Saturday, 10 January 2026

लालच की प्रयोगशाला में दम तोड़ती मनुष्यता

 मनुष्य ने बार-बार यह बताया कि वह ईश्वर की सर्वश्रेष्ठ कृति है।

यह कोई दैवी घोषणा नहीं थी—यह आत्मघोषणा थी। और हर आत्मघोषणा की तरह यह भी धीरे-धीरे एक खतरनाक भ्रम में बदल गई। क्योंकि जो प्राणी अपनी श्रेष्ठता स्वयं प्रमाणित करता फिरे, वह भीतर से पहले ही खोखला हो चुका होता है।

हैदराबाद के काचीगुडा क्षेत्र में पकड़ा गया आयात-निर्यात प्रतिष्ठान इस भ्रम को पूरी निष्ठुरता से उघाड़ देता है। वहाँ लगभग एक हजार लीटर बकरियों और भेड़ों का खून इंसानों के लिए बनाए गए ब्लड बैग में पैक कर रखा गया था।
आधुनिक मशीनें थीं—ऑटोक्लेव, लैमिनार एयर-फ्लो यूनिट, प्रयोगशाला जैसी संरचना। सब कुछ वैज्ञानिक था, सटीक था। अनुपस्थित थी तो केवल मनुष्यता।

ड्रग कंट्रोल अधिकारियों के अनुसार इस खून का इस्तेमाल गैरकानूनी क्लिनिकल ट्रायल, प्रयोग या लैब-कल्चर में किया जा सकता था। यह अपराध इसलिए भयावह नहीं कि कानून टूटा, बल्कि इसलिए कि यह अपराध शिक्षित हाथों से किया गया। यह जंगली हिंसा नहीं थी—यह योजनाबद्ध, लाभ-केंद्रित और ठंडी क्रूरता थी।

पशु जब मारता है, तो वह भूख या भय से मारता है।
मनुष्य तब मारने की तैयारी करता है, जब उसे मुनाफा दिखता है।

यही उसे पशु से अधिक खतरनाक बनाता है।

उसी समय मध्य प्रदेश से आई खबर यह स्पष्ट करती है कि यह अमानवीयता किसी प्रयोगशाला तक सीमित नहीं है। राज्य में तीस लाख फर्जी राशन कार्ड रद्द किए गए। इनमें वे लोग भी शामिल थे जो निजी कंपनियों में डायरेक्टर थे, जिनकी वार्षिक आय छह लाख रुपये से अधिक थी और जो नियमित रूप से आयकर रिटर्न भरते थे।

ये लोग भूखे नहीं थे।
फिर भी इन्होंने भूखे का अन्न लिया।

यह केवल धोखाधड़ी नहीं थी—यह नैतिक दस्युता थी।
यह अपराध इसलिए बड़ा है क्योंकि इसे मजबूरी ने नहीं, लालच ने जन्म दिया।

एक तरफ मनुष्य प्रयोगशालाओं में खून को व्यापार बना रहा है।
दूसरी तरफ वही मनुष्य राशन की कतारों में गरीब को पीछे धकेल रहा है।
तरीके अलग हैं, स्थान अलग हैं—पर आत्मा एक ही है: संवेदनहीन, आत्मकेंद्रित और निर्लज्ज।

आज का मनुष्य कानून तोड़ने से नहीं डरता, क्योंकि उसने पहले नैतिकता को तोड़ दिया है। उसके पास ज्ञान है, तकनीक है, सत्ता तक पहुँच है—लेकिन आत्मसंयम नहीं है। यही कारण है कि वह अब किसी भी हिंसक पशु से अधिक खतरनाक होता जा रहा है।

पशु से करुणा की अपेक्षा नहीं की जाती।
मनुष्य से की जाती है—और वही अपेक्षा वह बार-बार तोड़ता है।

तो अब प्रश्नों से बचना कायरता होगी—

क्या मनुष्य सचमुच ईश्वर की सर्वश्रेष्ठ कृति है, या वह अपनी ही सभ्यता का सबसे बड़ा अपराधी बन चुका है?
क्या विज्ञान नैतिकता के बिना भी वैध है?
क्या संपन्नता अब गरीब का हक छीनने का अधिकार बन चुकी है?
और सबसे असहज प्रश्न—
यदि यही मनुष्य का ‘विकास’ है, तो फिर पतन किसे कहेंगे?

शायद अब यह कहना बंद करने का समय आ गया है कि मनुष्य स्वभाव से श्रेष्ठ होता है।
श्रेष्ठता घोषणा से नहीं, आचरण से सिद्ध होती है—और आज की खबरें बता रही हैं कि मनुष्य इस परीक्षा में लगातार असफल हो रहा है।

Sunday, 4 January 2026

सोमनाथजी – भारत की आत्मा का शौर्यवर्ती स्तंभ

 सोमनाथजी कोई इतिहास नहीं हैं।

वे भारत की आत्मा का रणघोष हैं।


हजार वर्षों तक इस भूमि पर आक्रमण हुए, फरमान चले, तलवारें उठीं और अग्नि बरसी। उद्देश्य एक ही था—भारत की चेतना को तोड़ना, उसकी आस्था को अपमानित करना और उसकी स्मृति को मिटा देना। हर आक्रमण में पहली चोट सोमनाथजी पर की गई, क्योंकि आक्रांताओं को भलीभांति ज्ञात था कि यदि इस राष्ट्र के हृदय पर प्रहार करना है, तो उसकी आस्था की धड़कन को कुचलना होगा।

पर जो इस भूमि को नहीं समझ पाए, वे यह भी नहीं समझ सके कि भारत की आत्मा युद्धभूमि में हारती नहीं है। वह गिरती है, टूटती है, जलती है—और फिर पहले से अधिक प्रखर होकर उठ खड़ी होती है। सोमनाथजी उसी अविनाशी आत्मा का साक्षात स्वरूप हैं।

यह मंदिर जितनी बार ध्वस्त किया गया, उतनी ही बार उसने इतिहास को चुनौती दी।
आक्रांताओं के नाम धूल में दब गए,
पर सोमनाथजी आज भी शिखर पर खड़े हैं—अडिग, अमिट, अविचल।

जनवरी 1026 में गजनी के महमूद द्वारा किया गया आक्रमण केवल एक मंदिर के ध्वंस की घटना नहीं था। वह भारत की सभ्यतागत चेतना पर किया गया सुनियोजित प्रहार था। आक्रमणकारियों को भलीभांति ज्ञात था कि यदि भारत की आत्मा को विचलित करना है, तो उसके आस्था-केंद्रों को लक्ष्य बनाना होगा। और इसी कारण सोमनाथजी को बार-बार निशाना बनाया गया।

आज, जब उस पहले आक्रमण के 1000 वर्ष पूर्ण हो रहे हैं, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का यह कथन अत्यंत प्रासंगिक है कि सोमनाथजी भारत की सभ्यतागत चेतना, आस्था और आत्मबल का स्थायी प्रतीक हैं। यह स्मरण केवल अतीत की पीड़ा का नहीं, बल्कि उस अदम्य शक्ति का है, जिसने हर विध्वंस के बाद पुनर्निर्माण का संकल्प लिया।

सोमनाथजी का इतिहास पराजय का इतिहास नहीं है।
वह पुनरुत्थान की परंपरा है।

महमूद गजनवी, खिलजी, गुजरात सल्तनत और औरंगजेब—सब आए। सबने तोड़ा। सब चले गए।
वे इतिहास की फुटनोट बन गए।
किन्तु सोमनाथजी—आज भी खड़े हैं।

