Sunday, 21 December 2025

अरावली: कानून की रेखाएँ और प्रकृति की पीड़ा

 माँ,

नमस्कार।
कुछ कहना है, पर समझ नहीं आ रहा कि कैसे कहूँ। शब्द साथ नहीं दे रहे। फिर भी लिख रहा हूँ, क्योंकि चुप रहना अब और बड़ा अपराध लगता है। सबसे पहले यही कहना है—माँ, हमें क्षमा करना। हम जानते हैं कि हम गलतियाँ कर रहे हैं। यह भी जानते हैं कि बार-बार क्षमा माँगना अब शायद पर्याप्त नहीं है। क्योंकि आज समस्या अज्ञान की नहीं, उदासीनता की है। और जब समाज उदासीन हो जाता है, तब दंड केवल वर्तमान नहीं, भविष्य भी भुगतता है।


माँ, आज यह पत्र अरावली के संदर्भ में लिख रहा हूँ। वही अरावली, जिसने सदियों से राजस्थान, हरियाणा, गुजरात और दिल्ली-एनसीआर की भूमि को संतुलन दिया। जिसने जल को रोका, मिट्टी को थामा और पश्चिमी भारत को मरुस्थल बनने से बचाए रखा। यह कोई भावनात्मक दावा नहीं, बल्कि पर्यावरणीय अध्ययनों और सरकारी रिपोर्टों में दर्ज तथ्य हैं।

हाल ही में देश की सर्वोच्च अदालत ने यह निर्देश दिया है कि अरावली की पहचान अब वैज्ञानिक मानकों के आधार पर की जाएगी। इसके तहत केवल वही भू-भाग अरावली का हिस्सा माना जाएगा, जिसकी स्थानीय ऊँचाई 100 मीटर या उससे अधिक है। केंद्र सरकार और चार संबंधित राज्यों—दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान और गुजरात—को संयुक्त रूप से एक वैज्ञानिक परिभाषा और स्थायी प्रबंधन योजना तैयार करने का आदेश दिया गया है। इस अवधि में नई खनन लीज़ों पर रोक लगाई गई है और केवल पहले से वैध खानों को सीमित अनुमति दी जा सकती है।

कानून की भाषा स्पष्ट है। उद्देश्य भी स्पष्ट है—खनन और विकास को नियंत्रित करना तथा पर्यावरणीय प्रबंधन को बेहतर बनाना। लेकिन माँ, प्रकृति कानून की परिभाषाओं में नहीं बँधती। अरावली की छोटी-छोटी पहाड़ियाँ, जो इस नई परिभाषा में बाहर हो सकती हैं, पारिस्थितिकी के लिए उतनी ही महत्वपूर्ण हैं जितनी ऊँची चोटियाँ। यह बात पर्यावरण विशेषज्ञों और वैज्ञानिक अध्ययनों में बार-बार सामने आई है।

यह तथ्य भी दर्ज है कि अरावली क्षेत्र भूजल रिचार्ज, मिट्टी संरक्षण और जैव विविधता के लिए एक प्राकृतिक ढाल का काम करता है। दिल्ली-एनसीआर की वायु गुणवत्ता, राजस्थान का जल संतुलन और पश्चिमी भारत का पर्यावरणीय स्थायित्व इस पर्वतमाला से सीधे जुड़ा हुआ है। इन क्षेत्रों में पहले से हो चुके अनियंत्रित खनन और भूमि उपयोग ने अरावली को कमजोर किया है—यह भी सरकारी और मीडिया रिपोर्टों में स्वीकार किया गया तथ्य है।

माँ, चिंता इस बात की नहीं है कि नियम बनाए गए हैं। चिंता इस बात की है कि कहीं संरक्षण को केवल माप और ऊँचाई तक सीमित न कर दिया जाए। जो 100 मीटर से कम है, वह कम महत्वपूर्ण नहीं हो जाता। प्रकृति में कोई हिस्सा छोटा नहीं होता।

यह पत्र किसी आरोप के लिए नहीं है। यह किसी संस्था या निर्णय के विरोध में भी नहीं है। यह केवल एक नागरिक की अपनी ही भूमि के प्रति चिंता है। विकास आवश्यक है, लेकिन विकास का अर्थ यदि संतुलन का टूटना बन जाए, तो उसकी कीमत बहुत भारी होती है—यह इतिहास और विज्ञान दोनों सिखाते हैं।

माँ, शायद अब दंड हमारा भाग्य बन चुका है—सूखते जल स्रोत, बढ़ता तापमान और बिगड़ता पर्यावरण। फिर भी यदि संभव हो, तो हमें सुबुद्धि देना, ताकि निर्णय लेते समय हम केवल आज नहीं, आने वाली पीढ़ियों को भी देख सकें। ताकि विकास और विनाश के बीच का अंतर हमें स्पष्ट दिखाई दे।

यह पत्र किसी भावुकता का नहीं, बल्कि तथ्यों और चिंता का दस्तावेज़ है। आशा बस इतनी है कि अभी भी समय है।

माँ,
यदि अब भी संभव हो—
तो हमें सुबुद्धि दीजिए।

आपका
आदित्य तिक्कू

Friday, 19 December 2025

भीख और आर्थिक निर्भरता: पाकिस्तान का दर्पण

 सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात से लगातार सामने आ रही ख़बरें केवल प्रवासी नियमों के उल्लंघन की सूचना नहीं हैं, बल्कि वे पाकिस्तान के राज्य-चरित्र पर लगे एक गहरे प्रश्नचिह्न की तरह हैं। खाड़ी देशों में बड़ी संख्या में पाकिस्तानी नागरिकों का भीख माँगते या आपराधिक गतिविधियों में लिप्त पाया जाना कोई आकस्मिक सामाजिक विचलन नहीं है, बल्कि वर्षों से सड़ते चले आ रहे आर्थिक, राजनीतिक और नैतिक ढाँचे का स्वाभाविक परिणाम है। यह वही परिणाम है, जिसे समय रहते यदि राज्य ने देखा होता, तो आज अंतरराष्ट्रीय मंचों पर ऐसी शर्मनाक चेतावनियाँ सुनने की नौबत न आती।


विडंबना यह है कि जिस देश के नागरिक आज विदेशों में हाथ फैलाते दिखाई दे रहे हैं, उसी देश की सरकारें दशकों से अंतरराष्ट्रीय संस्थानों के सामने कटोरा लेकर खड़ी रही हैं। आईएमएफ, वर्ल्ड बैंक, सऊदी अरब और चीन—हर दरवाज़े पर पाकिस्तान की आर्थिक नीति ने आत्मनिर्भरता की नहीं, बल्कि स्थायी याचना की भाषा बोली है। सत्ता बदली, चेहरे बदले, नारे बदले, पर अर्थव्यवस्था का मूल स्वभाव नहीं बदला। हर सरकार ने यह दावा किया कि वह कटोरा तोड़ देगी, लेकिन व्यवहार में केवल उसका रंग बदला गया और उसे कभी ‘लोन’, कभी ‘बेलआउट’ तो कभी ‘डिपॉज़िट’ का सम्मानजनक नाम दे दिया गया।

जब राज्य स्वयं अपने अस्तित्व के लिए बार-बार बाहरी सहायता पर निर्भर हो, तब समाज के निचले पायदान पर खड़ा नागरिक आत्मसम्मान की कौन-सी पाठशाला से निकलेगा? खाड़ी देशों में पहुँचे ये भिखारी केवल व्यक्तिगत विफलता की कहानी नहीं हैं, वे उस सामूहिक मानसिकता का प्रतिबिंब हैं जिसे वर्षों से यह सिखाया गया कि देश में मेहनत से नहीं, सिफ़ारिश, जुगाड़ या पलायन से ही जीवन चल सकता है। यह मानना भोलेपन के अतिरिक्त कुछ नहीं कि सख़्त वीज़ा प्रक्रियाओं के बावजूद इतनी बड़ी संख्या में लोग वहाँ यूँ ही पहुँच गए। इसके पीछे एक सुनियोजित तंत्र, एक संगठित माफिया और एक मौन राज्य-संरक्षण की बू स्पष्ट दिखाई देती है।

देश के भीतर भी दृश्य अलग नहीं है। साफ़ पीने का पानी तक खरीदने को विवश नागरिक, बेरोज़गारी से त्रस्त युवा, अपर्याप्त वेतन पर जीवन ढोते कर्मचारी और घर बचाने के लिए संपत्ति बेचते परिवार—ये सभी उस आर्थिक पतन के संकेत हैं जिसे लंबे समय तक राजनीतिक नारों से ढका गया। जब जीवन यापन स्वयं संघर्ष बन जाए, तब अपराध और भीख नैतिक पतन नहीं, बल्कि मजबूरी के औज़ार बन जाते हैं। यही कारण है कि भीख के साथ-साथ चोरी, ऑनलाइन फ्रॉड और आर्थिक अपराधों की प्रवृत्ति भी तेज़ी से बढ़ी है, देश के भीतर भी और बाहर भी।

सऊदी अरब और यूएई की चेतावनियों को किसी साज़िश के चश्मे से देखना आत्म-प्रवंचना होगी। ये चेतावनियाँ दरअसल उस आईने की तरह हैं, जिसमें पाकिस्तान को अपना वास्तविक चेहरा देखने का अवसर मिला है। दुर्भाग्य यह है कि कुछ संगठित गिरोहों और असफल नीतियों की कीमत अब पूरे राष्ट्र को चुकानी पड़ रही है। यदि वीज़ा दरवाज़े बंद होते हैं, तो उसका दुष्प्रभाव उन लाखों ईमानदार पाकिस्तानियों पर पड़ेगा, जिनका इन गतिविधियों से कोई लेना-देना नहीं है।

इस संकट से निकलने का मार्ग बाहर नहीं, भीतर है। जब तक राज्य स्वयं भीख की मानसिकता से मुक्त नहीं होगा, तब तक नागरिकों से आत्मसम्मान की अपेक्षा करना छल होगा। कटोरा केवल नागरिकों के हाथ से नहीं, सबसे पहले सत्ता के हाथ से गिराना होगा। आर्थिक आत्मनिर्भरता, जवाबदेह शासन और गरिमापूर्ण रोज़गार के बिना यह विडंबना और गहराती जाएगी—और इतिहास दर्ज करेगा कि जिस देश की सरकारें दुनिया से माँगती रहीं, उसी देश के नागरिक पूरी दुनिया में माँगते फिरते रहे।

चिकन नेक नहीं, वज्ररेखा: भारत की वह सीमा जिसे छूना भी दुस्साहस है

 आजकल बांग्लादेश की सड़कों पर भारत-विरोध के नारे गूंज रहे हैं। शरीफ उस्मान हादी की मृत्यु के बाद भड़की हिंसा ने एक बार फिर यह प्रश्न खड़ा कर दिया है कि क्या यह आक्रोश केवल भावनात्मक उबाल है, या इसके पीछे कोई सुनियोजित रणनीतिक दुष्प्रचार छिपा है? ढाका, चटगांव सहित अनेक शहरों में भारतीय दूतावासों और सहायक उच्चायोगों के बाहर जिस प्रकार पत्थरबाज़ी, आगजनी और धमकियों का प्रदर्शन हुआ—वह चिंता का विषय अवश्य है, किंतु उससे अधिक यह एक भ्रमपूर्ण आत्ममुग्धता का संकेत देता है।


प्रदर्शनकारियों के नारों में एक शब्द बार-बार उछला—सिलीगुड़ी कॉरिडोर, जिसे वे ‘चिकन नेक’ कहकर भारत की रणनीतिक कमजोरी बताने का प्रयास कर रहे हैं। यहाँ तक कि भारत के उत्तर-पूर्वी राज्यों को अलग-थलग करने और इस गलियारे को काट देने जैसी उन्मादी घोषणाएँ भी की गईं। परंतु प्रश्न यह है—क्या ये नारे जमीनी हकीकत से टकराने की क्षमता रखते हैं?

