दुनिया की दिशा अचानक नहीं बदलती—उसे बदला जाता है। इन दिनों वैश्विक दृष्टि मध्य-पूर्व से हटकर लातिन अमेरिका पर इसलिए नहीं टिक गई कि वहां कोई प्राकृतिक आपदा आई है, बल्कि इसलिए कि एक बार फिर साम्राज्य ने अपने बमों से यह जता दिया है कि संसाधनों पर अधिकार उसकी नीति है और संप्रभुता उसके शब्दकोश में केवल एक औपचारिक शब्द।
वेनेजुएला की राजधानी काराकस पर हुए भीषण अमेरिकी हवाई हमले केवल सैन्य कार्रवाई नहीं हैं—वे उस सोच का उद्घोष हैं, जिसमें किसी देश की जनता, उसकी लोकतांत्रिक इच्छा और उसका भविष्य, सब कुछ ‘रणनीतिक हितों’ की वेदी पर बलि चढ़ाने योग्य माना जाता है। कम ऊँचाई पर उड़ते लड़ाकू विमान, आधी रात को गूंजते विस्फोट और समुद्र में बढ़ती नौसैनिक हलचल—यह सब उस पुराने झूठ को नए आवरण में पेश करने की तैयारी है, जिसे अमेरिका वर्षों से अलग-अलग देशों में परोसता आया है—कभी ‘ड्रग्स के विरुद्ध युद्ध’ के नाम पर, कभी ‘लोकतंत्र की बहाली’ के बहाने।
पर प्रश्न वही पुराना है—
क्या यह वास्तव में नशे के विरुद्ध युद्ध है,
या फिर दुनिया के सबसे बड़े तेल भंडार पर अधिकार की एक और हिंसक पटकथा?
काराकस की रात और संप्रभुता की घोषणा
स्थानीय समयानुसार रात लगभग दो बजे, काराकस और उसके आसपास के इलाकों में सात से अधिक विस्फोटों की आवाजें गूंजीं। वेनेजुएला सरकार के अनुसार, हमले केवल राजधानी तक सीमित नहीं रहे, बल्कि मिरांडा, अरागुआ और ला गुएरा जैसे राज्यों में नागरिक और सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया गया। राष्ट्रपति निकोलस मादुरो ने इसे ‘बाहरी आक्रमण’ करार देते हुए आपात स्थिति की घोषणा की, जिससे नागरिक अधिकारों पर अस्थायी रोक और सशस्त्र बलों की भूमिका में विस्तार संभव हो गया।
सरकार ने जनता से सड़कों पर उतरकर ‘साम्राज्यवादी आक्रमण’ के विरुद्ध एकजुट प्रतिरोध का आह्वान किया। यह केवल सैन्य प्रतिक्रिया नहीं रही—इसे राष्ट्रीय अस्मिता और संप्रभुता का प्रश्न बना दिया गया।
वाशिंगटन की चुप्पी और पूर्व-नियोजित संकेत
व्हाइट हाउस और पेंटागन की ओर से तत्काल कोई आधिकारिक बयान नहीं आया, लेकिन अमेरिकी मीडिया—विशेषकर CBS News—ने अधिकारियों के हवाले से दावा किया कि राष्ट्रपति ट्रंप ने हमलों की अनुमति कई दिन पहले ही दे दी थी। खराब मौसम और अन्य सैन्य प्राथमिकताओं के कारण कार्रवाई टाली गई थी।
हमलों से कुछ घंटे पहले अमेरिकी संघीय उड्डयन प्रशासन द्वारा वेनेजुएला के हवाई क्षेत्र में अमेरिकी विमानों पर प्रतिबंध, इस अभियान की सुनियोजित प्रकृति की ओर स्पष्ट संकेत करता है। यह अचानक लिया गया निर्णय नहीं था—यह एक लिखी जा चुकी रणनीति का क्रियान्वयन था।
अमेरिका के भीतर उठते असहज प्रश्न
इस सैन्य कार्रवाई पर अमेरिका के भीतर भी असहमति के स्वर उभरे हैं। डेमोक्रेटिक सीनेटर ब्रायन शाट्ज ने स्पष्ट कहा कि वेनेजुएला में ऐसा कोई अमेरिकी राष्ट्रीय हित नहीं है, जो युद्ध को न्यायोचित ठहरा सके। उनका आरोप है कि राष्ट्रपति प्रशासन जनता को यह बताने तक को तैयार नहीं कि देश को किस दिशा में धकेला जा रहा है।
यह असहमति मामूली नहीं है—यह उस लोकतंत्र पर प्रश्नचिह्न है, जिसके नाम पर दुनिया भर में बम गिराए जाते हैं।
क्षेत्रीय बेचैनी और अंतरराष्ट्रीय हलचल
