राजस्थान की रेत में बहा वह मासूम का खून सिर्फ़ एक बच्चे का नहीं, बल्कि इस राष्ट्र के आत्मसम्मान पर किया गया प्रहार है। बाड़मेर की यह घटना हमें झकझोर देती है—सिर्फ़ आठ वर्ष के एक दलित बालक को इसलिए पीटा गया और पेड़ से उल्टा लटकाया गया क्योंकि उसने पानी का घड़ा छू लिया! सोचिए, यह 21वीं सदी का भारत है, जहाँ चाँद पर तिरंगा लहराता है, लेकिन ज़मीनी सच्चाई में अभी भी जातिगत घृणा की जंजीरें इंसानियत का गला घोंट रही हैं।
भाखरपुरा गाँव में नरनाराम प्रजापत और देमाराम प्रजापत जैसे दरिंदों ने मानवता को शर्मसार कर दिया। पहले उस नन्हे से बालक को बाथरूम साफ़ करने और कचरा उठाने का आदेश दिया, और जब उसने प्यास से तड़पकर पानी माँगा और घड़े को छू लिया, तब उसके छोटे-से शरीर पर लाठियाँ बरसाईं। क्या यही धर्म है? क्या यही संस्कृति है? क्या किसी जलघट को छू लेने से जाति का अपमान हो जाता है?
जब बच्चा छटपटा रहा था, जब उसका शरीर हवा में उल्टा लटका कर पीटा जा रहा था, तब इस समाज की अंतरात्मा कहाँ सो रही थी? उसकी माँ पुरी देवी और दादी ने बीच-बचाव किया तो उन पर भी हमला कर दिया गया। क्या मातृत्व का दर्द भी इस पिशाच प्रवृत्ति को नहीं रोक पाया?
यह घटना सिर्फ़ अपराध नहीं है, यह पाप है, यह वह अधर्म है जिसे न समाज सहन कर सकता है और न ही राष्ट्र। "पानी का घड़ा" यहाँ प्रतीक है उस व्यवस्था का, जो आज भी कुछ हाथों को शुद्ध और कुछ को अशुद्ध मानती है। यह सोच हमें विभाजित करती है और भारत की आत्मा को घायल करती है।
सवाल यह है कि आखिर कब तक हम जाति की बेड़ियों में बँधे रहेंगे? कब तक किसी दलित, किसी शोषित, किसी वंचित को इंसान होने का अधिकार छीन लिया जाएगा? यह समय केवल संवेदना व्यक्त करने का नहीं, बल्कि प्रचंड रोष से उठ खड़े होने का है।
राजस्थान पुलिस ने एक आरोपी को गिरफ्तार किया है, दो हिरासत में हैं। लेकिन क्या इतनी ही कार्रवाई से न्याय मिलेगा? क्या पीढ़ियों से दलितों पर ढाए जा रहे अन्याय का प्रायश्चित इतनी आसानी से संभव है?
आज ज़रूरत है कि इस अपराध को सामान्य अपराध न मानकर ‘सामाजिक विद्रोह के अपराध’ के रूप में देखा जाए। कठोरतम दंड, सार्वजनिक निंदा और चेतना की क्रांति—यही इस ज़हर का उपचार है।
भारत का हर नागरिक इस नन्हे शिशु की पीड़ा को अपनी पीड़ा माने और प्रण ले कि इस देश में किसी जलघट को छूने पर कोई बच्चा फिर कभी अपमानित न हो। यह लड़ाई सिर्फ़ उस बच्चे की नहीं, बल्कि "भारत की आत्मा" की है।
यह अन्याय नहीं रुकेगा जब तक हम रौद्र बनकर अन्याय की जड़ों को उखाड़ न फेंकें।
No comments:
Post a Comment