उत्तर स्पष्ट है—बिल्कुल नहीं।

सिलीगुड़ी कॉरिडोर: भूगोल नहीं, भारत की संकल्प-रेखा

भारत के मानचित्र पर पश्चिम बंगाल के उत्तरी छोर पर स्थित सिलीगुड़ी कॉरिडोर मात्र 20–22 किलोमीटर चौड़ा अवश्य है, पर इसका सामरिक महत्व अपार है। यही वह जीवनरेखा है, जो भारत की मुख्य भूमि को असम, अरुणाचल प्रदेश, नागालैंड, मणिपुर, मिज़ोरम, मेघालय, त्रिपुरा और सिक्किम से जोड़ती है। लगभग साढ़े चार करोड़ नागरिकों का जीवन, राष्ट्र की सैन्य आपूर्ति, आर्थिक संपर्क और प्रशासनिक एकता—सब इसी से होकर प्रवाहित होते हैं।

दक्षिण में बांग्लादेश, पश्चिम में नेपाल, उत्तर में भूटान और उससे आगे चीन की चुंबी घाटी—यह क्षेत्र भौगोलिक रूप से जितना संवेदनशील है, उतना ही रणनीतिक रूप से सुदृढ़ भी।

बांग्लादेश की सियासत और भारत-विरोध का उभार

2024 में शेख हसीना सरकार के पतन और मुहम्मद यूनुस के नेतृत्व में अंतरिम व्यवस्था के बाद बांग्लादेश की राजनीति अस्थिरता के दौर से गुजर रही है। इसी अस्थिरता में भारत-विरोध को एक सहज बलि का बकरा बनाया जा रहा है। हादी की मृत्यु के बाद भारत पर उंगलियाँ उठाना, जबकि हसीना भारत में शरण लिए हुए हैं—यह राजनीतिक अवसरवाद का परिचित खेल है।

चीन और पाकिस्तान के साथ बढ़ती निकटता के संकेत भी दिए जा रहे हैं, किंतु यह सब शब्दों की कूटनीति से अधिक कुछ नहीं।

भारत की तैयारी: ‘चिकन नेक’ से ‘आयरन फोर्ट्रेस’ तक

भारत ने सिलीगुड़ी कॉरिडोर को कभी कमजोरी मानकर नहीं छोड़ा। पिछले एक दशक में इसे अभेद्य सैन्य दुर्ग में परिवर्तित कर दिया गया है।

  • नए सैन्य ठिकाने:
    असम के धुबरी में लाचित बोरफुकन मिलिट्री स्टेशन, बिहार के किशनगंज और पश्चिम बंगाल के चोपड़ा में नए गैरिसन—तेज़ तैनाती और चौकसी के लिए।
  • आधुनिक सैन्य शक्ति:
    हाशिमारा एयरबेस पर तैनात राफेल लड़ाकू विमान, ब्रह्मोस सुपरसोनिक मिसाइल रेजिमेंट, S-400 वायु रक्षा प्रणाली—यह केवल हथियार नहीं, बल्कि स्पष्ट संदेश हैं।
  • बहुस्तरीय सुरक्षा संरचना:
    ट्रिशक्ति कोर, ब्रह्मास्त्र कोर, मैकेनाइज्ड इन्फैंट्री, पैरा स्पेशल फोर्सेज और उन्नत एयर डिफेंस—पूर्वी कमान की संपूर्ण शक्ति यहाँ एकत्र की जा सकती है।

सेना के वरिष्ठ अधिकारियों के शब्दों में—
“आज सिलीगुड़ी भारत की सबसे सशक्त रक्षा पंक्ति है, जहाँ आक्रमण नहीं, केवल घेराबंदी संभव है—और वह भी हमलावर की।”

वैकल्पिक संपर्क और भूटान की भूमिका

भारत ने एक और महत्वपूर्ण कदम उठाया है—निर्भरता का विकेंद्रीकरण। नए रेल-रोड नेटवर्क, म्यांमार के माध्यम से समुद्री मार्ग, नेपाल और बांग्लादेश के रास्ते वैकल्पिक कनेक्टिविटी—सब पर कार्य प्रगति पर है।

इसके साथ ही भूटान जैसा भरोसेमंद मित्र भारत के साथ खड़ा है। डोकलाम संकट ने यह स्पष्ट कर दिया कि भूटानी भूमि का भारत-विरोधी उपयोग केवल कल्पना है।

खुफिया तंत्र और सीमा सुरक्षा

RAW, IB, सैन्य खुफिया एजेंसियाँ, उपग्रह निगरानी, AI-आधारित सर्विलांस, स्मार्ट फेंसिंग, थर्मल कैमरे—BSF, SSB और ITBP की संयुक्त तैनाती के साथ किसी भी असामान्य गतिविधि पर रीयल-टाइम प्रतिक्रिया संभव है।

चीन-पाकिस्तान-बांग्लादेश: संयुक्त खतरा या संयुक्त भ्रम?

यह तर्क बार-बार उछाला जाता है कि यदि चीन और पाकिस्तान मिलकर दबाव बनाएं तो भारत कठिनाई में पड़ सकता है। किंतु तथ्य इसके विपरीत हैं—

  • पाकिस्तान भौगोलिक रूप से अप्रासंगिक दूरी पर है।
  • चीन के लिए भारत-भूटान-नेपाल के जटिल भूगोल के बीच सीधी सैन्य कार्रवाई लगभग असंभव है।
  • डोकलाम के बाद चीन भलीभांति समझ चुका है कि भारत न तो रणनीतिक रूप से, न कूटनीतिक रूप से पीछे हटता है।

निष्कर्ष: भ्रम टूटेगा, भारत अडिग रहेगा

आज सिलीगुड़ी कॉरिडोर कोई संकरी भूमि नहीं, बल्कि सैन्य शक्ति, कूटनीति, आधारभूत संरचना और तकनीक का संगम है। जो इसे काटने की धमकी दे रहे हैं, उन्हें पहले यह समझना होगा कि उनके अपने देश में इससे कहीं अधिक नाज़ुक ‘चिकन नेक’ मौजूद हैं।

2017 के डोकलाम से लेकर आज तक भारत ने बार-बार यह सिद्ध किया है कि यह क्षेत्र कमजोरी नहीं, रणनीतिक आत्मविश्वास का प्रतीक है।

भारत का संदेश स्पष्ट है—
धमकियाँ शोर हैं, तैयारी सत्य है।
और सिलीगुड़ी—अब केवल गलियारा नहीं, राष्ट्र की दृढ़ इच्छाशक्ति है।

जय माँ भारती!

Thursday, 11 December 2025

नैतिकता का दंड या कुंठित समाज का खेल?

आज समाज की दशा यह है कि दूसरों की खुशी हमें चुभने लगी है और दूसरों के दुःख में हमें आनंद प्राप्त होता है। सोचिए—एक पड़ोसी अपने घर में उत्सव मना रहा है, कोई मित्र अपनी सफलता का जश्न मना रहा है, और हम अपने भीतर की अधूरी इच्छाओं, असंतोष और कड़वाहट को उनकी मुस्कान पर उंडेल रहे हैं। कभी कहा जाता था कि शत्रु भी पर्व-त्योहार पर विराम ले लेता है, पर आज हमारी मानसिकता ऐसी हो गई है कि दूसरों की प्रसन्नता ही हमें खटकने लगी है। इसी बेरहम मानसिकता की भेंट चढ़ी है इंद्रेश उपाध्याय जी की शादी—जिस दिन उनके जीवन का सबसे सुंदर क्षण होना चाहिए था, उस दिन हमने समाज के रूप में अपनी ही खोखली मानसिकता का प्रदर्शन कर दिया।


पिछले चंद दिनों में जिस तरह से उनकी ट्रोलिंग और आलोचना हुई, वह केवल उनके व्यक्तित्व का नहीं, हमारी आत्मा का एक्सपोज़र है। हमने यह दिखा दिया कि हम दूसरों के सुख में असहिष्णु और दूसरों के दुःख में प्रफुल्लित होना सीख चुके हैं। स्मृति मंधाना की शादी टूटी तो उनके पुराने वीडियो वायरल किए गए; अब वही मानसिकता इंद्रेश जी के साथ लागू हो रही है। जिस दिन उन्हें आशीर्वाद और दुआओं की जरूरत थी, उस दिन हमने अपने भीतर की जलन और कड़वाहट का परिचय दिया।

इंद्रेश उपाध्याय कौन हैं? कोई फिल्मी सितारा, अरबपति, उद्योगपति या राजनेता नहीं। वे एक सौम्य, विनम्र गृहस्थ-कथावाचक हैं। उनके पिताजी ने जीवन भर कथा कही और वही संस्कार उनके भीतर पले-बढ़े। पर समाज ने उनके विवाह को तमाशा बना दिया—हेलीकॉप्टर उतरा, सजावट महंगी, होटल भव्य!—यह प्रश्न नहीं है। समस्या यह है कि धर्म से जुड़े व्यक्ति का सुख और सम्मान हमारी आँखों में खटकता है।

इस देश के खिलाड़ी दो-दो, तीन-तीन विवाह कर लेते हैं, करोड़ों खर्च कर देते हैं, खुलेआम अनैतिक जीवनशैली अपनाते हैं—और हम उन्हें आदर्श मानते हैं। बॉलीवुड सितारे फूहड़ता, नशा, ड्रग्स, बहुविवाह और खुले संबंध अपनाते हैं—फिर भी हमारे आइडल बन जाते हैं। पर कथावाचक यदि सामान्य गृहस्थ जीवन में खुशी ले, अच्छे कपड़े पहनें, परिवार के साथ जीवन जिए, तो वही समाज नैतिकता का डंडा उठा देता है।