इस मंदिर को बार-बार ध्वस्त किया गया, क्योंकि आक्रांताओं को भ्रम था कि भारत की आस्था पत्थरों में बसती है। वे यह नहीं समझ सके कि भारत की चेतना ईंटों और शिलाओं से परे, जनमानस में निवास करती है। इसीलिए हर बार जब मंदिर गिराया गया, वहीं से उसके पुनर्निर्माण का संकल्प जन्मा—और वह संकल्प सोमनाथजी के रूप में साकार हुआ।

प्रधानमंत्री ने 2026 को दोहरे अर्थों में ऐतिहासिक वर्ष बताया है। यह वर्ष जहाँ पहले आक्रमण के सहस्राब्दी का साक्षी है, वहीं आधुनिक सोमनाथजी मंदिर के पुनर्निर्माण के 75 वर्ष भी इसी कालखंड में पूर्ण हो रहे हैं। 11 मई 1951 को राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद द्वारा मंदिर का उद्घाटन केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं था, बल्कि नवस्वतंत्र भारत के सांस्कृतिक आत्मविश्वास की उद्घोषणा थी।

इस पुनर्निर्माण के केंद्र में सरदार वल्लभभाई पटेल का दूरदर्शी संकल्प था। वे भलीभांति जानते थे कि राजनीतिक स्वतंत्रता तब तक अधूरी है, जब तक सभ्यतागत आत्मसम्मान का पुनर्स्थापन न हो। के.एम. मुंशी और असंख्य राष्ट्रनिष्ठ नागरिकों ने सोमनाथजी के पुनर्निर्माण को सरकारी परियोजना नहीं, बल्कि राष्ट्रीय चेतना का अभियान बनाया।

स्वामी विवेकानंद के विचारों की स्मृति में यह तथ्य निहित है कि तीर्थ और मंदिर केवल पूजा-स्थल नहीं होते, वे सभ्यता की जीवंत स्मृति होते हैं। उन्हें नष्ट करने का अर्थ होता है इतिहास को मिटाने का प्रयास। किंतु भारत के इतिहास में यह प्रयोग बार-बार विफल हुआ है—और उसका सबसे बड़ा प्रमाण सोमनाथजी हैं।

औरंगजेब द्वारा जारी 1669 का फरमान इस मानसिकता का चरम उदाहरण था, जिसमें मंदिरों के ध्वंस को वैचारिक रणनीति का हिस्सा बनाया गया। काशी, मथुरा, उज्जैन और सोमनाथजी—सब निशाने पर थे। उद्देश्य स्पष्ट था—भारत की सांस्कृतिक रीढ़ को तोड़ना। परंतु इतिहास ने सिद्ध किया कि यह रीढ़ झुक सकती है, टूट नहीं सकती।

आज समुद्र तट पर खड़े सोमनाथजी केवल एक स्थापत्य चमत्कार नहीं हैं। वे यह उद्घोष करते हैं कि भारत की सभ्यता समय से बड़ी है, सत्ता से व्यापक है और आक्रमणों से परे है। मंदिर की दीवारों पर अंकित दिशासूचक चिन्ह यह स्मरण कराता है कि यहाँ से आगे केवल समुद्र नहीं, भारत की चेतना का विस्तार है।

प्रधानमंत्री के शब्दों में, यदि सोमनाथजी हजार वर्षों के संघर्ष के पश्चात अपने वैभव के साथ खड़े हो सकते हैं, तो भारत भी अपने सभ्यतागत गौरव को पुनः प्राप्त कर सकता है। यह कथन केवल प्रेरणा नहीं, एक राष्ट्रीय दायित्व का आह्वान है।

सोमनाथजी हमें सिखाते हैं कि
भारत गिर सकता है, पर मिट नहीं सकता।
भारत घायल हो सकता है, पर पराजित नहीं।

जब तक सोमनाथजी खड़े हैं,
तब तक भारत की आत्मा जीवित है।

जब ताक़त ने खुद को न्याय घोषित कर दिया

अमेरिका द्वारा वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को उनके घर से सैन्य बल के माध्यम से उठा ले जाना केवल एक गिरफ्तारी नहीं है, यह अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था के सीने पर किया गया खुला प्रहार है। इस कार्रवाई में मादुरो की पत्नी को भी हिरासत में लिया गया। आरोप लगाए गए—ड्रग तस्करी के। लेकिन असली प्रश्न आरोपों का नहीं, अधिकार का है। किसने अमेरिका को यह अधिकार दिया कि वह किसी संप्रभु राष्ट्र के राष्ट्रपति को उसकी भूमि से जबरन उठा ले?

यह घटना बताती है कि जब साम्राज्यवादी ताक़तें स्वयं को कानून से ऊपर मानने लगती हैं, तब अंतरराष्ट्रीय नियम केवल घोषणापत्र बनकर रह जाते हैं।

संयुक्त राष्ट्र चार्टर: शब्द या शपथ?

संयुक्त राष्ट्र चार्टर का अनुच्छेद 2(4) स्पष्ट करता है कि कोई भी देश दूसरे देश के विरुद्ध सैन्य बल का प्रयोग नहीं करेगा। यह केवल कानूनी वाक्य नहीं, बल्कि विश्व शांति की मूल शपथ है। अमेरिका की यह कार्रवाई इस शपथ का खुला उल्लंघन है।

संयुक्त राष्ट्र ने स्वयं स्वीकार किया है कि उसे इस सैन्य ऑपरेशन की कोई जानकारी नहीं थी। न ही इसे सुरक्षा परिषद की स्वीकृति प्राप्त थी। इसका अर्थ साफ है—यह कार्रवाई न तो अंतरराष्ट्रीय सहमति से हुई, न ही वैश्विक कानून के दायरे में।

वैधता की आड़ में बल प्रयोग

यह तर्क बार-बार दोहराया जा रहा है कि मादुरो को विवादित चुनावों के बाद वैध नेता नहीं माना गया। किंतु अंतरराष्ट्रीय कानून ‘किसे अच्छा लगता है’ या ‘किससे राजनीतिक असहमति है’ के आधार पर नहीं चलता। यदि किसी नेता की वैधता पर सवाल उठना ही सैन्य हस्तक्षेप का आधार बन जाए, तो दुनिया में शायद ही कोई सरकार बचे जिसे गिराया न जा सके।

यह तर्क दरअसल एक बहाना है—बल प्रयोग को वैध ठहराने का।

अमेरिकी दलीलें और लोकतंत्र की विडंबना

ट्रंप प्रशासन कहता है कि यह न्यायिक प्रक्रिया का हिस्सा था और न्याय विभाग ने सेना की सहायता मांगी थी। यदि ऐसा है, तो सवाल उठता है कि अमेरिकी कांग्रेस को क्यों अंधेरे में रखा गया? क्या अमेरिका का लोकतंत्र अब इतना कमजोर हो गया है कि युद्ध जैसे फैसले भी संसद की सहमति के बिना लिए जाएं?

