आज फिर वही हुआ, जिसका अंदेशा मन के किसी कोने में पहले से था। महिला आरक्षण से जुड़ा संविधान संशोधन विधेयक दो-तिहाई बहुमत के अभाव में लोकसभा से पारित नहीं हो सका। और इसके साथ ही एक बार फिर यह सपना अधर में लटक गया—वही सपना, जो किसी की बेटी के बराबरी के हक से जुड़ा था।
यह सिर्फ एक विधेयक की असफलता नहीं है, यह उस भरोसे की थकान है जो वर्षों से बार-बार जगाया गया और फिर अधूरा छोड़ दिया गया। तीन दशक पहले शुरू हुई यह चर्चा आज भी उसी मोड़ पर खड़ी है, जहाँ से आगे बढ़ने के वादे तो हैं, लेकिन मंज़िल धुंधली है।
2023 में जब यह विधेयक पारित हुआ था, तो लगा था कि अब रास्ता साफ है। लेकिन उसके साथ जो समय-सीमा और शर्तें जुड़ीं, उन्होंने इसे फिर भविष्य की एक लंबी प्रतीक्षा में बदल दिया। जनगणना में देरी, परिसीमन की जटिलताएँ और राज्यों के राजनीतिक संतुलन की बहसों ने इस मुद्दे को फिर उलझा दिया।
सरकार की ओर से यह तर्क भी रखा गया कि लोकसभा सीटों में 50 प्रतिशत वृद्धि कर महिला आरक्षण को लागू किया जाए, ताकि किसी राज्य के राजनीतिक हितों को नुकसान न पहुँचे। लेकिन यह प्रस्ताव भी सहमति तक नहीं पहुँच सका।
विपक्ष की अपनी आपत्तियाँ रहीं—परिणामस्वरूप यह मुद्दा फिर टल गया। और इस टलने के साथ ही वह सवाल फिर पीछे छूट गया, जो असल में सबसे अहम था—आधी आबादी के अधिकार का।
इस पूरे घटनाक्रम के बीच एक राजनीतिक वाक्य गूंजता है, जिसे श्री राहुल गांधी ने कहा था—
“भारत ने देख लिया, INDIA ने रोक दिया।”
इस पर बस एक हल्की मुस्कान आती है, और भीतर कहीं एक झेंप सी रह जाती है।
अब चर्चा यही है कि यदि सहमति नहीं बनी तो यह प्रक्रिया 2034 से पहले लागू नहीं हो पाएगी। राजनीति अपने-अपने हिसाब से जीत और हार गिन लेगी, लेकिन असल में जो सबसे अधिक मायूस हुआ है, वह है वह सपना जो बार-बार आगे बढ़ाया गया और हर बार कुछ दूरी पर रोक दिया गया।
और सबसे भारी सन्नाटा उसी घर में उतरता है, जहाँ कोई अब भी इंतजार कर रहा है कि शायद अगली बार उसकी बेटी को उसका हक बिना लड़ाई के मिल जाए…


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