सबसे विषैले हमले उनके निजी जीवन, उनकी पत्नी के अतीत और परिवार पर किए गए। किसी स्त्री के संघर्ष, उसके दुःख, उसके निर्णय—यह सब हमने कंटेंट बनाकर वायरल किया। क्या हमें इस बात का ज्ञान है कि वास्तविकता क्या है? नहीं। फिर भी हम न्यायाधीश बन बैठे हैं।

पुरानी कथाएँ, पुराने ऑडियो, पुराने बयान—इन सबको काट-छाँट कर प्रस्तुत कर दिया गया। क्या हम यह सोचते हैं कि कोई भी मानव अपने जीवन में अपरिपक्व क्षण नहीं बिताता? विचार समय के साथ बदलते हैं, पर समाज ने तय कर दिया कि उनके दो पुराने वाक्यों से पूरी जिंदगी की छवि तय होगी। यही समाज की नैतिक गिरावट है।

कथावाचक समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचते हैं। वे अपने यजमान से कमाते हैं, हम नहीं देते। कोई अपनी धनराशि से यात्रा करता है, दान करता है, कथा करवाता है—यह उसका अधिकार है। परंतु कथावाचक पर सवाल उठाना, उनके निजी जीवन पर तीर चलाना, उनकी पत्नी और परिवार पर निशाना साधना—यह समाज की नैतिकता नहीं, केवल भीतर की खोखली कुंठा है।

धर्म मंच से नहीं मरता। धर्म तब मरता है जब किसी की खुशी देखकर हमारे भीतर शांति नहीं बचती। आज हमने इंद्रेश जी के सबसे पवित्र दिन को अपवित्र बनाने का प्रयास किया। कल यही भीड़ किसी और घर पर हमला करेगी। और जिस दिन यह लक्ष्य हमारा परिवार होगा, यह भीड़ हमारे साथ नहीं होगी।

इंद्रेश उपाध्याय कोई सन्यासी नहीं, बल्कि सामान्य गृहस्थ कथावाचक हैं। उन्हें उतना ही सुख, सम्मान और गरिमा का अधिकार है जितना हमें। यदि उनकी खुशी हमें चुभती है, समस्या उनके सुख में नहीं—हमारी सोच में है।

अपनी सोच बदलिए। अपनी कुंठा त्यागिए। और दूसरों को जीने दीजिए। यही समाज का सबसे बड़ा धर्म है।

इंद्रेश जी और उनकी पत्नी को हमारी ओर से हार्दिक शुभकामनाएँ। सुखी रहें, प्रसन्न रहें और समाज भी कम से कम इतना तो समझे कि किसी की खुशी अपराध नहीं होती।

जय माँ भारती


Sunday, 7 December 2025

सपनों का आसमान बिक गया, फर्श पर रह गया इंसान

 कभी कहा गया था कि “हवाई चप्पल पहनने वाला भी हवाई जहाज़ में दिखना चाहिए।” यह वाक्य केवल चुनावी नारा नहीं था, यह आम आदमी के हक का, उसकी आकांक्षा का और देश के उजले आसमान का प्रतीक था। लेकिन आज वही आसमान एक निजी एयरलाइन की मनमानी का शिकार बन गया है। एयरपोर्ट पर लोग भूखे, थके, और असहाय फर्श पर पड़े हैं। गर्भवती महिलाएं दर्द से तड़प रही हैं। कोई पिता अपनी बेटी के लिए लहूलुहान होकर मदद मांग रहा है। कोई पति अपनी पत्नी का ताबूत लेकर हरिद्वार में अंतिम संस्कार तक नहीं पहुँच पा रहा। कोई अपनी शादी के रिसेप्शन से छूट गया है। यह दृश्य किसी तकनीकी खराबी का नहीं, किसी प्राकृतिक आपदा का नहीं—यह इंडिगो के अहंकार और सुनियोजित ब्लैकमेल का प्रत्यक्ष प्रमाण है।


इंडिगो, जिसके पास भारत के घरेलू हवाई बाजार का लगभग 65–68 प्रतिशत हिस्सा है, 3 दिसंबर से 7 दिसंबर तक देशभर में उड़ानों को रद्द कर जनता को बंधक बना रहा। पांच दिनों में हजारों फ्लाइट रद्द हुईं, लाखों यात्री फंसे, अरबों रुपये का नुकसान हुआ, और सबसे बड़ा नुकसान हुआ—सामान्य नागरिकों के सपनों और भरोसे का। स्क्रीन पर बार-बार चमकता “कैंसिल्ड” शब्द किसी यात्री की आँखों में भरी पीड़ा की व्याख्या कर रहा था। मुंबई, दिल्ली, बेंगलुरु, अहमदाबाद से लेकर छोटे शहर गुवाहाटी, भुवनेश्वर, रांची तक—हर जगह यही दृश्य। जो टिकट 3,000 रुपये की थी, वह 4–5 हज़ार तक पहुंच गई। लोग ट्रेन की जनरल बोगियों का सहारा लेने को मजबूर हुए। जो फंस गए, वे फर्श पर पड़े, भूखे-प्यासे और थके हुए।

यह घटना सिर्फ मुनाफाखोरी नहीं थी। यह एक सुनियोजित ब्लैकमेलिंग रणनीति थी। नागरिक उड्डयन महानिदेशालय(Directorate General of Civil Aviation)ने जुलाई 2025 में पायलटों की सुरक्षा के लिए नए नियम लागू किए। हर पायलट को पर्याप्त आराम, सीमित रात की ड्यूटी और सप्ताह में 48 घंटे की छुट्टी का अधिकार मिला। एयर इंडिया, अकासा, विस्तारा और स्पाइसजेट ने नियमों का पालन करते हुए पायलटों की भर्ती बढ़ाई। केवल इंडिगो ने विरोध किया। उसके पास प्रति विमान केवल 13 पायलट थे, जबकि अन्य एयरलाइंस में यह संख्या 19–26 थी। नियम लागू होते ही अधिक पायलट रखने पड़ते और मुनाफा घटता। इसका हल खोजने के बजाय उसने देश और यात्रियों को बंधक बनाना चुना।

सरकार को मजबूर होना पड़ा कि वह नियम स्थगित करे। यात्रियों की सुरक्षा, पायलटों की नींद, अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा मानक—सबके लिए आड़े हाथ आए। यह केवल इंडिगो की जीत नहीं थी; यह भारतीय व्यवस्था की हार थी। यह दिखाता है कि जब मुनाफा इंसान की जान से बड़ा हो जाता है, तो जनता की पीड़ा तुच्छ हो जाती है। एयरपोर्ट पर लेटे लोग केवल यात्री नहीं, वे उस व्यवस्था का आईना हैं जिसने अपने नागरिक को असहाय छोड़ दिया।

सबसे दुखद यह था कि क्रोध और निराशा निर्दोष ग्राउंड स्टाफ पर उतरी, जबकि असली दोषी एयरकंडीशंड दफ्तरों में बैठे बयान दे रहे थे। गर्भवती महिलाएं, कैंसर मरीज, अंतिम संस्कार से वंचित लोग, शादी और यात्रा से छूटे युवकों—इनकी कीमत केवल “हम खेद व्यक्त करते हैं” जैसी औपचारिकताओं में समेट दी गई।

यह घटना केवल इंडिगो की समस्या नहीं है। यह पूरे भारतीय तंत्र की कमजोरी का सबक है। क्या एक निजी कंपनी इतनी ताकतवर हो सकती है कि वह पूरे देश को ब्लैकमेल कर दे और नियम बदलवा ले? क्या भारतीय नागरिक और उसकी सुरक्षा केवल आर्थिक आंकड़ों के लिए बलिदान हो सकते हैं? जब हवाई चप्पल पहनने वाले का सपना फर्श पर टूटता है और हवाई जहाज़ केवल अमीरों का प्रतीक बन जाता है, तब स्पष्ट होता है कि देश की नीतियाँ कमजोर हैं और कंपनियाँ अत्यधिक ताकतवर।

आज यह संदेश साफ है—राष्ट्र तब तक सशक्त नहीं होगा जब तक न्याय, करुणा और जवाबदेही सत्ता और बाज़ार के बीच संतुलित न हों। यात्रियों की थकान, उनकी पीड़ा, उनके अधूरे संस्कार और बिखरे हुए सपनों को केवल “माफी” कहकर छिपाया नहीं जा सकता। यह भारत का शर्मनाक क्षण है। यदि अब सुधार नहीं हुआ, तो यह केवल इंडिगो की जीत नहीं, बल्कि एक पूरे भारत की हार होगी।

फर्श पर बिखरे इंसान, थकान और आंसू में लिपटे,
सपनों का आसमान अब सिर्फ मुनाफ़े का खेल बन गया।
जहाँ करुणा की कीमत नहीं, वहां न्याय भी रुक जाता है,
और रोष का गीत सिर्फ खामोशी में गूँजता रह जाता है।

Wednesday, 26 November 2025

जब इतिहास झुका और आस्था विजयी हुई: अयोध्याजी का महाकालिक क्षण

 अयोध्याजी में बीते उस क्षण को शब्दों में पिरोना आसान नहीं। उस समय की अनुभूति इतनी गहन थी कि मैं लिख ही नहीं सका—मन भर आया था, गला रुँध गया था और भावनाएँ इस कदर उमड़ीं कि कलम भी ठहर गई। आज, थोड़ा सँभलकर, उस अलौकिक पल को शब्द देने का प्रयास कर रहा हूँ।


अयोध्याजी की पावन धरा पर जो दृश्य उतरा, वह केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं था—वह पाँच सौ वर्षों की वेदना, संघर्ष, अपमान और बलिदान का प्रतिफल था। वह क्षण उस इतिहास का समाधान था जिसे विदेशी आक्रांताओं की तलवारों ने लिखा था, और जिसे भारतीय समाज ने पीढ़ियों तक अपने हृदय में एक जलते हुए अंगारे की तरह सँजोया था।

यह वह क्षण था जहाँ आँसू भी थे और आकाश भी।
जहाँ स्मृति भी थी और संकल्प भी।
जहाँ अतीत रो रहा था और भविष्य खड़ा होकर प्रण ले रहा था।

पाँच सदियों का सूखा और वह क्षणभंगुर वर्षा

पाँच सौ वर्षों की अवधि कोई छोटी नहीं होती।
यह वह काल था जिसमें—

  • मंदिर टूटा, पर आस्था नहीं टूटी।
  • केंद्र गिरा, पर केंद्र का अर्थ जीवित रहा।
  • शिलाएँ बिखरीं, पर स्मृति अक्षत रही।

कितने ही संतों ने अपने प्राण अर्पित किए, कितने कारसेवकों ने गोलियाँ खाईं, कितने परिवार अपने बच्चों को खोकर भी रामनाम की लौ बुझने नहीं दी।
उनके त्याग, दर्द और धैर्य ने जो इतिहास रचा, उसी का जागरण उस दिन अयोध्याजी में दिखाई दिया।