अटॉर्नी जनरल द्वारा सोशल मीडिया पर यह घोषणा करना कि मादुरो और उनका परिवार अमेरिकी अदालतों में पेश होगा, इस बात का संकेत है कि न्याय नहीं, शक्ति प्रदर्शन प्राथमिक उद्देश्य है।

तेल, नियंत्रण और असली मंशा

राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का यह कहना कि वेनेजुएला अमेरिका का तेल “चुरा रहा है” और अमेरिका उस पर नियंत्रण करेगा, इस पूरे घटनाक्रम की असली मंशा उजागर कर देता है। यह भाषा कानून की नहीं, उपनिवेशवादी लालच की भाषा है।

आज मादुरो निशाने पर हैं, कल कोई और होगा। संसाधनों से संपन्न, लेकिन राजनीतिक रूप से असहमत देश हमेशा ऐसे ही अभियानों का शिकार रहे हैं।

आज वेनेजुएला, कल दुनिया

यदि इस कार्रवाई को वैश्विक समुदाय ने सामान्य मान लिया, तो अंतरराष्ट्रीय कानून की अवधारणा ही निरर्थक हो जाएगी। तब ताकत ही न्याय होगी, और कमजोर देशों की संप्रभुता केवल काग़ज़ पर बचेगी।

यह समय है जब दुनिया तय करे—क्या वह नियमों से चलेगी या बंदूक की नली से। क्योंकि जिस दिन ताक़त को कानून का विकल्प मान लिया गया, उस दिन वैश्विक अराजकता अपरिहार्य हो जाएगी।

Saturday, 3 January 2026

तेल की भूख और काराकस की जलती रात

 दुनिया की दिशा अचानक नहीं बदलती—उसे बदला जाता है। इन दिनों वैश्विक दृष्टि मध्य-पूर्व से हटकर लातिन अमेरिका पर इसलिए नहीं टिक गई कि वहां कोई प्राकृतिक आपदा आई है, बल्कि इसलिए कि एक बार फिर साम्राज्य ने अपने बमों से यह जता दिया है कि संसाधनों पर अधिकार उसकी नीति है और संप्रभुता उसके शब्दकोश में केवल एक औपचारिक शब्द।


वेनेजुएला की राजधानी काराकस पर हुए भीषण अमेरिकी हवाई हमले केवल सैन्य कार्रवाई नहीं हैं—वे उस सोच का उद्घोष हैं, जिसमें किसी देश की जनता, उसकी लोकतांत्रिक इच्छा और उसका भविष्य, सब कुछ ‘रणनीतिक हितों’ की वेदी पर बलि चढ़ाने योग्य माना जाता है। कम ऊँचाई पर उड़ते लड़ाकू विमान, आधी रात को गूंजते विस्फोट और समुद्र में बढ़ती नौसैनिक हलचल—यह सब उस पुराने झूठ को नए आवरण में पेश करने की तैयारी है, जिसे अमेरिका वर्षों से अलग-अलग देशों में परोसता आया है—कभी ‘ड्रग्स के विरुद्ध युद्ध’ के नाम पर, कभी ‘लोकतंत्र की बहाली’ के बहाने।

पर प्रश्न वही पुराना है—
क्या यह वास्तव में नशे के विरुद्ध युद्ध है,
या फिर दुनिया के सबसे बड़े तेल भंडार पर अधिकार की एक और हिंसक पटकथा?

काराकस की रात और संप्रभुता की घोषणा

स्थानीय समयानुसार रात लगभग दो बजे, काराकस और उसके आसपास के इलाकों में सात से अधिक विस्फोटों की आवाजें गूंजीं। वेनेजुएला सरकार के अनुसार, हमले केवल राजधानी तक सीमित नहीं रहे, बल्कि मिरांडा, अरागुआ और ला गुएरा जैसे राज्यों में नागरिक और सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया गया। राष्ट्रपति निकोलस मादुरो ने इसे ‘बाहरी आक्रमण’ करार देते हुए आपात स्थिति की घोषणा की, जिससे नागरिक अधिकारों पर अस्थायी रोक और सशस्त्र बलों की भूमिका में विस्तार संभव हो गया।

सरकार ने जनता से सड़कों पर उतरकर ‘साम्राज्यवादी आक्रमण’ के विरुद्ध एकजुट प्रतिरोध का आह्वान किया। यह केवल सैन्य प्रतिक्रिया नहीं रही—इसे राष्ट्रीय अस्मिता और संप्रभुता का प्रश्न बना दिया गया।

वाशिंगटन की चुप्पी और पूर्व-नियोजित संकेत

व्हाइट हाउस और पेंटागन की ओर से तत्काल कोई आधिकारिक बयान नहीं आया, लेकिन अमेरिकी मीडिया—विशेषकर CBS News—ने अधिकारियों के हवाले से दावा किया कि राष्ट्रपति ट्रंप ने हमलों की अनुमति कई दिन पहले ही दे दी थी। खराब मौसम और अन्य सैन्य प्राथमिकताओं के कारण कार्रवाई टाली गई थी।

हमलों से कुछ घंटे पहले अमेरिकी संघीय उड्डयन प्रशासन द्वारा वेनेजुएला के हवाई क्षेत्र में अमेरिकी विमानों पर प्रतिबंध, इस अभियान की सुनियोजित प्रकृति की ओर स्पष्ट संकेत करता है। यह अचानक लिया गया निर्णय नहीं था—यह एक लिखी जा चुकी रणनीति का क्रियान्वयन था।

अमेरिका के भीतर उठते असहज प्रश्न

इस सैन्य कार्रवाई पर अमेरिका के भीतर भी असहमति के स्वर उभरे हैं। डेमोक्रेटिक सीनेटर ब्रायन शाट्ज ने स्पष्ट कहा कि वेनेजुएला में ऐसा कोई अमेरिकी राष्ट्रीय हित नहीं है, जो युद्ध को न्यायोचित ठहरा सके। उनका आरोप है कि राष्ट्रपति प्रशासन जनता को यह बताने तक को तैयार नहीं कि देश को किस दिशा में धकेला जा रहा है।

यह असहमति मामूली नहीं है—यह उस लोकतंत्र पर प्रश्नचिह्न है, जिसके नाम पर दुनिया भर में बम गिराए जाते हैं।

क्षेत्रीय बेचैनी और अंतरराष्ट्रीय हलचल

लातिन अमेरिका में प्रतिक्रिया तीव्र है। कोलंबिया के राष्ट्रपति गुस्तावो पेट्रो ने इसे सीधे-सीधे ‘वेनेजुएला पर हमला’ बताया और सीमावर्ती क्षेत्रों में आपात ऑपरेशनल प्लान सक्रिय कर दिया। उन्होंने अमेरिकी राज्यों के संगठन और संयुक्त राष्ट्र से तत्काल बैठक बुलाने की मांग की है।

स्पष्ट है—यह संकट अब केवल द्विपक्षीय नहीं रहा।

‘ऑपरेशन सदर्न स्पीयर’ और घेराबंदी की नीति

इन हमलों से पहले ही अमेरिका कैरेबियन सागर में अपनी नौसैनिक मौजूदगी बढ़ा चुका था, जिसे ‘ड्रग कार्टेल्स के विरुद्ध अभियान’ बताया गया। ड्रोन हमले, संदिग्ध जहाजों की जब्ती और वेनेजुएला से जुड़े तेल टैंकरों पर कब्जा—ये सभी कदम एक व्यापक आर्थिक और सैन्य घेराबंदी की ओर संकेत करते हैं।

मादुरो सरकार इसे ‘अवैध युद्ध’ कह रही है, जबकि वाशिंगटन इसे अपनी सुरक्षा की अनिवार्यता बताता है।

अमेरिकी कथा: ड्रग्स और लोकतंत्र

अमेरिका का आधिकारिक तर्क है कि मादुरो सरकार ने वेनेजुएला को ‘नार्को-स्टेट’ में बदल दिया है। 2024 के विवादित चुनावों के बाद मादुरो की वैधता को नकारते हुए अमेरिका ‘लोकतंत्र की बहाली’ को अपना उद्देश्य बताता है।

लेकिन यही वह बिंदु है, जहाँ कथा दरकने लगती है।

असली प्रश्न: तेल

वेनेजुएला के पास लगभग 303 अरब बैरल का प्रमाणित तेल भंडार है—दुनिया में सबसे अधिक। उत्पादन घटा है, लेकिन रणनीतिक मूल्य आज भी अपार है। वेनेजुएला का भारी क्रूड अमेरिकी रिफाइनरियों के लिए विशेष रूप से उपयुक्त है।

यदि उद्देश्य केवल ड्रग्स होता, तो तेल टैंकर निशाने पर क्यों होते?
यदि उद्देश्य केवल लोकतंत्र होता, तो आर्थिक नाकेबंदी क्यों की जाती?