लातिन अमेरिका में प्रतिक्रिया तीव्र है। कोलंबिया के राष्ट्रपति गुस्तावो पेट्रो ने इसे सीधे-सीधे ‘वेनेजुएला पर हमला’ बताया और सीमावर्ती क्षेत्रों में आपात ऑपरेशनल प्लान सक्रिय कर दिया। उन्होंने अमेरिकी राज्यों के संगठन और संयुक्त राष्ट्र से तत्काल बैठक बुलाने की मांग की है।
स्पष्ट है—यह संकट अब केवल द्विपक्षीय नहीं रहा।
‘ऑपरेशन सदर्न स्पीयर’ और घेराबंदी की नीति
इन हमलों से पहले ही अमेरिका कैरेबियन सागर में अपनी नौसैनिक मौजूदगी बढ़ा चुका था, जिसे ‘ड्रग कार्टेल्स के विरुद्ध अभियान’ बताया गया। ड्रोन हमले, संदिग्ध जहाजों की जब्ती और वेनेजुएला से जुड़े तेल टैंकरों पर कब्जा—ये सभी कदम एक व्यापक आर्थिक और सैन्य घेराबंदी की ओर संकेत करते हैं।
मादुरो सरकार इसे ‘अवैध युद्ध’ कह रही है, जबकि वाशिंगटन इसे अपनी सुरक्षा की अनिवार्यता बताता है।
अमेरिकी कथा: ड्रग्स और लोकतंत्र
अमेरिका का आधिकारिक तर्क है कि मादुरो सरकार ने वेनेजुएला को ‘नार्को-स्टेट’ में बदल दिया है। 2024 के विवादित चुनावों के बाद मादुरो की वैधता को नकारते हुए अमेरिका ‘लोकतंत्र की बहाली’ को अपना उद्देश्य बताता है।
लेकिन यही वह बिंदु है, जहाँ कथा दरकने लगती है।
असली प्रश्न: तेल
वेनेजुएला के पास लगभग 303 अरब बैरल का प्रमाणित तेल भंडार है—दुनिया में सबसे अधिक। उत्पादन घटा है, लेकिन रणनीतिक मूल्य आज भी अपार है। वेनेजुएला का भारी क्रूड अमेरिकी रिफाइनरियों के लिए विशेष रूप से उपयुक्त है।
यदि उद्देश्य केवल ड्रग्स होता, तो तेल टैंकर निशाने पर क्यों होते?
यदि उद्देश्य केवल लोकतंत्र होता, तो आर्थिक नाकेबंदी क्यों की जाती?
यह स्पष्ट रूप से सत्ता परिवर्तन की रणनीति है।
भारत और विश्व के लिए खतरे
यह संघर्ष स्थानीय नहीं रहेगा। वेनेजुएला का तेल वैश्विक बाजार से गायब हुआ तो कच्चे तेल की कीमतें उछलेंगी। भारत जैसे देश, जो अपनी 80 प्रतिशत तेल जरूरत आयात से पूरी करते हैं, सीधे प्रभावित होंगे।
साथ ही शरणार्थी संकट, रूस-चीन की सक्रियता और वैश्विक ध्रुवीकरण—ये सभी इस संघर्ष को ‘लोकल’ से ‘ग्लोबल’ बना सकते हैं।
अंतिम विमर्श: साम्राज्य, ग्रीड और प्रतिरोध
यहीं से यह लेख केवल विश्लेषण नहीं रहता—यह एक नैतिक अभियोग बन जाता है।
आखिर अमेरिका को यह अधिकार किसने दिया कि वह अपने लालच को ‘लोकतंत्र’, अपने हितों को ‘मानवाधिकार’ और अपने बमों को ‘न्याय’ कहकर किसी संप्रभु राष्ट्र को रौंद दे?
काराकस की सड़कों पर गिरते बम केवल इमारतें नहीं तोड़ते—वे उस अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था का मुखौटा नोचते हैं, जो ताकतवर के अपराध को नीति और कमजोर के प्रतिरोध को अपराध घोषित करती है।
इराक, लीबिया, सीरिया, अफ़ग़ानिस्तान—हर जगह कहानी वही रही।
जो झुक गया, वह सुधर गया।
जो खड़ा रहा, वह तानाशाह बना दिया गया।
वेनेजुएला आज उसी सूची में है।
काराकस आज केवल एक शहर नहीं है—वह उन सभी राष्ट्रों की चेतावनी है, जो संसाधनों से समृद्ध हैं लेकिन साम्राज्य की शर्तों पर चलने को तैयार नहीं।
इतिहास गवाह है—
साम्राज्य बमों से युद्ध जीत सकते हैं,
लेकिन न्याय नहीं।
और जिस दिन दुनिया ने यह सच स्वीकार कर लिया,
उस दिन काराकस की यह जलती रात केवल त्रासदी नहीं,
बल्कि साम्राज्यवादी अहंकार के विरुद्ध प्रतिरोध की उद्घोषणा मानी जाएगी।