वह दृश्य ऐसा था जैसे पाँच सदियों का सूखा अचानक पिघलकर वर्षा बन गया हो—दुगुने वेग से, दुगुने उजास से।

अयोध्याजी उस दिन केवल नगर नहीं थी—वह चेतना बन गई थी

दीपों की अनगिनत पंक्तियाँ
मानो किसी स्वर्गीय भू-सज्जा का आकार ले चुकी थीं।

हर दीप ऐसा लगता था जैसे किसी कारसेवक की आँख बोल रही हो—
“देखो, हमने तुम्हारे लिए तमाम दुष्टता झेली,
पर हार नहीं मानी।
आज हमारी देह नहीं, पर हमारी तपस्या तुम्हारे सामने जगमगा रही है।”

हवा में उठते मंत्र नहीं,
स्वयं युगों की पुकार थी।

वहाँ उपस्थित हर आत्मा चाहे जो भी विचार रखती हो—
उस क्षण वह स्वयं से बड़ी किसी शक्ति का अंग बन गई थी।
लोगों की आँखें उसी मौन संवाद को पढ़ रही थीं जिसे केवल इतिहास की अनुभूति ही समझा सकती है।

राम का लौटना केवल मंदिर की घटना नहीं—भारतीय आत्मा की पूर्णता है

राम किसी मूर्ति, किसी दीवार, किसी धातु या किसी संरचना का नाम नहीं हैं।
राम वह नैतिक-आध्यात्मिक आदर्श हैं जो इस भूमि की रगों में बहते हैं।

और जब पाँच सौ वर्षों के बाद
राम अयोध्याजी में पुनः प्रतिष्ठित हुए—
तो केवल देवालय नहीं लौटा,
भारतीय आत्मा का स्वर लौटा।

राम का लौटना
समय की पराजय पर सत्य की विजय थी।
राम का लौटना
आक्रांताओं पर अखंड संस्कृति का वर्चस्व था।
राम का लौटना
पीढ़ियों के तप और बलिदान की नैतिक मान्यता थी।

वह क्षण भारतीय समाज को एक सूत्र में बाँध गया

जब वह दृश्य सामने आया, तो यह बात स्पष्ट हो गई—
भारत कई विचारों का देश हो सकता है,
पर उसकी आत्मा एक ही है—राम।

उस क्षण कोई भी व्यक्ति पुराना भारतीय नहीं रहा,
वह नया भारतीय बन गया—
जो अपने इतिहास को जानता भी है और उसे पुनः लिखने का साहस भी रखता है।

वहाँ कोई विजेता नहीं,
कोई पराजित नहीं—
वहाँ केवल सम्पूर्ण भारत था,
जिसका हृदय एक साथ धड़क रहा था।

आज कलम थमी नहीं—इतिहास स्वयं लिखवा रहा है

आज जब मैं लिख पा रहा हूँ,
तो यह मेरे शब्द नहीं—
समय के कंधों पर रखा गया वह उत्तरदायित्व है
कि इस क्षण को इतना सजीव लिखा जाए
कि सौ वर्ष बाद पढ़ने वाला भी उसी भाव-सागर में डूब जाए
जिसमें हम कल डूबे थे।

क्योंकि अयोध्याजी का यह क्षण केवल हमारे लिए नहीं,
आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रकाशस्तंभ है।

यह वह क्षण है जो कहता है:

“आस्था पर आक्रमण हो सकता है,
पर आस्था पराजित नहीं होती।
सत्य देर से लौट सकता है,
पर जब लौटता है, तो शताब्दियों को रोशन करके लौटता है।”

Monday, 3 November 2025

स्वप्न से स्वर्ण तक — भारत की बेटियों का महागौरव

 "At the stroke of the midnight hour, when the world sleeps, India will awake to life and freedom."

पंडित जवाहरलाल नेहरू के इन अमर शब्दों से अपनी बात प्रारंभ करता हूँ — क्योंकि  2 नवंबर 2025 की आधी रात, जब नवी मुंबई के आकाश में तिरंगा लहरा रहा था, तब सचमुच भारत फिर एक बार जीवन और स्वतंत्रता के नए अर्थ के साथ जाग उठा था।


वह सिर्फ़ कप जीत की खुशी नहीं थी — वह भारत माता की उन असंख्य बेटियों का सिर ऊँचा करने का क्षण था, जिनसे सदियों से कहा जाता रहा — “यह तुम्हारे बस की बात नहीं।”
मगर उस रात मैदान में खड़ी हरमनप्रीत, स्मृति, शेफाली, दीप्ति, अमनजोत और उनकी समूची टोली ने इस वाक्य को इतिहास बना दिया। उन्होंने सिद्ध कर दिया कि सीमाएँ केवल मैदान की नहीं होतीं, वे सोच की भी होती हैं — और भारतीय नारी ने अब सोच की हर सीमा तोड़ दी है।

यह जीत गेंद और बल्ले की नहीं, आत्मा और साहस की विजय है।
यह उस माँ की आँखों की चमक है, जो अब अपनी बेटी से कह सकेगी — “हाँ, तुम कर सकती हो।”
यह उस पिता के विश्वास की लौ है, जो अब संदेह में नहीं, गर्व में जियेगा।

आज से यह देश अपनी बेटियों को सिर्फ़ फूलों में नहीं, फौलाद में भी देखेगा।
अब कोई बेटी “लड़का होकर ही” नहीं, बल्कि “लड़की होकर भी” मैदान में उतरेगी और तिरंगे को ऊँचा उठाएगी।

पहले जो लोग महिला क्रिकेटरों को उनके चेहरे या “वायरल रील” से पहचानते थे, अब उन्हें उनके कवर ड्राइव, यॉर्कर और रनआउट्स से पहचानेंगे।
अब “नेशनल क्रश” शब्द किसी चेहरे से नहीं, बल्कि कप्तान के जुनून और ऑलराउंडर के साहस से जुड़ा होगा।

जिस तरह 1983 में कपिल देव की टीम ने भारत को विश्व क्रिकेट का विजेता बनाया था, उसी तरह 2025 में हरमनप्रीत कौर की यह वीरांगना-सेना भारत को महिला क्रिकेट की महाशक्ति बना चुकी है।
दोनों जीतें दो युगों की नहीं, एक ही आत्मा की अभिव्यक्ति हैं — विश्वास की, संघर्ष की, राष्ट्रगौरव की।

जब यह ट्रॉफी भारत ने जीती, तो हर घर का आँगन दीपोत्सव बन गया।
किसी ने हँसकर बधाई दी, किसी ने रोकर।
और 3 नवंबर की सुबह जब सूरज निकला, तो ऐसा लगा मानो उसकी पहली किरण कह रही हो —
“अब भारत की बेटियाँ इतिहास नहीं, भविष्य लिखेंगी।”

अब हर बच्ची के सपनों में बल्ला और तिरंगा साथ-साथ होंगे।
वह कहेगी — “मुझे स्मृति मंधाना बनना है… हरमनप्रीत जैसी कप्तान बनना है… दीप्ति जैसी ऑलराउंडर बनना है।”

यह मात्र एक जीत नहीं — यह उद्घोष है कि भारत की बेटियाँ अब किसी मंच की सीमित परिधि में नहीं बंधेंगी।
उनका क्षितिज अब आसमान नहीं — उसके भी पार है।

जय माँ भारती!

Wednesday, 15 October 2025

मेरी दीदी ऐसी नहीं हो सकती: बंगाल में इंसानियत का जनाज़ा

 पश्चिम बंगाल—मां दुर्गा की भूमि, शक्ति की आराधना का प्रदेश, रविंद्रनाथ टैगोर और सुभाष चंद्र बोस की धरती—आज बेटियों के लिए नरक बन चुकी है। दुर्गापुर का आईक्यू सिटी मेडिकल कॉलेज, 10 अक्टूबर 2025 की रात, इस पीड़ा का सबसे कड़वा सबूत है। 23 वर्षीय एमबीबीएस छात्रा, इंसानियत बचाने के लिए डॉक्टर बनने निकली, पांच दरिंदों के हाथों सामूहिक बलात्कार का शिकार बनी।

और उसके बाद क्या हुआ? हमारी महिला मुख्यमंत्री, हमारी “मेरी दीदी”, कहती हैं: “लड़की रात को बाहर क्यों निकली?”
ऐसी संवेदनहीनता की कल्पना भी नहीं की जा सकती। दीदी, यह आप कैसे कह सकती हैं? क्या आप सचमुच यह मानती हैं कि अपराधियों की फितरत बदल जाएगी अगर बेटियां घर की चारदीवारी में कैद रहें? क्या अपराधियों को लाइसेंस देने की यह नैतिकता है?

यह पहली बार नहीं है। 2012 की पार्क स्ट्रीट घटना, 2013 का मॉल मामला, 2015 में 72 वर्षीय नन के साथ बलात्कार, 2022 की हंसखाली की बर्बर हत्या—हर बार दोष पीड़िता पर ठहराया गया। बंगाल में बलात्कार, एसिड अटैक और यौन अपराधों में साल-दर-साल वृद्धि हो रही है। 2023 में राज्य में दर्ज बलात्कार मामले 1010, नाबालिक 27। एसिड अटैक के मामले 57, जो देश में सबसे अधिक हैं।

दीदी, आपकी संवेदनहीनता की हद देखिए—पीड़िता के जख्मों पर नमक छिड़कना और अपराधियों के हौंसले बढ़ाना। आपकी पार्टी की फेमिनिस्ट महिला नेता भी खामोश हैं। संसद में बेटियों के हक की बात करने वाले, अपने राज्य में बेटियों की चीख क्यों नहीं सुनते? क्या यह पाखंड नहीं, या चरम दुष्टता है?

रविवार, 10 अक्टूबर 2025 की रात:
23 वर्षीय छात्रा, दोस्त के साथ खाना खरीदने निकली। कॉलेज गेट पर फोन छीन लिया गया, घसीटा गया और जंगल में ले जाया गया। पांच दरिंदों ने सामूहिक बलात्कार किया। और पुलिस? या सरकार? किसी ने सुरक्षा नहीं दी।

दीदी, क्या आप यही सोचती हैं कि बेटियों को घर में कैद करना ही सुरक्षा है? क्या बंगाल में अपराधियों को खुली छूट दी जाएगी, बस इसलिए कि आप सोचती हैं पीड़िता दोषी है?

दुर्गापुर की यह घटना केवल बिंदु नहीं है, यह पूरे राज्य की नाकामी का प्रतीक है। हर साल, हर महीने, हर दिन—पीड़ितों के आंसू, उनकी चीखें, उनके जख्म आपकी संवेदनहीनता की वजह से बढ़ते हैं।

दीदी, यह सोच केवल महिला मुख्यमंत्री के लिए शर्मनाक नहीं है, यह मानवता की हत्या है। क्या हम स्वीकार करेंगे कि बेटियों की सुरक्षा और न्याय सिर्फ एक राजनीतिक वाक्य या आंकड़े बनकर रह गया है? क्या हम सहेंगे कि आपकी संवेदनहीनता अपराधियों को हौंसला देती रहे, और पीड़ित हमेशा दोषी बनी रहे?