यह स्पष्ट रूप से सत्ता परिवर्तन की रणनीति है।

भारत और विश्व के लिए खतरे

यह संघर्ष स्थानीय नहीं रहेगा। वेनेजुएला का तेल वैश्विक बाजार से गायब हुआ तो कच्चे तेल की कीमतें उछलेंगी। भारत जैसे देश, जो अपनी 80 प्रतिशत तेल जरूरत आयात से पूरी करते हैं, सीधे प्रभावित होंगे।

साथ ही शरणार्थी संकट, रूस-चीन की सक्रियता और वैश्विक ध्रुवीकरण—ये सभी इस संघर्ष को ‘लोकल’ से ‘ग्लोबल’ बना सकते हैं।

अंतिम विमर्श: साम्राज्य, ग्रीड और प्रतिरोध

यहीं से यह लेख केवल विश्लेषण नहीं रहता—यह एक नैतिक अभियोग बन जाता है।
आखिर अमेरिका को यह अधिकार किसने दिया कि वह अपने लालच को ‘लोकतंत्र’, अपने हितों को ‘मानवाधिकार’ और अपने बमों को ‘न्याय’ कहकर किसी संप्रभु राष्ट्र को रौंद दे?

काराकस की सड़कों पर गिरते बम केवल इमारतें नहीं तोड़ते—वे उस अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था का मुखौटा नोचते हैं, जो ताकतवर के अपराध को नीति और कमजोर के प्रतिरोध को अपराध घोषित करती है।

इराक, लीबिया, सीरिया, अफ़ग़ानिस्तान—हर जगह कहानी वही रही।
जो झुक गया, वह सुधर गया।
जो खड़ा रहा, वह तानाशाह बना दिया गया।

वेनेजुएला आज उसी सूची में है।

काराकस आज केवल एक शहर नहीं है—वह उन सभी राष्ट्रों की चेतावनी है, जो संसाधनों से समृद्ध हैं लेकिन साम्राज्य की शर्तों पर चलने को तैयार नहीं।

इतिहास गवाह है—
साम्राज्य बमों से युद्ध जीत सकते हैं,
लेकिन न्याय नहीं।

और जिस दिन दुनिया ने यह सच स्वीकार कर लिया,
उस दिन काराकस की यह जलती रात केवल त्रासदी नहीं,
बल्कि साम्राज्यवादी अहंकार के विरुद्ध प्रतिरोध की उद्घोषणा मानी जाएगी।

Friday, 2 January 2026

मासूमों की मौत और सत्ता का अहंकार: जब ‘घंटा’ बन गया जवाब


 लोकतंत्र की आत्मा प्रश्न से जीवित रहती है।

और जब सत्ता उसी प्रश्न को ‘फोकट’ कहकर अपमानित करने लगे, तो लोकतंत्र के क्षरण की शुरुआत हो जाती है।

मध्यप्रदेश सरकार के वरिष्ठ मंत्री कैलाश विजयवर्गीय द्वारा कहा गया—
“फोकट प्रश्न मत पूछिए… क्या-क्या घंटा हो गया”—
केवल एक असंयमित वक्तव्य नहीं है। यह उस सत्तागत अहंकार का प्रकटीकरण है, जो जनता के दुःख और प्रश्नों को महत्वहीन समझने लगता है।

जब इंदौर के भागीरथपुरा क्षेत्र में गंदा पानी पीने से मासूम बच्चों और बुजुर्गों की मृत्यु की खबरें सामने आईं, तब इस त्रासदी पर उठे सवालों को कैलाश विजयवर्गीय द्वारा ‘घंटा’ कहकर टाल देना केवल संवेदनहीनता नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक उत्तरदायित्व से पलायन है।

‘घंटा’ : सत्ता की भाषा, सत्ता की सोच

यह ‘घंटा’ किसी सामान्य बातचीत का शब्द नहीं था।
कैलाश विजयवर्गीय के वक्तव्य में यह उस मानसिकता का संकेतक बन गया, जिसमें—

  • जनता का प्रश्न असुविधा है
  • पीड़ित की पीड़ा बोझ है
  • और जवाबदेही सत्ता की प्राथमिकता नहीं

लोकतंत्र में यह सोच अत्यंत घातक होती है, क्योंकि यहां प्रश्न सत्ता का अपमान नहीं, उसकी परीक्षा होता है।

संवेदनहीनता का पूर्व इतिहास

यह पहला अवसर नहीं है जब कैलाश विजयवर्गीय के वक्तव्यों ने पीड़ितों के प्रति उपेक्षा का भाव प्रकट किया हो।
महिला खिलाड़ियों से जुड़े प्रकरण हों या चुनावोत्तर हिंसा के प्रसंग—हर बार जिम्मेदारी स्वीकार करने के स्थान पर वक्तव्य का केंद्र पीड़ित ही बना।

यह क्रम बताता है कि यह केवल शब्दों की चूक नहीं, बल्कि राजनीतिक आचरण की समस्या है।

इंदौर: स्वच्छता के दावों के नीचे छुपी सड़ांध

इंदौर, जिसे देश का सबसे स्वच्छ शहर कहा जाता है, उसी शहर में पेयजल लाइन में सीवेज का गंदा पानी मिलना प्रशासनिक विफलता का गंभीर उदाहरण है।
भागीरथपुरा में हुई मौतें केवल हादसा नहीं, बल्कि व्यवस्था की सामूहिक असफलता हैं।

और जब ऐसी असफलता पर सवाल उठाने वालों को कैलाश विजयवर्गीय जैसे जिम्मेदार मंत्री ‘फोकट’ कहें, तो यह सत्ता की संवेदनशीलता पर गहरा प्रश्नचिह्न लगाता है।

पीआर बनाम पश्चाताप

घटना के बाद अस्पतालों के दौरे, मुआवजे की घोषणाएं और अधिकारियों का निलंबन—
ये सब तब तक खोखले प्रतीत होते हैं, जब तक सत्ता अपने लहजे और दृष्टिकोण पर आत्ममंथन न करे।

क्योंकि समस्या केवल पाइपलाइन की नहीं, उस सोच की है जिसे कैलाश विजयवर्गीय जैसे मंत्री सार्वजनिक रूप से व्यक्त कर रहे हैं।

लोकतंत्र की चेतावनी

दूषित जल शरीर को नष्ट करता है,
परंतु दूषित भाषा लोकतंत्र की आत्मा को।

जब कैलाश विजयवर्गीय जैसे वरिष्ठ मंत्री जनता के प्रश्नों को ‘घंटा’ कहकर खारिज करते हैं, तो यह संकेत होता है कि सत्ता प्रश्नों से डरने लगी है।

अंतिम आह्वान

कैलाश विजयवर्गीय द्वारा दूषित पानी से हुई मासूमों की मौत पर जो लहजा अपनाया गया, वह केवल एक बयान नहीं बल्कि सत्ता के अहंकार की पोल खोलता है। 140 करोड़ जनता के सवालों को “फोकट” या “घंटा” कहकर टालना लोकतंत्र के मूल सिद्धांतों के खिलाफ है।

इसलिए आज हम सबको मिलकर एक सशक्त आवाज़ उठानी होगी—एक ऐसी आवाज़ जो सत्ता को याद दिलाए कि वह जनता की सेवक है, मालिक नहीं। जनता के हक और सवालों की इज्जत करना ही असली लोकतंत्र है।

जागो, बोलो और यह सुनिश्चित करो कि भविष्य में किसी मासूम की जान की कीमत पर कोई भी “घंटा” नहीं कह सके। यही हमारा अंतिम आह्वान है—जनता की ताकत की घंटी बजाओ, ताकि किसी भी सरकार को अपनी जवाबदेही भूलने का मौका न मिले।

जय माँ भारती!

