिफिन ले लो, आराम से जाना। आ गए, पानी ले लो, खाना खा लो, कितना टीवी देखोगे, सो जाओ, सुबह ऑफिस जाना है। इन चंद लाइनों के अलावा तो हमारे जीवन में कोई बात ही नहीं रह गई है।
विनती - ओहो! अब जाओ ऑफिस मुझे काम है।
प्रयास - चलता हूं। और सुनो आज शाम को जल्दी आऊंगा। आते वक्त आधा किलो प्याज लाऊंगा। मिलकर प्याज पकौड़े बनाएंगे और खाएंगे।
विनती - इतना खर्च क्यों?
प्रयास - क्यों? आज हैप्पीजी का ही नही हमारा भी तो वेलंटाइन डे है।

Monday, 31 January 2011

मैं क्यों हार मानूं

मैं क्यों हार मानूं।
मैं अभी हारा नहीं हूं।।
सूर्य में रोशनी है बाकी।
शरीर में रक्त बहाव है बाकी।।
मैं क्यों हार मानूं।
मैं अभी हारा नही हूं ।।
चंद्रमा में चमक है बाकी।
पैरों में चाल है बाकी।।
मैं क्यों हार मानूं ।
मैं अभी हारा नही हूं ।।
पृथ्वी में गति है बाकी।
मुझ में धैर्य है बाकी।।
मैं क्यों हार मानूं........

Monday, 15 November 2010

देंगे ना?

दरणीय परम पूज्यनीय देवो के देव महादेव को मै नेत्रहीन शंकर शत्त शत्त प्रणाम करता हूँ। काफी समय से आप को पत्र लिखने का सोच रहा था पर हिम्मत ही नही हुई । डर लगता था की जन्म लेने की गलती पर तो आप ने नेत्र खुलने से पहले ही बंद कर दिये कही कुछ और गलती कर दी तो ना जाने क्या दंड देंगे । पर अब डर नही लगता क्यों की अब समझ गया हूँ की नेत्रहीन से बड़ी सज़ा शायद नही हो सकती। आप ये कदापि ना समझे की यह पत्र आप की इस कृति की आलोचना करने के लिए लिख रहा हूँ क्यों की ना मुझ में क्षमता है ना इच्छा है।बस छोटा सा अनुरोध है की देश मै करोड़ो बच्चो के पास रोटी तक नही है सम्पूर्ण आहार ,स्वस्थय व शिक्षा की कल्पना तो करते ही नही है इसलिए कृपा निधान कुछ कीजिये एक रोटी का अधिकार तो दीजिये या आप भी हमे आधा अधुरा (कईयों को अंग नही और अधिकतरो की किस्मत नही) बना के भूल गये जैसे चुने हुए लोग हमें भूल गये और व्यस्त हो गये करोड़ो कमाने में कोई खेल के नाम पर कमा रहा है ,कोई शहीदों की विधवाओ की ज़मीं पर इमारते बना के और कोई करोडो की बईमानी कर के राजा बन रहा है और जनता गुलाम जो गरीब से गरीब होती जा रही है फिर कैसे हर दिन देश विकास दर पार कर रहा है जहाँ लाखो में किसान मर रहें है लाखो मै बेरोजगार घुट रहें है करोड़ो भूखे इन्सान सो रहें है, उस देश मै सेव टाइगर का नारा बुलंद हो रहा है
आशा करता हूँ यह पत्र पढने के पश्चात आप हमें अंधकार से, जीवन को सम्मान व दिशा देंगे,देंगे ना?अपने शब्दों को यही विराम देता हू कही आप को भी रोटी ओउटडेटेड ना लगने लगे और ओबामा की समस्या को बड़ा ना समझने लगे

आपका (हूँ ना ?)
शंकर

Friday, 5 November 2010

दिवाली

विद्या का प्रसार है दिवाली
धन की वर्षा है दिवाली
बुद्धि का प्रतिक है दिवाली
सच्चाई का नाम है दिवाली
खुशियों का आगमन है दिवाली
कल्पनाओ की उड़ान है
दिवाली
इच्छाओ का आकलन है दिवाली
क्षमताओ का विश्लेषण है
दिवाली

उम्मीदों की किरण है
दिवाली
बड़ो का आशीर्वाद है दिवाली
बच्चो की फुलझड़ी है दिवाली
बदमाशी का मैदान है दिवाली।।
दीपो की रौशनी है दिवाली
रंगोली का आकर्षण है दिवाली
बताशो की मिठास है दिवाली
अपनों का मिलन है दिवाली।।

Tuesday, 12 October 2010

कौन

म्मी सो रहा हू ,गुड नाईट
गुड नाईट अददु
आदित्य सो रहें हो
हाँ
कब तक सोगे ?
ओह बाउजी सोने दो ना क्यों नींद खराब कर रहें हो