गुंडों की हिम्मत, पुलिस की नींद, और आपकी संवेदनहीनता—तीनों ने मिलकर बंगाल में बेटियों के लिए नरक बना दिया है।
दुर्गापुर ही नहीं, हंसखाली, संदेशखाली, राणाघाट—हर जगह वही कहानी। हर जगह अपराधी बेखौफ। हर बार वही तर्क—पीड़िता दोषी, अपराधी बेकसूर।

अब सवाल यह है—मेरी दीदी, कब तक आप खुली बाज़ार में बेटियों के अपमान को सहेंगी? कब तक बेटियों को घर की चारदीवारी में कैद रहकर अपनी इज्जत बचानी होगी? कब तक अपराधी बेखौफ घूमते रहेंगे और आपकी सरकार उनका ढाल बनेगी?

पश्चिम बंगाल में नैतिकता का पतन नहीं हुआ, इंसानियत का जनाज़ा निकल चुका है।
अब वक्त है, जनता की आवाज़ उठाने का। सड़क से संसद तक, घर से हर मंच तक, बेटियों के हक के लिए लड़ना पड़ेगा। और हर नागरिक की जिम्मेदारी है कि वह इस जनाज़े का विरोध करे।

मेरी दीदी, ऐसी नहीं हो सकती!
संवेदनहीनता की यह सीमा पार नहीं हो सकती। अपराधियों को बचाना, पीड़ित को दोषी ठहराना, मीडिया पर हमला—यह सब अस्वीकार्य है। बंगाल की बेटियों के लिए न्याय चाहिए, सुरक्षा चाहिए, और सबसे बड़ी आवश्यकता—संवेदनशील नेतृत्व की।

Sunday, 28 September 2025

ट्रॉफी से परे: भारत की आत्मसम्मान यात्रा

 टी20 एशिया कप 2025 का फाइनल केवल एक खेल नहीं था। यह मुकाबला हार-जीत से कहीं ऊपर, भारत के सम्मान, आत्मसम्मान और संस्कारों का था। मैं खुद इन मैचों का बहिष्कार करने का निर्णय कर चुका था और आज भी उस विचार पर कायम हूँ। लेकिन भारतीय टीम ने प्रेजेंटेशन में जो प्रदर्शन किया, उसने मेरे जैसी सोच रखने वाले हर भारतीय का मन मोह लिया और गौरव से भर दिया।


सूर्यकुमार यादव, शुभमन गिल, अभिषेक शर्मा, हार्दिक पांड्या और पूरी टीम ने बिना ट्रॉफी के ट्रॉफी का जश्न मनाकर पाकिस्तान की नफरत और आतंकवाद पर टिकी मानसिकता के सामने खुला तमाचा दिया। मोहसिन नकवी के हाथों से ट्रॉफी न लेने का निर्णय केवल खेल का नहीं, बल्कि राष्ट्रीय गौरव और विचारधारा का प्रतिपादन था। यह कदम स्पष्ट करता है कि भारत अब केवल मैदान पर ही नहीं, बल्कि हर मंच पर पाकिस्तान की नापाक हरकतों और प्रोपेगेंडा को बेनकाब करेगा।

भारतीय खिलाड़ियों की हर चाल, हर रणनीति और हर प्रदर्शन ने यह स्पष्ट किया कि भारत खेल के नाम पर राजनीति करने वाले पाकिस्तान को कभी नजरअंदाज नहीं करेगा। बुमराह की गति, तिलक वर्मा का आक्रामक अंदाज, हार्दिक पांड्या का आत्मविश्वास—ये सभी भारत की ताकत और रणनीति का जीवंत प्रमाण थे। मैदान पर यह प्रदर्शन न केवल पाकिस्तान को चुनौती देने वाला था, बल्कि यह हमारी सांस्कृतिक, राजनीतिक और राष्ट्रीय चेतना की जीत भी थी।

बीसीसीआई द्वारा घोषित 21 करोड़ का पुरस्कार ऑपरेशन सिंदूर और पाकिस्तान को हराने की रणनीति का प्रतीक है। हर चौका, हर रन और हर फोटो ने पाकिस्तान की अहंकारी मानसिकता और खेल को गंदी राजनीति का हिस्सा बनाने की कोशिश को नकारा। आज यह स्पष्ट हो गया कि भारत केवल सीमाओं पर ही नहीं, बल्कि हर मंच पर अपनी विचारधारा, गौरव और आत्मसम्मान की रक्षा करने के लिए सशक्त है।

यह मैच केवल क्रिकेट का नहीं था। यह देश की आन, मान और शान का युद्ध था। पाकिस्तान ने वर्षों से खेल को अपनी नापाक राजनीति का हथियार बनाया। लेकिन इस बार भारतीय टीम ने मैदान पर, सोशल मीडिया पर और हर फोटो में स्पष्ट संदेश दिया—ना सिर्फ खेल, बल्कि विचारधारा, संस्कार और राष्ट्रीय आत्मसम्मान की जीत हुई है।

यह वह पल है जो आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा बनेगा और याद दिलाएगा कि भारत किसी भी दुश्मन को हर मोर्चे पर चुनौती देने और उसका जवाब देने में सक्षम है।

भारत माता की जय। जय हिंद।

Saturday, 13 September 2025

कल देशभक्ति छुट्टी पर रहेगी

 कल भारत और पाकिस्तान के बीच क्रिकेट का तमाशा है। वही पाकिस्तान जिसने हमारी धरती पर गोलियाँ बरसाईं, हमारे सैनिकों को शहादत की आग में झोंका, और हर बार पीठ में खंजर घोंपा। और हम? हम उनके साथ खेलेंगे। चौकों-छक्कों पर झूमेंगे। विज्ञापनों से पैसा कमाएँगे। खुद को खेल-प्रेमी बताकर चैन की नींद सोएंगे। यह कैसी विडंबना है—शहीदों की चिताएँ अभी भी धधक रही हैं, और हम दुश्मन के साथ बल्ला घुमा रहे हैं।

कहते हैं—“स्पोर्ट्स मस्ट गो ऑन।” लेकिन सवाल यह है—क्या खेल देश से बड़ा है? क्या क्रिकेट का कारोबार शहीदों के लहू से ऊपर है? यह कैसी आत्मवंचना है कि ट्विटर पर हैशटैग चलाकर, प्रोफ़ाइल फोटो बदलकर, काली पट्टी बाँधकर हम अपनी जिम्मेदारी पूरी समझ लेते हैं और अगली ही घड़ी टीवी स्क्रीन से चिपक जाते हैं। बिरयानी और हलवे के बीच देशभक्ति का स्वाद कब तक खोजा जाएगा?


शहीद परिवार की आँखों से पूछिए। तिरंगे में लिपटे बेटे को विदा करने वाली माँ को क्या फर्क पड़ता है कि सूर्यकुमार ने कितने रन बनाए, या गेंदबाज़ ने कितनी विकेट लीं? उस विधवा से पूछिए जिसकी माँग से सिंदूर मिटा दिया गया—क्या पाकिस्तान पर क्रिकेट की जीत उसका दर्द कम कर सकती है? नहीं। उनके लिए यह खेल तमाचा है। हर चौका, हर छक्का उनके बलिदान पर तिरस्कार है, क्योंकि इसमें उनका क़र्ज़ भूलकर दुश्मन को गले लगाया जाता है।

सच यही है—कल देशभक्ति छुट्टी पर होगी। मैदान में बल्ला गूँजेगा। स्टेडियम में तालियाँ बजेंगी। टीवी पर विज्ञापन चमकेंगे और करोड़ों रुपये बरसेंगे। लेकिन कहीं कोई माँ अपने बेटे की तस्वीर देखकर रोएगी, कहीं कोई बच्चा अपने पिता की वर्दी के बिना सोएगा। और हम उस दर्द को अनदेखा करके दुश्मन के साथ खेलेंगे—जैसे कुछ हुआ ही न हो।

देशभक्ति ट्वीट की मोमबत्ती नहीं है जो तीन महीने में बुझ जाए। यह त्याग और तपस्या की आग है, जिसे हर पल जलाए रखना पड़ता है। क्रिकेट का यह कारोबार उस आग पर राख डालने का काम करता है। असली सवाल यही है—हम दुश्मन के साथ खेलकर किसे धोखा दे रहे हैं? पाकिस्तान को? नहीं। खुद को।

कल की जीत या हार स्कोरबोर्ड पर नहीं, हमारे विवेक पर दर्ज होगी। और इतिहास पूछेगा—उस दिन देशभक्ति मैदान में थी या छुट्टी पर?

 

Tuesday, 9 September 2025

नेपाल : संयोग की आड़ में प्रयोग?

 नेपाल की धरती बीते 48 घंटों में जिस उथल-पुथल से गुज़री, उसने पूरे दक्षिण एशिया को चौंका दिया। महज़ सोशल मीडिया बैन से उपजा जनाक्रोश इस सीमा तक पहुँच गया कि प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति को देश छोड़कर भागना पड़ा, संसद भवन धधक उठा और पूरी व्यवस्था चरमरा गई। प्रश्न उठता है—क्या यह केवल युवाओं का स्वतःस्फूर्त विद्रोह था या किसी गहरे प्रयोग की परिणति?


एशिया में अस्थिरता का पैटर्न

यदि हाल के वर्षों पर दृष्टि डालें तो एक स्पष्ट पैटर्न दिखाई देता है—

  • 2021 : म्यांमार में आंग सान सू की की सरकार गिरती है।
  • 2022 : श्रीलंका में राजपक्षे सत्ता से भागते हैं।
  • 2024 : बांग्लादेश में छात्र-आंदोलन शेख हसीना को सत्ता से बाहर कर देता है।
  • 2025 : नेपाल की सत्ता मात्र दो दिनों में भरभराकर गिर जाती है।

क्या यह सब केवल संयोग है?

आचार्य चाणक्य का संकेत

आचार्य चाणक्य नीति (अध्याय १०, श्लोक ६) में कहते हैं—

“अनपेक्षितं यद्भवति तत्तत्र दैवसंयोगः।
यत्र पुनः पुनः लाभः स यत्नप्रयोजनः॥”

(अर्थ: जो घटना अप्रत्याशित रूप से घटित हो, वह संयोग या दैवयोग कहलाती है; किन्तु जहाँ बार-बार समान प्रकार का लाभ किसी पक्ष को होता है, वहाँ यह समझना चाहिए कि उसके पीछे निश्चित ही प्रयत्न और प्रयोजन—षड्यंत्र या योजना—छिपी है।)

एशिया में छोटे देशों की बार-बार अस्थिरता—कभी चीन-निकट सरकार गिरती है, कभी अमेरिका-विरोधी नेतृत्व हटता है—क्या चाणक्य के इस सूत्र को प्रमाणित नहीं करती?