Sunday, 21 December 2025

अरावली: कानून की रेखाएँ और प्रकृति की पीड़ा

 माँ,

नमस्कार।
कुछ कहना है, पर समझ नहीं आ रहा कि कैसे कहूँ। शब्द साथ नहीं दे रहे। फिर भी लिख रहा हूँ, क्योंकि चुप रहना अब और बड़ा अपराध लगता है। सबसे पहले यही कहना है—माँ, हमें क्षमा करना। हम जानते हैं कि हम गलतियाँ कर रहे हैं। यह भी जानते हैं कि बार-बार क्षमा माँगना अब शायद पर्याप्त नहीं है। क्योंकि आज समस्या अज्ञान की नहीं, उदासीनता की है। और जब समाज उदासीन हो जाता है, तब दंड केवल वर्तमान नहीं, भविष्य भी भुगतता है।


माँ, आज यह पत्र अरावली के संदर्भ में लिख रहा हूँ। वही अरावली, जिसने सदियों से राजस्थान, हरियाणा, गुजरात और दिल्ली-एनसीआर की भूमि को संतुलन दिया। जिसने जल को रोका, मिट्टी को थामा और पश्चिमी भारत को मरुस्थल बनने से बचाए रखा। यह कोई भावनात्मक दावा नहीं, बल्कि पर्यावरणीय अध्ययनों और सरकारी रिपोर्टों में दर्ज तथ्य हैं।

हाल ही में देश की सर्वोच्च अदालत ने यह निर्देश दिया है कि अरावली की पहचान अब वैज्ञानिक मानकों के आधार पर की जाएगी। इसके तहत केवल वही भू-भाग अरावली का हिस्सा माना जाएगा, जिसकी स्थानीय ऊँचाई 100 मीटर या उससे अधिक है। केंद्र सरकार और चार संबंधित राज्यों—दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान और गुजरात—को संयुक्त रूप से एक वैज्ञानिक परिभाषा और स्थायी प्रबंधन योजना तैयार करने का आदेश दिया गया है। इस अवधि में नई खनन लीज़ों पर रोक लगाई गई है और केवल पहले से वैध खानों को सीमित अनुमति दी जा सकती है।

कानून की भाषा स्पष्ट है। उद्देश्य भी स्पष्ट है—खनन और विकास को नियंत्रित करना तथा पर्यावरणीय प्रबंधन को बेहतर बनाना। लेकिन माँ, प्रकृति कानून की परिभाषाओं में नहीं बँधती। अरावली की छोटी-छोटी पहाड़ियाँ, जो इस नई परिभाषा में बाहर हो सकती हैं, पारिस्थितिकी के लिए उतनी ही महत्वपूर्ण हैं जितनी ऊँची चोटियाँ। यह बात पर्यावरण विशेषज्ञों और वैज्ञानिक अध्ययनों में बार-बार सामने आई है।

यह तथ्य भी दर्ज है कि अरावली क्षेत्र भूजल रिचार्ज, मिट्टी संरक्षण और जैव विविधता के लिए एक प्राकृतिक ढाल का काम करता है। दिल्ली-एनसीआर की वायु गुणवत्ता, राजस्थान का जल संतुलन और पश्चिमी भारत का पर्यावरणीय स्थायित्व इस पर्वतमाला से सीधे जुड़ा हुआ है। इन क्षेत्रों में पहले से हो चुके अनियंत्रित खनन और भूमि उपयोग ने अरावली को कमजोर किया है—यह भी सरकारी और मीडिया रिपोर्टों में स्वीकार किया गया तथ्य है।

माँ, चिंता इस बात की नहीं है कि नियम बनाए गए हैं। चिंता इस बात की है कि कहीं संरक्षण को केवल माप और ऊँचाई तक सीमित न कर दिया जाए। जो 100 मीटर से कम है, वह कम महत्वपूर्ण नहीं हो जाता। प्रकृति में कोई हिस्सा छोटा नहीं होता।

यह पत्र किसी आरोप के लिए नहीं है। यह किसी संस्था या निर्णय के विरोध में भी नहीं है। यह केवल एक नागरिक की अपनी ही भूमि के प्रति चिंता है। विकास आवश्यक है, लेकिन विकास का अर्थ यदि संतुलन का टूटना बन जाए, तो उसकी कीमत बहुत भारी होती है—यह इतिहास और विज्ञान दोनों सिखाते हैं।

माँ, शायद अब दंड हमारा भाग्य बन चुका है—सूखते जल स्रोत, बढ़ता तापमान और बिगड़ता पर्यावरण। फिर भी यदि संभव हो, तो हमें सुबुद्धि देना, ताकि निर्णय लेते समय हम केवल आज नहीं, आने वाली पीढ़ियों को भी देख सकें। ताकि विकास और विनाश के बीच का अंतर हमें स्पष्ट दिखाई दे।

यह पत्र किसी भावुकता का नहीं, बल्कि तथ्यों और चिंता का दस्तावेज़ है। आशा बस इतनी है कि अभी भी समय है।

माँ,
यदि अब भी संभव हो—
तो हमें सुबुद्धि दीजिए।

आपका
आदित्य तिक्कू

Friday, 19 December 2025

भीख और आर्थिक निर्भरता: पाकिस्तान का दर्पण

 सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात से लगातार सामने आ रही ख़बरें केवल प्रवासी नियमों के उल्लंघन की सूचना नहीं हैं, बल्कि वे पाकिस्तान के राज्य-चरित्र पर लगे एक गहरे प्रश्नचिह्न की तरह हैं। खाड़ी देशों में बड़ी संख्या में पाकिस्तानी नागरिकों का भीख माँगते या आपराधिक गतिविधियों में लिप्त पाया जाना कोई आकस्मिक सामाजिक विचलन नहीं है, बल्कि वर्षों से सड़ते चले आ रहे आर्थिक, राजनीतिक और नैतिक ढाँचे का स्वाभाविक परिणाम है। यह वही परिणाम है, जिसे समय रहते यदि राज्य ने देखा होता, तो आज अंतरराष्ट्रीय मंचों पर ऐसी शर्मनाक चेतावनियाँ सुनने की नौबत न आती।


विडंबना यह है कि जिस देश के नागरिक आज विदेशों में हाथ फैलाते दिखाई दे रहे हैं, उसी देश की सरकारें दशकों से अंतरराष्ट्रीय संस्थानों के सामने कटोरा लेकर खड़ी रही हैं। आईएमएफ, वर्ल्ड बैंक, सऊदी अरब और चीन—हर दरवाज़े पर पाकिस्तान की आर्थिक नीति ने आत्मनिर्भरता की नहीं, बल्कि स्थायी याचना की भाषा बोली है। सत्ता बदली, चेहरे बदले, नारे बदले, पर अर्थव्यवस्था का मूल स्वभाव नहीं बदला। हर सरकार ने यह दावा किया कि वह कटोरा तोड़ देगी, लेकिन व्यवहार में केवल उसका रंग बदला गया और उसे कभी ‘लोन’, कभी ‘बेलआउट’ तो कभी ‘डिपॉज़िट’ का सम्मानजनक नाम दे दिया गया।

