माँ,
नमस्कार।
कुछ कहना है, पर समझ नहीं आ रहा कि कैसे कहूँ। शब्द साथ नहीं दे रहे। फिर भी लिख रहा हूँ, क्योंकि चुप रहना अब और बड़ा अपराध लगता है। सबसे पहले यही कहना है—माँ, हमें क्षमा करना। हम जानते हैं कि हम गलतियाँ कर रहे हैं। यह भी जानते हैं कि बार-बार क्षमा माँगना अब शायद पर्याप्त नहीं है। क्योंकि आज समस्या अज्ञान की नहीं, उदासीनता की है। और जब समाज उदासीन हो जाता है, तब दंड केवल वर्तमान नहीं, भविष्य भी भुगतता है।
माँ, आज यह पत्र अरावली के संदर्भ में लिख रहा हूँ। वही अरावली, जिसने सदियों से राजस्थान, हरियाणा, गुजरात और दिल्ली-एनसीआर की भूमि को संतुलन दिया। जिसने जल को रोका, मिट्टी को थामा और पश्चिमी भारत को मरुस्थल बनने से बचाए रखा। यह कोई भावनात्मक दावा नहीं, बल्कि पर्यावरणीय अध्ययनों और सरकारी रिपोर्टों में दर्ज तथ्य हैं।
हाल ही में देश की सर्वोच्च अदालत ने यह निर्देश दिया है कि अरावली की पहचान अब वैज्ञानिक मानकों के आधार पर की जाएगी। इसके तहत केवल वही भू-भाग अरावली का हिस्सा माना जाएगा, जिसकी स्थानीय ऊँचाई 100 मीटर या उससे अधिक है। केंद्र सरकार और चार संबंधित राज्यों—दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान और गुजरात—को संयुक्त रूप से एक वैज्ञानिक परिभाषा और स्थायी प्रबंधन योजना तैयार करने का आदेश दिया गया है। इस अवधि में नई खनन लीज़ों पर रोक लगाई गई है और केवल पहले से वैध खानों को सीमित अनुमति दी जा सकती है।
कानून की भाषा स्पष्ट है। उद्देश्य भी स्पष्ट है—खनन और विकास को नियंत्रित करना तथा पर्यावरणीय प्रबंधन को बेहतर बनाना। लेकिन माँ, प्रकृति कानून की परिभाषाओं में नहीं बँधती। अरावली की छोटी-छोटी पहाड़ियाँ, जो इस नई परिभाषा में बाहर हो सकती हैं, पारिस्थितिकी के लिए उतनी ही महत्वपूर्ण हैं जितनी ऊँची चोटियाँ। यह बात पर्यावरण विशेषज्ञों और वैज्ञानिक अध्ययनों में बार-बार सामने आई है।
यह तथ्य भी दर्ज है कि अरावली क्षेत्र भूजल रिचार्ज, मिट्टी संरक्षण और जैव विविधता के लिए एक प्राकृतिक ढाल का काम करता है। दिल्ली-एनसीआर की वायु गुणवत्ता, राजस्थान का जल संतुलन और पश्चिमी भारत का पर्यावरणीय स्थायित्व इस पर्वतमाला से सीधे जुड़ा हुआ है। इन क्षेत्रों में पहले से हो चुके अनियंत्रित खनन और भूमि उपयोग ने अरावली को कमजोर किया है—यह भी सरकारी और मीडिया रिपोर्टों में स्वीकार किया गया तथ्य है।
माँ, चिंता इस बात की नहीं है कि नियम बनाए गए हैं। चिंता इस बात की है कि कहीं संरक्षण को केवल माप और ऊँचाई तक सीमित न कर दिया जाए। जो 100 मीटर से कम है, वह कम महत्वपूर्ण नहीं हो जाता। प्रकृति में कोई हिस्सा छोटा नहीं होता।
यह पत्र किसी आरोप के लिए नहीं है। यह किसी संस्था या निर्णय के विरोध में भी नहीं है। यह केवल एक नागरिक की अपनी ही भूमि के प्रति चिंता है। विकास आवश्यक है, लेकिन विकास का अर्थ यदि संतुलन का टूटना बन जाए, तो उसकी कीमत बहुत भारी होती है—यह इतिहास और विज्ञान दोनों सिखाते हैं।
माँ, शायद अब दंड हमारा भाग्य बन चुका है—सूखते जल स्रोत, बढ़ता तापमान और बिगड़ता पर्यावरण। फिर भी यदि संभव हो, तो हमें सुबुद्धि देना, ताकि निर्णय लेते समय हम केवल आज नहीं, आने वाली पीढ़ियों को भी देख सकें। ताकि विकास और विनाश के बीच का अंतर हमें स्पष्ट दिखाई दे।
यह पत्र किसी भावुकता का नहीं, बल्कि तथ्यों और चिंता का दस्तावेज़ है। आशा बस इतनी है कि अभी भी समय है।
माँ,
यदि अब भी संभव हो—
तो हमें सुबुद्धि दीजिए।
आपका
आदित्य तिक्कू

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