डीप स्टेट और रंग-बिरंगे आंदोलन

आजकल “डीप स्टेट” शब्द बहुत प्रचलित है। यह वही अदृश्य तंत्र है जिसमें खुफ़िया एजेंसियाँ, बड़े कॉर्पोरेट, अंतरराष्ट्रीय एनजीओ और मीडिया मिलकर किसी राष्ट्र की राजनीति को अपनी दिशा में मोड़ते हैं। पश्चिम इसे कलर रिवोल्यूशन कहते हैं।

  • जॉर्जिया का रोज़ रिवोल्यूशन,
  • यूक्रेन का ऑरेंज रिवोल्यूशन,
  • हांगकांग का अम्ब्रेला मूवमेंट—

इन सबमें युवाओं को सोशल मीडिया के माध्यम से संगठित कर लोकतंत्र के नाम पर सत्ता परिवर्तन कराया गया। नेपाल की हाल की हलचल भी वैसी ही प्रतीत होती है।

बांग्लादेश और नेपाल : अद्भुत समानता

2024 में बांग्लादेश का छात्र-आंदोलन भी एक छोटे ट्रिगर—कोटा प्रोटेस्ट—से शुरू हुआ था। कुछ ही सप्ताह में वह भयंकर रूप लेकर शेख हसीना सरकार को निगल गया। नेपाल में भी चार सितंबर को अमेरिकी ऐप्स पर प्रतिबंध लगाया गया, और देखते-देखते 8-9 सितंबर को संसद पर हमला हो गया। दोनों जगह आंदोलन लीडरलेस और विकेन्द्रित (डिसेंट्रलाइज्ड) रहे, परंतु संगठन और समन्वय अद्भुत।

क्या यह महज़ संयोग है कि हर जगह परिणाम वही निकला—सरकार का पतन, सत्ता का परिवर्तन और विदेशी हितों का साधन?

भारत के लिए चेतावनी

भारत के चारों ओर का भू-राजनीतिक परिदृश्य अस्थिरता से भरा हुआ है—पाकिस्तान, श्रीलंका, म्यांमार, बांग्लादेश और अब नेपाल। प्रश्न यह है कि क्या यह अस्थिरता केवल आंतरिक विफलताओं का परिणाम है या भारत-विरोधी शक्तियों का सुनियोजित प्रयोग?

भारत का लोकतंत्र मज़बूत है, सेना और संस्थाएँ सुदृढ़ हैं। परंतु इतिहास गवाह है कि बड़ी शक्तियाँ जब छोटे देशों को मोहरे की तरह खेल सकती हैं, तो भारत को भी अस्थिर करने की कोशिशें असंभव नहीं। ऐसे में भारत को केवल अपनी सीमाओं पर ही नहीं, बल्कि पड़ोसियों में स्थिरता सुनिश्चित करने में भी सक्रिय भूमिका निभानी होगी।

आगे का मार्ग

नेपाल के युवाओं की माँगें जायज़ हो सकती हैं—भ्रष्टाचार और दमनकारी नीतियों का विरोध स्वाभाविक भी है—परंतु संसद भवन को आग लगाकर, अपने ही संसाधनों को नष्ट कर, कोई भी राष्ट्र मज़बूत नहीं बनता। आंदोलन तभी सार्थक होते हैं जब वे राष्ट्र-निर्माण की दिशा में ले जाएँ, न कि राष्ट्र-विनाश की ओर।

नेपाल को आज ठहरकर सोचना होगा कि वह स्वतंत्र भविष्य का निर्माण करना चाहता है या किसी विदेशी शक्ति की चालों में मोहरा बनना।

भारत को भी सजग रहना होगा, क्योंकि यह केवल नेपाल का संकट नहीं—यह पूरे दक्षिण एशिया की स्थिरता की परीक्षा है।

अंतिम बिंदु

नेपाल की यह उथल-पुथल क्या केवल संयोग है या किसी गहरे प्रयोग का परिणाम? चाणक्य का सूत्र हमें सचेत करता है कि जब घटनाएँ बार-बार एक ही दिशा में लाभ पहुँचाएँ, तो यह समझ लेना चाहिए कि उसके पीछे किसी की योजना, किसी का प्रयोजन और किसी की साजिश अवश्य है।

Sunday, 31 August 2025

जाति की प्यास बुझाने को मासूम का रक्त!

 राजस्थान की रेत में बहा वह मासूम का खून सिर्फ़ एक बच्चे का नहीं, बल्कि इस राष्ट्र के आत्मसम्मान पर किया गया प्रहार है। बाड़मेर की यह घटना हमें झकझोर देती है—सिर्फ़ आठ वर्ष के एक दलित बालक को इसलिए पीटा गया और पेड़ से उल्टा लटकाया गया क्योंकि उसने पानी का घड़ा छू लिया! सोचिए, यह 21वीं सदी का भारत है, जहाँ चाँद पर तिरंगा लहराता है, लेकिन ज़मीनी सच्चाई में अभी भी जातिगत घृणा की जंजीरें इंसानियत का गला घोंट रही हैं।


भाखरपुरा गाँव में नरनाराम प्रजापत और देमाराम प्रजापत जैसे दरिंदों ने मानवता को शर्मसार कर दिया। पहले उस नन्हे से बालक को बाथरूम साफ़ करने और कचरा उठाने का आदेश दिया, और जब उसने प्यास से तड़पकर पानी माँगा और घड़े को छू लिया, तब उसके छोटे-से शरीर पर लाठियाँ बरसाईं। क्या यही धर्म है? क्या यही संस्कृति है? क्या किसी जलघट को छू लेने से जाति का अपमान हो जाता है?

जब बच्चा छटपटा रहा था, जब उसका शरीर हवा में उल्टा लटका कर पीटा जा रहा था, तब इस समाज की अंतरात्मा कहाँ सो रही थी? उसकी माँ पुरी देवी और दादी ने बीच-बचाव किया तो उन पर भी हमला कर दिया गया। क्या मातृत्व का दर्द भी इस पिशाच प्रवृत्ति को नहीं रोक पाया?

यह घटना सिर्फ़ अपराध नहीं है, यह पाप है, यह वह अधर्म है जिसे न समाज सहन कर सकता है और न ही राष्ट्र। "पानी का घड़ा" यहाँ प्रतीक है उस व्यवस्था का, जो आज भी कुछ हाथों को शुद्ध और कुछ को अशुद्ध मानती है। यह सोच हमें विभाजित करती है और भारत की आत्मा को घायल करती है।

सवाल यह है कि आखिर कब तक हम जाति की बेड़ियों में बँधे रहेंगे? कब तक किसी दलित, किसी शोषित, किसी वंचित को इंसान होने का अधिकार छीन लिया जाएगा? यह समय केवल संवेदना व्यक्त करने का नहीं, बल्कि प्रचंड रोष से उठ खड़े होने का है।

राजस्थान पुलिस ने एक आरोपी को गिरफ्तार किया है, दो हिरासत में हैं। लेकिन क्या इतनी ही कार्रवाई से न्याय मिलेगा? क्या पीढ़ियों से दलितों पर ढाए जा रहे अन्याय का प्रायश्चित इतनी आसानी से संभव है?

आज ज़रूरत है कि इस अपराध को सामान्य अपराध न मानकर ‘सामाजिक विद्रोह के अपराध’ के रूप में देखा जाए। कठोरतम दंड, सार्वजनिक निंदा और चेतना की क्रांति—यही इस ज़हर का उपचार है।

भारत का हर नागरिक इस नन्हे शिशु की पीड़ा को अपनी पीड़ा माने और प्रण ले कि इस देश में किसी जलघट को छूने पर कोई बच्चा फिर कभी अपमानित न हो। यह लड़ाई सिर्फ़ उस बच्चे की नहीं, बल्कि "भारत की आत्मा" की है।

यह अन्याय नहीं रुकेगा जब तक हम रौद्र बनकर अन्याय की जड़ों को उखाड़ न फेंकें।

 

Thursday, 28 August 2025

सिर्फ आँकड़े नहीं : 7,000 चीखें हर साल, 18 चिताएँ हर दिन

 क्या यह वही भारत है, जो अपनी बेटियों को आकाशगंगा तक उड़ते देखने का सपना देखता है? वही भारत, जहाँ बेटियां फौज की वर्दी पहनकर सरहद पर डटती हैं, अंतरिक्षयान को दिशा देती हैं और विज्ञान, कला, खेल हर क्षेत्र में परचम फहराती हैं? और क्या यही भारत है, जहाँ हर दिन अठारह बेटियां दहेज के दानवों की बलि चढ़ाई जाती हैं?


राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो की चीखती हुई पंक्तियाँ बताती हैं—हर वर्ष सात हज़ार से अधिक बहनों की जिंदगियाँ दहेज के कारण बुझा दी जाती हैं। पिछले बीस वर्षों में डेढ़ लाख से अधिक चिताएँ जल चुकी हैं। उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान और हरियाणा जैसे राज्य आज मानो बेटियों की समाधि-स्थली बन चुके हैं।

यह आँकड़े ठंडी गिनती नहीं, बल्कि राख में बदल चुके सपनों की गवाही हैं। वैशाली की शिवांगी, बरेली की रानी, गाज़ियाबाद की मुस्कान, दिल्ली की कोमल और तिरुवर की रिद्धना—ये सब सिर्फ नाम नहीं, हमारे हृदय की धड़कनें थीं। परंतु उनकी साँसें दहेज की आग ने छीन लीं। किसी के पिता ने बेटी की चिता ससुराल की चौखट पर जलाई, किसी माँ ने अपनी आँखों के सामने लाल जोड़े में विदा की हुई संतान की राख समेटी। यह पीड़ा शब्दों में नहीं बाँधी जा सकती।

समाज की चुप्पी भी अपराध है।
जब अखबार में ऐसी खबरें आती हैं, हम पन्ना पलट देते हैं। टीवी पर सुनते हैं, आगे बढ़ जाते हैं। हमें फर्क क्यों नहीं पड़ता? क्या हमारी आत्मा इतनी कठोर हो चुकी है कि बेटियों की चीखें सुनाई ही नहीं देतीं? क्या हमने तय कर लिया है कि यह सब ‘न्यू नॉर्मल’ है—जहाँ शादी सौदे की मंडी बन चुकी है और बेटियों की जान की बोली लगती है?