जब राज्य स्वयं अपने अस्तित्व के लिए बार-बार बाहरी सहायता पर निर्भर हो, तब समाज के निचले पायदान पर खड़ा नागरिक आत्मसम्मान की कौन-सी पाठशाला से निकलेगा? खाड़ी देशों में पहुँचे ये भिखारी केवल व्यक्तिगत विफलता की कहानी नहीं हैं, वे उस सामूहिक मानसिकता का प्रतिबिंब हैं जिसे वर्षों से यह सिखाया गया कि देश में मेहनत से नहीं, सिफ़ारिश, जुगाड़ या पलायन से ही जीवन चल सकता है। यह मानना भोलेपन के अतिरिक्त कुछ नहीं कि सख़्त वीज़ा प्रक्रियाओं के बावजूद इतनी बड़ी संख्या में लोग वहाँ यूँ ही पहुँच गए। इसके पीछे एक सुनियोजित तंत्र, एक संगठित माफिया और एक मौन राज्य-संरक्षण की बू स्पष्ट दिखाई देती है।

देश के भीतर भी दृश्य अलग नहीं है। साफ़ पीने का पानी तक खरीदने को विवश नागरिक, बेरोज़गारी से त्रस्त युवा, अपर्याप्त वेतन पर जीवन ढोते कर्मचारी और घर बचाने के लिए संपत्ति बेचते परिवार—ये सभी उस आर्थिक पतन के संकेत हैं जिसे लंबे समय तक राजनीतिक नारों से ढका गया। जब जीवन यापन स्वयं संघर्ष बन जाए, तब अपराध और भीख नैतिक पतन नहीं, बल्कि मजबूरी के औज़ार बन जाते हैं। यही कारण है कि भीख के साथ-साथ चोरी, ऑनलाइन फ्रॉड और आर्थिक अपराधों की प्रवृत्ति भी तेज़ी से बढ़ी है, देश के भीतर भी और बाहर भी।

सऊदी अरब और यूएई की चेतावनियों को किसी साज़िश के चश्मे से देखना आत्म-प्रवंचना होगी। ये चेतावनियाँ दरअसल उस आईने की तरह हैं, जिसमें पाकिस्तान को अपना वास्तविक चेहरा देखने का अवसर मिला है। दुर्भाग्य यह है कि कुछ संगठित गिरोहों और असफल नीतियों की कीमत अब पूरे राष्ट्र को चुकानी पड़ रही है। यदि वीज़ा दरवाज़े बंद होते हैं, तो उसका दुष्प्रभाव उन लाखों ईमानदार पाकिस्तानियों पर पड़ेगा, जिनका इन गतिविधियों से कोई लेना-देना नहीं है।

इस संकट से निकलने का मार्ग बाहर नहीं, भीतर है। जब तक राज्य स्वयं भीख की मानसिकता से मुक्त नहीं होगा, तब तक नागरिकों से आत्मसम्मान की अपेक्षा करना छल होगा। कटोरा केवल नागरिकों के हाथ से नहीं, सबसे पहले सत्ता के हाथ से गिराना होगा। आर्थिक आत्मनिर्भरता, जवाबदेह शासन और गरिमापूर्ण रोज़गार के बिना यह विडंबना और गहराती जाएगी—और इतिहास दर्ज करेगा कि जिस देश की सरकारें दुनिया से माँगती रहीं, उसी देश के नागरिक पूरी दुनिया में माँगते फिरते रहे।

चिकन नेक नहीं, वज्ररेखा: भारत की वह सीमा जिसे छूना भी दुस्साहस है

 आजकल बांग्लादेश की सड़कों पर भारत-विरोध के नारे गूंज रहे हैं। शरीफ उस्मान हादी की मृत्यु के बाद भड़की हिंसा ने एक बार फिर यह प्रश्न खड़ा कर दिया है कि क्या यह आक्रोश केवल भावनात्मक उबाल है, या इसके पीछे कोई सुनियोजित रणनीतिक दुष्प्रचार छिपा है? ढाका, चटगांव सहित अनेक शहरों में भारतीय दूतावासों और सहायक उच्चायोगों के बाहर जिस प्रकार पत्थरबाज़ी, आगजनी और धमकियों का प्रदर्शन हुआ—वह चिंता का विषय अवश्य है, किंतु उससे अधिक यह एक भ्रमपूर्ण आत्ममुग्धता का संकेत देता है।


प्रदर्शनकारियों के नारों में एक शब्द बार-बार उछला—सिलीगुड़ी कॉरिडोर, जिसे वे ‘चिकन नेक’ कहकर भारत की रणनीतिक कमजोरी बताने का प्रयास कर रहे हैं। यहाँ तक कि भारत के उत्तर-पूर्वी राज्यों को अलग-थलग करने और इस गलियारे को काट देने जैसी उन्मादी घोषणाएँ भी की गईं। परंतु प्रश्न यह है—क्या ये नारे जमीनी हकीकत से टकराने की क्षमता रखते हैं?

उत्तर स्पष्ट है—बिल्कुल नहीं।

सिलीगुड़ी कॉरिडोर: भूगोल नहीं, भारत की संकल्प-रेखा

भारत के मानचित्र पर पश्चिम बंगाल के उत्तरी छोर पर स्थित सिलीगुड़ी कॉरिडोर मात्र 20–22 किलोमीटर चौड़ा अवश्य है, पर इसका सामरिक महत्व अपार है। यही वह जीवनरेखा है, जो भारत की मुख्य भूमि को असम, अरुणाचल प्रदेश, नागालैंड, मणिपुर, मिज़ोरम, मेघालय, त्रिपुरा और सिक्किम से जोड़ती है। लगभग साढ़े चार करोड़ नागरिकों का जीवन, राष्ट्र की सैन्य आपूर्ति, आर्थिक संपर्क और प्रशासनिक एकता—सब इसी से होकर प्रवाहित होते हैं।

दक्षिण में बांग्लादेश, पश्चिम में नेपाल, उत्तर में भूटान और उससे आगे चीन की चुंबी घाटी—यह क्षेत्र भौगोलिक रूप से जितना संवेदनशील है, उतना ही रणनीतिक रूप से सुदृढ़ भी।

बांग्लादेश की सियासत और भारत-विरोध का उभार

2024 में शेख हसीना सरकार के पतन और मुहम्मद यूनुस के नेतृत्व में अंतरिम व्यवस्था के बाद बांग्लादेश की राजनीति अस्थिरता के दौर से गुजर रही है। इसी अस्थिरता में भारत-विरोध को एक सहज बलि का बकरा बनाया जा रहा है। हादी की मृत्यु के बाद भारत पर उंगलियाँ उठाना, जबकि हसीना भारत में शरण लिए हुए हैं—यह राजनीतिक अवसरवाद का परिचित खेल है।

चीन और पाकिस्तान के साथ बढ़ती निकटता के संकेत भी दिए जा रहे हैं, किंतु यह सब शब्दों की कूटनीति से अधिक कुछ नहीं।

भारत की तैयारी: ‘चिकन नेक’ से ‘आयरन फोर्ट्रेस’ तक

भारत ने सिलीगुड़ी कॉरिडोर को कभी कमजोरी मानकर नहीं छोड़ा। पिछले एक दशक में इसे अभेद्य सैन्य दुर्ग में परिवर्तित कर दिया गया है।

  • नए सैन्य ठिकाने:
    असम के धुबरी में लाचित बोरफुकन मिलिट्री स्टेशन, बिहार के किशनगंज और पश्चिम बंगाल के चोपड़ा में नए गैरिसन—तेज़ तैनाती और चौकसी के लिए।
  • आधुनिक सैन्य शक्ति:
    हाशिमारा एयरबेस पर तैनात राफेल लड़ाकू विमान, ब्रह्मोस सुपरसोनिक मिसाइल रेजिमेंट, S-400 वायु रक्षा प्रणाली—यह केवल हथियार नहीं, बल्कि स्पष्ट संदेश हैं।
  • बहुस्तरीय सुरक्षा संरचना:
    ट्रिशक्ति कोर, ब्रह्मास्त्र कोर, मैकेनाइज्ड इन्फैंट्री, पैरा स्पेशल फोर्सेज और उन्नत एयर डिफेंस—पूर्वी कमान की संपूर्ण शक्ति यहाँ एकत्र की जा सकती है।