अच्छा आप की नींद खराब हो रही है यहाँ हमारा बलिदान व्यर्थ हो रहा है

हद है, तमीज़ से बात कर रहा हूँ तो सर पे चढ़ रहें हो

मम्मी भी किसी को भी नौकर रख लेती है

सुनो अगर रूम से अभी नही गये तो मै अभी के अभी काम से निकाल बाहर करूंगा
फिर चाहें कितना भी रो नही रखूंगा, समझ जाओ और रूम से बाहर निकलो और दरवाज़ा बंद कर के जाना
आदित्य कौन सा दरवाज़ा? ये लकड़ी का दरवाज़ा तो मै बंद करदूंगा पर तुम्हारे मस्तिष्क का दरवाज़ा कौन खोलेगा?
यही प्रॉब्लम है तुम नौकरों के साथ इज्ज़त दे दी तो हज़म नही हो रही है

आदित्य मै नौकर नही हू मै चौरसिया हूँ व भारतीय हर किसी से तमीज़ से ही बात करते है,हम अँगरेज़ नही है जो छोटा बड़ा करे

ओये नौकर का नाम नही होता उसे नौकर ही कहते है हिंदी समझ नही आ रही हो तो सुन सर्वेंट, अब गले ना पड़

आदित्य तुम्हे अपने शब्द स्वयं सुनाई नही देते,सभ्य समाज के हो तो भाषा पर नियंत्रण रखो
रही नौकर की बात तो ये स्पष्ट कर दू कोई तुम्हारा नौकर नही है वो तुम्हारे सहायक है इसलिए क्यों की तुम स्वयं काम करने में सक्षम नही हो,और मै नौकर नही स्वतंत्रता सेनानी हूँ

क्या
क्या हुआ आदित्य पहली बार ये शब्द सुना?
नही कई बार भाषणों मै सुना है और कई बार पार्टियों मै भी यूज़ कीया है,यार तुम वो नही हो सकते

क्या नही हो सकता आदित्य
वही जो तुम ने कहा
आदित्य मै स्वतंत्रता सेनानी क्यों नहीं हो सकता और तुम यदि नहीं मानो तो मुझे कोई फरक नहीं पड़ता क्यों की मुझे किसी प्रमाण पत्र की आवश्यकता नहीं है

वो बात नही है पर तुम्हारा नाम कभी सुना भी तो नही

आदित्य तो मत मानो वैसे तुम ने कितने स्वतंत्रता सेनानियो के नाम सुने या पढ़े है?
ह्म्म्म ४-५
शाबाश
नही अराऊंड १०-१५ बट नोट श्युर
अच्छा तो तुम्हे लगता है २०० साल की गुलामी में सिर्फ १०-१५ ही स्वतंत्रता सेनानी थे,आज़ादी कोई पदक नही थी जो चंद लोग गये और जीत कर ले आये

अरे भड़क क्यों रहे हो?
नही आदित्य भड़क नही रहा हूँ बस हास्य पूर्ण लगता है की आज़ाद युवा में बस इतनी समझ है की किसी ने कुछ कह दिया और उसी को मान लिया

अरे जो देखेगे वही तो मानेगे

आदित्य मस्तिष्क जैसी चीज़ इश्वर ने हमे केवल रखने के लिए नही दी है

क्या
कुछ नही
नही अब जो बोलना है बोल दो ,नींद तो खराब कर ही दी

बस यूं ही धरती पे आज़ाद भारत को देखने आया था पर अब अफ़सोस हो रहा की क्यों आया

तुम लोग इतना अफ़सोस क्यों करते हो ,हर समय रोना रोना

आदित्य किस बात पर खुश हूँ की लाखो शहीदों ने जिन्हें निकालने के लिये अपना कण कण अर्पण कर दिया आज वो फिर मेरी धरती पर अपनी महारानी का सन्देश सुना के हमारे बलिदान पर सवाल उठा रहें है
चलो हमने जो क्या उसे छोड़ भी दे फिर भी आप सब को आत्मग्लानी क्यों नही हो रही है की आज़ाद भारत राष्ट्रमण्डल खेलो मै खेल रहा है?
पर आत्मग्लानी क्यों हो?
आदित्य
राष्ट्रमण्डल खेल १९३० में हेमिल्टन शहर, ओंटेरियो, कनाडा में आयोजित किए गए और इसमें ११ देशों के ४०० खिलाड़ियों ने हिस्सा‍ लिया। तब से हर चार वर्ष में राष्ट्रमंडल खेलों का आयोजन किया जाता है। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान इनका आयोजन नहीं किया गया था। इन खेलों के अनेक नाम हैं जैसे ब्रिटिश एम्पायर गेम्स, फ्रेंडली गेम्स और ब्रिटिश कॉमनवेल्थ गेम्स । वर्ष १९७८ से इन्हें सिर्फ कॉमनवेल्थ गेम्स या राष्ट्रमंडल खेल कहा जाता है। आज जब हम आज़ाद है फिर हमे इन खेलो में क्यों हिस्सा लेना चहिये हम किसी के अधीन नही है जो उनके गुलामो की पंक्ति मै खड़े रहें उनकी रानी का सन्देश सुने
उफ़ क्यों भाग ना ले हम कुछ ना कमाये $१८०० का खेल हम ने $७०,००० का करवा दिया,पहले गोरो ने नोचा अब हमारी बारी है


अददु उठो सुबह होगयी



अंग्रेजो को शहीदों ने भगाया और इन्हें कौन भगायेगा ..........

चित्र www.google.com से लिया गया है।