कानून तो है—1961 का दहेज निषेध अधिनियम। पर यह कानून किताबों में कैद है। सच्चाई यह है कि आज तक एक भी दहेज हत्यारे को फाँसी की सज़ा नहीं मिली। पुलिस की ढिलाई, गवाहों का डर, अदालतों की सुस्ती और समाज की उदासीनता—ये सब मिलकर हत्यारों को निर्भीक बनाते हैं। उन्हें पता है कि कुछ दिन जेल में रहकर वे फिर दहेज की नई मंडी में लौट आएँगे।

पर सवाल है—क्या यह जिम्मेदारी केवल कानून की है?
नहीं। यह जिम्मेदारी हम सबकी है।

  • माता-पिता की, जो बेटियों को आत्मनिर्भर बनाने के बजाय विवाह-पूजा की बलिवेदी पर चढ़ा देते हैं।

  • बेटियों की, जो चुप्पी साध लेना धर्म समझती हैं।

  • बेटों और पुरुषों की, जो शादी को सौदा बना देते हैं और दहेज माँगना अपना अधिकार।

  • और समाज की, जो इन भिखारी मानसिकता वाले लोगों का बहिष्कार करने की जगह उनका स्वागत करता है।

दहेज लेना मर्दानगी नहीं, कायरता है।
सच्चा पुरुष वह है जो अपनी जीवनसंगिनी को सम्मान दे, न कि उसकी कीमत लगाए। विवाह कोई व्यापार नहीं, संस्कार है। जो पुरुष अपनी पत्नी को कीमत के तराजू पर तोलता है, वह न पौरुष का अधिकारी है, न सम्मान का।

आज आवश्यकता है कि बेटियां अपनी चुप्पी तोड़ें, माता-पिता उन्हें शिक्षा और आत्मनिर्भरता दें, समाज दहेज लेने वालों का बहिष्कार करे और न्याय व्यवस्था ऐसे अपराधियों को कठोरतम दंड दे। जब तक दहेज हत्याओं में फांसी की सज़ा की नजीर नहीं बनेगी, तब तक यह राक्षस दम नहीं तोड़ेगा।

भारत के पास विकल्प दो ही हैं—
या तो हम अपनी बेटियों की चिताओं की आँच को यूँ ही सहते रहें,
या फिर उस आग को हथियार बनाकर दहेज की इस बर्बर प्रथा को जला डालें।

यह निर्णय हमें लेना होगा। क्योंकि सवाल यही है—कब तक जलेंगी हमारी बेटियां?

कूटनीति के कुरुक्षेत्र में भारत का संकल्प अडिग

 “जब एक उभरती हुई शक्ति अपने पैरों पर खड़ी होती है, तो विश्व की पुरानी महाशक्तियाँ कांपने लगती हैं। आज भारत खड़ा है, और अमेरिका काँप रहा है।”


अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने हाल ही में भारत के खिलाफ जिस तरह की धमकीभरी भाषा का इस्तेमाल किया है, वह न केवल असंवैधानिक है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के बुनियादी शिष्टाचार का भी अपमान है। रूस से तेल खरीदने पर भारत को भारी-भरकम जुर्माने की धमकी देना और भारत से आयातित सभी वस्तुओं पर 25% टैरिफ थोपना—यह कौन-सी दोस्ती है? और इससे भी बड़ा प्रश्न—क्या यह अमेरिका के हित में है?

भारत का स्पष्ट संदेश—हम दबाव में नहीं झुकते!

ट्रंप की गीदड़भभकी के बाद भारत ने दो टूक शब्दों में कह दिया—हम अपनी ऊर्जा नीति अपनी ज़रूरतों और राष्ट्रीय हितों के आधार पर तय करते हैं, न कि किसी व्हाइट हाउस की खिड़की से आए आदेश पर। ऊर्जा विशेषज्ञ नरेंद्र तनेजा के अनुसार, अगर अंतरराष्ट्रीय दबाव के चलते भारत रूस से तेल खरीद बंद भी करता है, तो इसका नुकसान भारत से कहीं ज्यादा अमेरिका को होगा, क्योंकि वह खुद दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा तेल आयातक है।

यानी ट्रंप की धमकी का परिणाम होगा—तेल की कीमतें आसमान पर और अमेरिका की महंगाई बेलगाम।

ट्रंप की नीति: बिना रोडमैप की धमाकेदार गाड़ी

मशहूर उद्योगपति और टेस्टबेड चेयरमैन किर्क लुबिमोव ने ट्रंप की नीतियों को “रणनीतिक आत्महत्या” करार दिया है। उन्होंने करारा तंज कसते हुए कहा—“अगर अमेरिका चीन के प्रभुत्व को चुनौती देना चाहता है, तो भारत ही एकमात्र वास्तविक विकल्प है। लेकिन ट्रंप तो 50 सेंट का टूथब्रश भी खुद बनाने को तैयार नहीं!”

यह कोई नई बात नहीं कि अमेरिका ने हमेशा भारत की स्वतंत्र विदेश नीति से असहजता महसूस की है। लेकिन आज का भारत 90 के दशक का आर्थिक गुलाम भारत नहीं, जो वाशिंगटन से हर फैसले की स्वीकृति माँगे।

ट्रंप के तंज पर भारत का करारा जवाब—“हम डूबती नहीं, उभरती अर्थव्यवस्था हैं”

राष्ट्रपति ट्रंप ने जब यह कहा कि “भारत और रूस अपनी मरी हुई अर्थव्यवस्थाओं के साथ डूब सकते हैं,” तो भारत ने भी जवाब देने में कोई कसर नहीं छोड़ी। वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने संसद में गर्जना करते हुए कहा—“भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था है, जो जल्द ही तीसरे स्थान पर होगा। हम Global Growth Engine बन चुके हैं, और वैश्विक विकास में हमारा 16% योगदान है।”

क्या ट्रंप को यह याद दिलाना पड़ेगा कि भारत अब ‘Third World Country’ नहीं रहा? यह वही भारत है, जो अपनी जनसंख्या, बाज़ार, रक्षा और विज्ञान में अमेरिका को भी टक्कर देने की स्थिति में है।

रूस से तेल खरीद—हक़ का व्यापार, न कि अपराध

भारत मई 2025 में रूस से रोज़ाना लगभग 1.96 मिलियन बैरल तेल आयात कर रहा है, जो उसके कुल आयात का 38% है। यूक्रेन युद्ध के बाद रूस से सस्ते तेल की आपूर्ति भारत के लिए एक आर्थिक संजीवनी रही है। तो क्या अमेरिका को तकलीफ इस बात से है कि भारत ने उनकी अनुमति के बिना अपने राष्ट्रीय हितों का ध्यान रखा?

सच तो यह है कि भारत अब केवल एक “विकसित होने वाला देश” नहीं, बल्कि “नीतिनिर्धारक राष्ट्र” बन चुका है।

क्या अमेरिका एशिया में प्रभाव खो रहा है?

विश्लेषक मानते हैं कि ट्रंप की टकराव की नीति केवल भारत ही नहीं, बल्कि अमेरिका के दीर्घकालिक रणनीतिक हितों को चोट पहुँचा रही है। किर्क लुबिमोव ने चेताया—“ट्रंप का कार्यकाल इन देशों के लिए अस्थायी झटका है, लेकिन वे दीर्घकालिक रणनीति से चलते हैं।” यानी अमेरिका आज जो गड्ढा खोद रहा है, उसमें वह खुद गिर सकता है।

अमेरिका अगर चीन को नियंत्रित करना चाहता है, तो उसे भारत के साथ आर्थिक साझेदारी चाहिए, साजिश नहीं। लेकिन ट्रंप भारत को ‘शत्रु’ मानकर वही कर रहे हैं, जो चीन की सबसे बड़ी चाहत थी—भारत और अमेरिका को एक-दूसरे के खिलाफ खड़ा करना।

निष्कर्ष: भारत अब आदेश नहीं लेता, संप्रभु निर्णय करता है

यह समय दुनिया को यह याद दिलाने का है कि भारत अब वो देश नहीं, जो आयात और सहायता के लिए दर-दर भटके। यह भारत अब अपना तेल भी खुद तय करता है, अपने व्यापारिक साझेदार भी, और अपने आत्मसम्मान की रक्षा भी।

डोनाल्ड ट्रंप सुन लें—भारत न तो दबाव में आता है, न धमकियों से डरता है। क्योंकि भारत केवल उभरती नहीं, अब जाग चुकी अर्थव्यवस्था है। और जो राष्ट्र जागता है, वह झुकता नहीं—वह दुनिया की दिशा तय करता है।

“हम वही जो कूटनीति से रण रचें,
और समय के साथ स्वाभिमान रचें।
बात जब सम्मान की आती है,
हम व्यापार नहीं, प्रतिकार रचें!”

यह लेख 3 अगस्त 2025 को प्रकाशित हुआ था।

This article was published on 3rd August 2025.

Friday, 18 July 2025

चुप रहो, क्योंकि तुम्हारी बेटी नहीं थी!

 कभी 'धर्मस्थल' कहलाने वाला स्थान अब एक ऐसा शब्द बन गया है जो ज़ुबान पर आते ही मन घृणा, पीड़ा और आक्रोश से भर उठता है। कर्नाटक के इस गांव से जो रहस्य उघड़ा है, वह किसी एक मंदिर, एक संस्थान या किसी अपराधी की कहानी नहीं है — यह एक सभ्यता के भीतर सड़न का ऐलान है।


एक व्यक्ति—जो वर्षों तक मंदिर प्रशासन से जुड़ा सफाईकर्मी रहा—अब सामने आया है। उसने कहा है कि उसे बलात्कार के बाद मारी गई बच्चियों और महिलाओं के शव जलाने और दफनाने पर मजबूर किया गया।
ज़रा सोचिए… यह समाज कहाँ तक गिर चुका है कि कोई दशकों तक बेटियों की जली हुई देहों को दफनाता रहा, और पूरे समाज को भनक तक न लगी—or लगी भी हो, तो फर्क किसे पड़ा?

हाँ, यही है असली सवाल –
"किसे फर्क पड़ता है?"
इस 'Who cares' नामक सामाजिक महामारी ने हमारी आत्मा को भस्म कर दिया है।

उस व्यक्ति ने जो खुलासा किया है, वह सिर्फ अपराध नहीं, हमारी सामूहिक चुप्पी की कब्रगाह है।
उसने मानव अवशेषों की तस्वीरें दी हैं—उन हड्डियों की जो कभी किसी की बेटी थीं।
उन चूडियों की राख दी है, जिनमें कभी किसी कन्या का सपना चमकता था।
उस मिट्टी को खोदकर दिखाया है, जिसमें हमारा जमीर भी दफन है।

अब वह व्यक्ति भय में जी रहा है। क्यों?
क्योंकि सच बोलने वालों की जान इस देश में सबसे सस्ती है।
और झूठ बेचने वालों की कुर्सी सबसे महंगी।

सरकार अब तक चुप है।
मंदिर प्रशासन मौन है।
और समाज—वो तो इस ख़बर के अगले स्लाइड पर जा चुका है।
जैसे कुछ हुआ ही न हो।
जैसे बेटियों की चीखें किसी डील का हिस्सा थीं।

तो क्या हम स्वीकार कर लें कि अब इस देश में बलात्कार के बाद शव भी संस्थागत व्यवस्था में 'मैनेज' किए जाते हैं?
क्या अब ये स्वीकार करना बाकी रह गया है कि पवित्रता के नाम पर अपवित्रता का कारोबार चलाना भी धार्मिक सेवा में गिना जाने लगा है?