सेना के वरिष्ठ अधिकारियों के शब्दों में—
“आज सिलीगुड़ी भारत की सबसे सशक्त रक्षा पंक्ति है, जहाँ आक्रमण नहीं, केवल घेराबंदी संभव है—और वह भी हमलावर की।”

वैकल्पिक संपर्क और भूटान की भूमिका

भारत ने एक और महत्वपूर्ण कदम उठाया है—निर्भरता का विकेंद्रीकरण। नए रेल-रोड नेटवर्क, म्यांमार के माध्यम से समुद्री मार्ग, नेपाल और बांग्लादेश के रास्ते वैकल्पिक कनेक्टिविटी—सब पर कार्य प्रगति पर है।

इसके साथ ही भूटान जैसा भरोसेमंद मित्र भारत के साथ खड़ा है। डोकलाम संकट ने यह स्पष्ट कर दिया कि भूटानी भूमि का भारत-विरोधी उपयोग केवल कल्पना है।

खुफिया तंत्र और सीमा सुरक्षा

RAW, IB, सैन्य खुफिया एजेंसियाँ, उपग्रह निगरानी, AI-आधारित सर्विलांस, स्मार्ट फेंसिंग, थर्मल कैमरे—BSF, SSB और ITBP की संयुक्त तैनाती के साथ किसी भी असामान्य गतिविधि पर रीयल-टाइम प्रतिक्रिया संभव है।

चीन-पाकिस्तान-बांग्लादेश: संयुक्त खतरा या संयुक्त भ्रम?

यह तर्क बार-बार उछाला जाता है कि यदि चीन और पाकिस्तान मिलकर दबाव बनाएं तो भारत कठिनाई में पड़ सकता है। किंतु तथ्य इसके विपरीत हैं—

  • पाकिस्तान भौगोलिक रूप से अप्रासंगिक दूरी पर है।
  • चीन के लिए भारत-भूटान-नेपाल के जटिल भूगोल के बीच सीधी सैन्य कार्रवाई लगभग असंभव है।
  • डोकलाम के बाद चीन भलीभांति समझ चुका है कि भारत न तो रणनीतिक रूप से, न कूटनीतिक रूप से पीछे हटता है।

निष्कर्ष: भ्रम टूटेगा, भारत अडिग रहेगा

आज सिलीगुड़ी कॉरिडोर कोई संकरी भूमि नहीं, बल्कि सैन्य शक्ति, कूटनीति, आधारभूत संरचना और तकनीक का संगम है। जो इसे काटने की धमकी दे रहे हैं, उन्हें पहले यह समझना होगा कि उनके अपने देश में इससे कहीं अधिक नाज़ुक ‘चिकन नेक’ मौजूद हैं।

2017 के डोकलाम से लेकर आज तक भारत ने बार-बार यह सिद्ध किया है कि यह क्षेत्र कमजोरी नहीं, रणनीतिक आत्मविश्वास का प्रतीक है।

भारत का संदेश स्पष्ट है—
धमकियाँ शोर हैं, तैयारी सत्य है।
और सिलीगुड़ी—अब केवल गलियारा नहीं, राष्ट्र की दृढ़ इच्छाशक्ति है।

जय माँ भारती!

Thursday, 11 December 2025

नैतिकता का दंड या कुंठित समाज का खेल?

आज समाज की दशा यह है कि दूसरों की खुशी हमें चुभने लगी है और दूसरों के दुःख में हमें आनंद प्राप्त होता है। सोचिए—एक पड़ोसी अपने घर में उत्सव मना रहा है, कोई मित्र अपनी सफलता का जश्न मना रहा है, और हम अपने भीतर की अधूरी इच्छाओं, असंतोष और कड़वाहट को उनकी मुस्कान पर उंडेल रहे हैं। कभी कहा जाता था कि शत्रु भी पर्व-त्योहार पर विराम ले लेता है, पर आज हमारी मानसिकता ऐसी हो गई है कि दूसरों की प्रसन्नता ही हमें खटकने लगी है। इसी बेरहम मानसिकता की भेंट चढ़ी है इंद्रेश उपाध्याय जी की शादी—जिस दिन उनके जीवन का सबसे सुंदर क्षण होना चाहिए था, उस दिन हमने समाज के रूप में अपनी ही खोखली मानसिकता का प्रदर्शन कर दिया।


पिछले चंद दिनों में जिस तरह से उनकी ट्रोलिंग और आलोचना हुई, वह केवल उनके व्यक्तित्व का नहीं, हमारी आत्मा का एक्सपोज़र है। हमने यह दिखा दिया कि हम दूसरों के सुख में असहिष्णु और दूसरों के दुःख में प्रफुल्लित होना सीख चुके हैं। स्मृति मंधाना की शादी टूटी तो उनके पुराने वीडियो वायरल किए गए; अब वही मानसिकता इंद्रेश जी के साथ लागू हो रही है। जिस दिन उन्हें आशीर्वाद और दुआओं की जरूरत थी, उस दिन हमने अपने भीतर की जलन और कड़वाहट का परिचय दिया।

इंद्रेश उपाध्याय कौन हैं? कोई फिल्मी सितारा, अरबपति, उद्योगपति या राजनेता नहीं। वे एक सौम्य, विनम्र गृहस्थ-कथावाचक हैं। उनके पिताजी ने जीवन भर कथा कही और वही संस्कार उनके भीतर पले-बढ़े। पर समाज ने उनके विवाह को तमाशा बना दिया—हेलीकॉप्टर उतरा, सजावट महंगी, होटल भव्य!—यह प्रश्न नहीं है। समस्या यह है कि धर्म से जुड़े व्यक्ति का सुख और सम्मान हमारी आँखों में खटकता है।

इस देश के खिलाड़ी दो-दो, तीन-तीन विवाह कर लेते हैं, करोड़ों खर्च कर देते हैं, खुलेआम अनैतिक जीवनशैली अपनाते हैं—और हम उन्हें आदर्श मानते हैं। बॉलीवुड सितारे फूहड़ता, नशा, ड्रग्स, बहुविवाह और खुले संबंध अपनाते हैं—फिर भी हमारे आइडल बन जाते हैं। पर कथावाचक यदि सामान्य गृहस्थ जीवन में खुशी ले, अच्छे कपड़े पहनें, परिवार के साथ जीवन जिए, तो वही समाज नैतिकता का डंडा उठा देता है।

सबसे विषैले हमले उनके निजी जीवन, उनकी पत्नी के अतीत और परिवार पर किए गए। किसी स्त्री के संघर्ष, उसके दुःख, उसके निर्णय—यह सब हमने कंटेंट बनाकर वायरल किया। क्या हमें इस बात का ज्ञान है कि वास्तविकता क्या है? नहीं। फिर भी हम न्यायाधीश बन बैठे हैं।

पुरानी कथाएँ, पुराने ऑडियो, पुराने बयान—इन सबको काट-छाँट कर प्रस्तुत कर दिया गया। क्या हम यह सोचते हैं कि कोई भी मानव अपने जीवन में अपरिपक्व क्षण नहीं बिताता? विचार समय के साथ बदलते हैं, पर समाज ने तय कर दिया कि उनके दो पुराने वाक्यों से पूरी जिंदगी की छवि तय होगी। यही समाज की नैतिक गिरावट है।

कथावाचक समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचते हैं। वे अपने यजमान से कमाते हैं, हम नहीं देते। कोई अपनी धनराशि से यात्रा करता है, दान करता है, कथा करवाता है—यह उसका अधिकार है। परंतु कथावाचक पर सवाल उठाना, उनके निजी जीवन पर तीर चलाना, उनकी पत्नी और परिवार पर निशाना साधना—यह समाज की नैतिकता नहीं, केवल भीतर की खोखली कुंठा है।