हमारा आक्रोश किसके लिए है?
क्या केवल तब जब पीड़िता हमारी जाति, हमारा वर्ग, हमारा चुनावी मुद्दा बनती है?
क्या बाकी बेटियाँ केवल आँकड़े हैं?

ये आग अगर तुम्हारे घर तक नहीं पहुँची, तो मत सोचो कि वो बुझ गई है।
ये वही आग है जो एक दिन हमारी आत्मा, हमारी सभ्यता और हमारी भाषा – सबकी चिता जलाएगी।

ध्यान रखना—इस बार राख सिर्फ एक लड़की की नहीं, हमारी पूरी नैतिकता की होगी।
अगर आज भी तुम चुप हो, तो फिर तुम सिर्फ दर्शक नहीं, सहभागी हो।

Thursday, 17 July 2025

संस्कृति बोलती रही, करुणा मौन थी

हमारे देश में 'संस्कृति' शब्द का ऐसा उपयोग हो रहा है जैसे यह कोई राजनीतिक नारा हो—जहाँ ज़रूरत पड़े, फेंक दो सामने।
मुद्दा चाहे मॉडर्न कपड़ों का हो, किसी मूर्ति की ऊँचाई का हो, या किसी लड़की की हँसी का — तुरन्त 'भारतीय संस्कृति' की लाठी उठ जाती है।
लेकिन जैसे ही कोई ज़िम्मेदारी का सवाल आता है — कोई मानवता, करुणा, सेवा, सहनशीलता या त्याग का प्रसंग — तो यही संस्कृति अचानक बहरापन ओढ़ लेती है।


आगरा की घटना ने यह सारा ढोंग उघाड़कर रख दिया।
ताजमहल घूमने आया एक परिवार अपने पैरालाइज्ड बुज़ुर्ग को कार में हाथ-पैर बांधकर बंद कर गया।
दम घुटने की हालत में वो बुज़ुर्ग पड़े रहे — न कोई पानी, न देखभाल — बस गाड़ी में बंद एक ‘प्राणी’ की तरह।
अगर कुछ गाइडों की सजगता न होती, तो शायद वह बुज़ुर्ग इस "संस्कृति-प्रेमी" परिवार के दर्शन काल में ही प्राण त्याग चुके होते।

और जवाब क्या मिला?
“वो पहले से पैरालाइज थे, इसलिए बांधकर छोड़ा।”

बस? इतना ही? यही है हमारी संस्कृति?
क्या अब ‘देखभाल’ का अर्थ केवल ‘बांध देना’ रह गया है?

हमारे ग्रंथों में कहा गया —
“श्रवण कुमार के कंधों पर संस्कार चलते थे।”
आज की पीढ़ी के पास SUV है, पर मनुष्यता नहीं।
ताजमहल में तस्वीरें ली जा रही थीं, और वहीं कार में एक जीवन सिसक रहा था।
किसी को अंतर नहीं पड़ा — क्योंकि हमने 'संस्कृति' को व्यवहार नहीं, सुरक्षा कवच बना लिया है — अपने पापों की ढाल।

सच यह है कि हम संस्कृति को जीते नहीं,
बस संस्कृति का शोर करते हैं।

हमारे पास सोशल मीडिया पर उपदेश हैं,
टेलीविज़न डिबेट में गला फाड़ने की ऊर्जा है,
लेकिन अपने ही परिवार के असहाय सदस्य को इंसान समझने की फुरसत नहीं।

गाइडों ने कार का लॉक तोड़ा, जान बचाई।
क्योंकि वे संस्कृति नहीं, ‘संवेदना’ जानते थे।

अब सवाल सीधा है —
यदि संस्कृति केवल कपड़ों, खानपान, मूर्तियों और नारों तक सीमित है,
तो वह सिर्फ़ ध्वनि है — न मूल्य है, न आत्मा।

हमें तय करना होगा —
हम 'संस्कृति' के नाम पर कब तक केवल ढोल पीटते रहेंगे?
कब वह दिन आएगा जब यह शब्द केवल शब्द न रहकर व्यवहार बन जाएगा?

जिस दिन हर बुज़ुर्ग को सम्मान, हर निर्बल को सहारा, और हर मनुष्य को मनुष्य समझा जाएगा —
तब हम कह सकेंगे — "हाँ, यही है हमारी संस्कृति।"
आज नहीं। बिल्कुल नहीं।

Wednesday, 16 July 2025

जला दो ये मौन — सौम्यश्री मर चुकी है!"

 "ये समाज क्या सचमुच मर चुका है? क्या हमारी आत्मा इतनी सस्ती हो चुकी है कि अब बेटियों की चीखें तब तक सुनाई नहीं देतीं जब तक वे राख बनकर हवाओं में घुल न जाएं?"

उड़ीसा के बालासोर जिले की 20 साल की बीएड छात्रा सौम्यश्री मिश्री ने आत्महत्या नहीं की — उसे इस सड़ चुके समाज, इस दुराचार से सने तंत्र, और संवेदनहीनता की कीचड़ में लथपथ व्यवस्था ने जला डाला।

उसका अपराध क्या था?


कि उसने अपनी इज्जत को 'नंबरों' और 'अटेंडेंस' के बदले सौंपने से मना कर दिया?
कि उसने 'ना' कहा?
या फिर कि उसने वह हिम्मत दिखाई जो इस मुल्क की लाखों लड़कियाँ डर से नहीं दिखा पातीं?

गुरु नहीं, नरपिशाच था समीर साहू

जिसे शिक्षक कहते हैं, वह 'एचओडी' समीर कुमार साहू, सौम्यश्री को महीनों से गलत नजरों से देख रहा था। उससे अनुचित मांगें कर रहा था। जब उसने विरोध किया, तो उसकी अटेंडेंस काटी गई, परीक्षा में फेल किया गया, मानसिक उत्पीड़न का इतना भयानक दौर चला कि सौम्यश्री टूटने लगी।

लेकिन वह झुकी नहीं। उसने लिखा, बोला, लड़ा — कॉलेज प्रिंसिपल दिलीप घोष को शिकायत दी, सोशल मीडिया पर पोस्ट डाली, शासन-प्रशासन तक गुहार लगाई। लेकिन ये निकम्मा तंत्र तब तक नहीं हिला जब तक उसकी देह लपटों में बदल नहीं गई।

वो जलती रही और हम देखते रहे

12 जुलाई 2025 को सौम्यश्री ने प्रिंसिपल ऑफिस के सामने खुद पर पेट्रोल डालकर आग लगा ली।
95% जली।
एम्स भुवनेश्वर में वेंटिलेटर पर पड़ी रही।
14 जुलाई की रात 11:30 पर मौत हो गई।

लेकिन टीवी पर नहीं चला।
कोई कैमरा नहीं पहुंचा।
कोई राष्ट्रीय एंकर, जो दिन-रात एक्टिंग करने वालों के चोट पर 5 घंटे की बहस करता है — वो नहीं पहुंचा।

क्यों?

क्योंकि सौम्यश्री की चीखें 'टीआरपी' नहीं थीं।
उसकी राख में 'ब्रेकिंग न्यूज़' का मसाला नहीं था।
वो न्यूज़ बिकाऊ नहीं थी, बस जली हुई थी।

क्या बेटियाँ अब केवल तब सुनी जाएँगी जब वे जल मरें?

आज हर कॉलोनी, हर कॉलेज, हर दफ्तर में कोई न कोई सौम्यश्री अकेली लड़ रही है। उसके ऊपर कोई साहू बैठा है, कोई दिलीप घोष बैठा है, कोई 'प्रशासन' उसकी आवाज़ दबा रहा है। लेकिन जब वो खुद को आग लगा ले, तब हम अचानक ‘सदमे’ में आ जाते हैं।

सवाल यह है: सदमे में आप हैं या बेशर्मी में?

इस मुल्क में नारी के खिलाफ अपराध 'नया सामान्य' बन चुका है

कुछ दिनों पहले पुरुषों की आत्महत्या की खबरें आईं—अतुल, सुभाष, राजा रघुवंशी। उनपर बहस होनी चाहिए, लेकिन सोशल मीडिया ने उसे स्त्री विरोध के ट्रेंड में बदल दिया। जैसे सौम्यश्री जैसी लड़कियाँ अब ‘पुरानी बात’ हो गई हैं। जैसे महिलाओं के साथ बलात्कार, शोषण, हत्या अब किसी को झकझोरते ही नहीं।

क्या आँकड़े चाहिए?

एनसीआरबी कहता है: 2022 में 31,516 रेप केस। हर दिन 86। हर घंटे 3 से ज्यादा।
लेकिन हम इतने मूर्छित हो चुके हैं कि अब इन आँकड़ों पर आक्रोश नहीं आता।
क्योंकि जबतक चीखें ग्लैमर में लिपटी न हों, हम उन्हें सुनते नहीं।

माफ़ कीजिए—अब खामोशी अपराध है

सौम्यश्री अकेली लड़ी।
उसने बताया, सबूत दिए, सोशल मीडिया पर खुलेआम लिखा — “अगर न्याय नहीं मिला तो जान दे दूंगी।”
लेकिन किसी ने नहीं सुना।

अब जब वो नहीं है, हम शोक में पोस्ट डाल रहे हैं।

बिलकुल नहीं! अब समय शोक का नहीं, क्रांति का है।

अब बहुत हो चुका—या तो जागो, या फिर चुपचाप अगली चिता देखो

  • हर कॉलेज में महिलाओं के लिए कड़े, जवाबदेह शिकायत निवारण तंत्र हों।

  • हर शिकायत पर तुरंत कार्रवाई हो।

  • दोषी चाहे कोई भी हो — टीचर, प्रिंसिपल, अफ़सर — कानून की लाठी बिना रुके चले।

  • मीडिया को बिकाऊ खबरें नहीं, जलती बेटियों की चीखों को प्लेटफ़ॉर्म देना होगा।

और समाज?

तुम चुप मत रहो।
क्योंकि अगली बार सौम्यश्री की जगह तुम्हारी बेटी, तुम्हारी बहन, तुम्हारी छात्रा हो सकती है।

अंत नहीं—अभियान की शुरुआत है

अगर सौम्यश्री की मौत के बाद भी आप चुप हैं, तो यकीन मानिए — अब आप भी इस हत्यारे तंत्र का हिस्सा हैं।
बेटियाँ तब तक अकेली मरती रहेंगी जब तक हम collectively चीखना नहीं सीखेंगे।

अब सवाल ये नहीं कि सौम्यश्री क्यों मरी।

अब सवाल ये है—

क्या आप जिंदा हैं?