धर्म मंच से नहीं मरता। धर्म तब मरता है जब किसी की खुशी देखकर हमारे भीतर शांति नहीं बचती। आज हमने इंद्रेश जी के सबसे पवित्र दिन को अपवित्र बनाने का प्रयास किया। कल यही भीड़ किसी और घर पर हमला करेगी। और जिस दिन यह लक्ष्य हमारा परिवार होगा, यह भीड़ हमारे साथ नहीं होगी।

इंद्रेश उपाध्याय कोई सन्यासी नहीं, बल्कि सामान्य गृहस्थ कथावाचक हैं। उन्हें उतना ही सुख, सम्मान और गरिमा का अधिकार है जितना हमें। यदि उनकी खुशी हमें चुभती है, समस्या उनके सुख में नहीं—हमारी सोच में है।

अपनी सोच बदलिए। अपनी कुंठा त्यागिए। और दूसरों को जीने दीजिए। यही समाज का सबसे बड़ा धर्म है।

इंद्रेश जी और उनकी पत्नी को हमारी ओर से हार्दिक शुभकामनाएँ। सुखी रहें, प्रसन्न रहें और समाज भी कम से कम इतना तो समझे कि किसी की खुशी अपराध नहीं होती।

जय माँ भारती


Sunday, 7 December 2025

सपनों का आसमान बिक गया, फर्श पर रह गया इंसान

 कभी कहा गया था कि “हवाई चप्पल पहनने वाला भी हवाई जहाज़ में दिखना चाहिए।” यह वाक्य केवल चुनावी नारा नहीं था, यह आम आदमी के हक का, उसकी आकांक्षा का और देश के उजले आसमान का प्रतीक था। लेकिन आज वही आसमान एक निजी एयरलाइन की मनमानी का शिकार बन गया है। एयरपोर्ट पर लोग भूखे, थके, और असहाय फर्श पर पड़े हैं। गर्भवती महिलाएं दर्द से तड़प रही हैं। कोई पिता अपनी बेटी के लिए लहूलुहान होकर मदद मांग रहा है। कोई पति अपनी पत्नी का ताबूत लेकर हरिद्वार में अंतिम संस्कार तक नहीं पहुँच पा रहा। कोई अपनी शादी के रिसेप्शन से छूट गया है। यह दृश्य किसी तकनीकी खराबी का नहीं, किसी प्राकृतिक आपदा का नहीं—यह इंडिगो के अहंकार और सुनियोजित ब्लैकमेल का प्रत्यक्ष प्रमाण है।


इंडिगो, जिसके पास भारत के घरेलू हवाई बाजार का लगभग 65–68 प्रतिशत हिस्सा है, 3 दिसंबर से 7 दिसंबर तक देशभर में उड़ानों को रद्द कर जनता को बंधक बना रहा। पांच दिनों में हजारों फ्लाइट रद्द हुईं, लाखों यात्री फंसे, अरबों रुपये का नुकसान हुआ, और सबसे बड़ा नुकसान हुआ—सामान्य नागरिकों के सपनों और भरोसे का। स्क्रीन पर बार-बार चमकता “कैंसिल्ड” शब्द किसी यात्री की आँखों में भरी पीड़ा की व्याख्या कर रहा था। मुंबई, दिल्ली, बेंगलुरु, अहमदाबाद से लेकर छोटे शहर गुवाहाटी, भुवनेश्वर, रांची तक—हर जगह यही दृश्य। जो टिकट 3,000 रुपये की थी, वह 4–5 हज़ार तक पहुंच गई। लोग ट्रेन की जनरल बोगियों का सहारा लेने को मजबूर हुए। जो फंस गए, वे फर्श पर पड़े, भूखे-प्यासे और थके हुए।

यह घटना सिर्फ मुनाफाखोरी नहीं थी। यह एक सुनियोजित ब्लैकमेलिंग रणनीति थी। नागरिक उड्डयन महानिदेशालय(Directorate General of Civil Aviation)ने जुलाई 2025 में पायलटों की सुरक्षा के लिए नए नियम लागू किए। हर पायलट को पर्याप्त आराम, सीमित रात की ड्यूटी और सप्ताह में 48 घंटे की छुट्टी का अधिकार मिला। एयर इंडिया, अकासा, विस्तारा और स्पाइसजेट ने नियमों का पालन करते हुए पायलटों की भर्ती बढ़ाई। केवल इंडिगो ने विरोध किया। उसके पास प्रति विमान केवल 13 पायलट थे, जबकि अन्य एयरलाइंस में यह संख्या 19–26 थी। नियम लागू होते ही अधिक पायलट रखने पड़ते और मुनाफा घटता। इसका हल खोजने के बजाय उसने देश और यात्रियों को बंधक बनाना चुना।

सरकार को मजबूर होना पड़ा कि वह नियम स्थगित करे। यात्रियों की सुरक्षा, पायलटों की नींद, अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा मानक—सबके लिए आड़े हाथ आए। यह केवल इंडिगो की जीत नहीं थी; यह भारतीय व्यवस्था की हार थी। यह दिखाता है कि जब मुनाफा इंसान की जान से बड़ा हो जाता है, तो जनता की पीड़ा तुच्छ हो जाती है। एयरपोर्ट पर लेटे लोग केवल यात्री नहीं, वे उस व्यवस्था का आईना हैं जिसने अपने नागरिक को असहाय छोड़ दिया।

सबसे दुखद यह था कि क्रोध और निराशा निर्दोष ग्राउंड स्टाफ पर उतरी, जबकि असली दोषी एयरकंडीशंड दफ्तरों में बैठे बयान दे रहे थे। गर्भवती महिलाएं, कैंसर मरीज, अंतिम संस्कार से वंचित लोग, शादी और यात्रा से छूटे युवकों—इनकी कीमत केवल “हम खेद व्यक्त करते हैं” जैसी औपचारिकताओं में समेट दी गई।

यह घटना केवल इंडिगो की समस्या नहीं है। यह पूरे भारतीय तंत्र की कमजोरी का सबक है। क्या एक निजी कंपनी इतनी ताकतवर हो सकती है कि वह पूरे देश को ब्लैकमेल कर दे और नियम बदलवा ले? क्या भारतीय नागरिक और उसकी सुरक्षा केवल आर्थिक आंकड़ों के लिए बलिदान हो सकते हैं? जब हवाई चप्पल पहनने वाले का सपना फर्श पर टूटता है और हवाई जहाज़ केवल अमीरों का प्रतीक बन जाता है, तब स्पष्ट होता है कि देश की नीतियाँ कमजोर हैं और कंपनियाँ अत्यधिक ताकतवर।

आज यह संदेश साफ है—राष्ट्र तब तक सशक्त नहीं होगा जब तक न्याय, करुणा और जवाबदेही सत्ता और बाज़ार के बीच संतुलित न हों। यात्रियों की थकान, उनकी पीड़ा, उनके अधूरे संस्कार और बिखरे हुए सपनों को केवल “माफी” कहकर छिपाया नहीं जा सकता। यह भारत का शर्मनाक क्षण है। यदि अब सुधार नहीं हुआ, तो यह केवल इंडिगो की जीत नहीं, बल्कि एक पूरे भारत की हार होगी।

फर्श पर बिखरे इंसान, थकान और आंसू में लिपटे,
सपनों का आसमान अब सिर्फ मुनाफ़े का खेल बन गया।
जहाँ करुणा की कीमत नहीं, वहां न्याय भी रुक जाता है,
और रोष का गीत सिर्फ खामोशी में गूँजता रह जाता है।