Sunday, 21 December 2025

अरावली: कानून की रेखाएँ और प्रकृति की पीड़ा

 माँ,

नमस्कार।
कुछ कहना है, पर समझ नहीं आ रहा कि कैसे कहूँ। शब्द साथ नहीं दे रहे। फिर भी लिख रहा हूँ, क्योंकि चुप रहना अब और बड़ा अपराध लगता है। सबसे पहले यही कहना है—माँ, हमें क्षमा करना। हम जानते हैं कि हम गलतियाँ कर रहे हैं। यह भी जानते हैं कि बार-बार क्षमा माँगना अब शायद पर्याप्त नहीं है। क्योंकि आज समस्या अज्ञान की नहीं, उदासीनता की है। और जब समाज उदासीन हो जाता है, तब दंड केवल वर्तमान नहीं, भविष्य भी भुगतता है।


माँ, आज यह पत्र अरावली के संदर्भ में लिख रहा हूँ। वही अरावली, जिसने सदियों से राजस्थान, हरियाणा, गुजरात और दिल्ली-एनसीआर की भूमि को संतुलन दिया। जिसने जल को रोका, मिट्टी को थामा और पश्चिमी भारत को मरुस्थल बनने से बचाए रखा। यह कोई भावनात्मक दावा नहीं, बल्कि पर्यावरणीय अध्ययनों और सरकारी रिपोर्टों में दर्ज तथ्य हैं।

हाल ही में देश की सर्वोच्च अदालत ने यह निर्देश दिया है कि अरावली की पहचान अब वैज्ञानिक मानकों के आधार पर की जाएगी। इसके तहत केवल वही भू-भाग अरावली का हिस्सा माना जाएगा, जिसकी स्थानीय ऊँचाई 100 मीटर या उससे अधिक है। केंद्र सरकार और चार संबंधित राज्यों—दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान और गुजरात—को संयुक्त रूप से एक वैज्ञानिक परिभाषा और स्थायी प्रबंधन योजना तैयार करने का आदेश दिया गया है। इस अवधि में नई खनन लीज़ों पर रोक लगाई गई है और केवल पहले से वैध खानों को सीमित अनुमति दी जा सकती है।

कानून की भाषा स्पष्ट है। उद्देश्य भी स्पष्ट है—खनन और विकास को नियंत्रित करना तथा पर्यावरणीय प्रबंधन को बेहतर बनाना। लेकिन माँ, प्रकृति कानून की परिभाषाओं में नहीं बँधती। अरावली की छोटी-छोटी पहाड़ियाँ, जो इस नई परिभाषा में बाहर हो सकती हैं, पारिस्थितिकी के लिए उतनी ही महत्वपूर्ण हैं जितनी ऊँची चोटियाँ। यह बात पर्यावरण विशेषज्ञों और वैज्ञानिक अध्ययनों में बार-बार सामने आई है।

यह तथ्य भी दर्ज है कि अरावली क्षेत्र भूजल रिचार्ज, मिट्टी संरक्षण और जैव विविधता के लिए एक प्राकृतिक ढाल का काम करता है। दिल्ली-एनसीआर की वायु गुणवत्ता, राजस्थान का जल संतुलन और पश्चिमी भारत का पर्यावरणीय स्थायित्व इस पर्वतमाला से सीधे जुड़ा हुआ है। इन क्षेत्रों में पहले से हो चुके अनियंत्रित खनन और भूमि उपयोग ने अरावली को कमजोर किया है—यह भी सरकारी और मीडिया रिपोर्टों में स्वीकार किया गया तथ्य है।

माँ, चिंता इस बात की नहीं है कि नियम बनाए गए हैं। चिंता इस बात की है कि कहीं संरक्षण को केवल माप और ऊँचाई तक सीमित न कर दिया जाए। जो 100 मीटर से कम है, वह कम महत्वपूर्ण नहीं हो जाता। प्रकृति में कोई हिस्सा छोटा नहीं होता।

यह पत्र किसी आरोप के लिए नहीं है। यह किसी संस्था या निर्णय के विरोध में भी नहीं है। यह केवल एक नागरिक की अपनी ही भूमि के प्रति चिंता है। विकास आवश्यक है, लेकिन विकास का अर्थ यदि संतुलन का टूटना बन जाए, तो उसकी कीमत बहुत भारी होती है—यह इतिहास और विज्ञान दोनों सिखाते हैं।

माँ, शायद अब दंड हमारा भाग्य बन चुका है—सूखते जल स्रोत, बढ़ता तापमान और बिगड़ता पर्यावरण। फिर भी यदि संभव हो, तो हमें सुबुद्धि देना, ताकि निर्णय लेते समय हम केवल आज नहीं, आने वाली पीढ़ियों को भी देख सकें। ताकि विकास और विनाश के बीच का अंतर हमें स्पष्ट दिखाई दे।

यह पत्र किसी भावुकता का नहीं, बल्कि तथ्यों और चिंता का दस्तावेज़ है। आशा बस इतनी है कि अभी भी समय है।

माँ,
यदि अब भी संभव हो—
तो हमें सुबुद्धि दीजिए।

आपका
आदित्य तिक्कू

Friday, 19 December 2025

भीख और आर्थिक निर्भरता: पाकिस्तान का दर्पण

 सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात से लगातार सामने आ रही ख़बरें केवल प्रवासी नियमों के उल्लंघन की सूचना नहीं हैं, बल्कि वे पाकिस्तान के राज्य-चरित्र पर लगे एक गहरे प्रश्नचिह्न की तरह हैं। खाड़ी देशों में बड़ी संख्या में पाकिस्तानी नागरिकों का भीख माँगते या आपराधिक गतिविधियों में लिप्त पाया जाना कोई आकस्मिक सामाजिक विचलन नहीं है, बल्कि वर्षों से सड़ते चले आ रहे आर्थिक, राजनीतिक और नैतिक ढाँचे का स्वाभाविक परिणाम है। यह वही परिणाम है, जिसे समय रहते यदि राज्य ने देखा होता, तो आज अंतरराष्ट्रीय मंचों पर ऐसी शर्मनाक चेतावनियाँ सुनने की नौबत न आती।


विडंबना यह है कि जिस देश के नागरिक आज विदेशों में हाथ फैलाते दिखाई दे रहे हैं, उसी देश की सरकारें दशकों से अंतरराष्ट्रीय संस्थानों के सामने कटोरा लेकर खड़ी रही हैं। आईएमएफ, वर्ल्ड बैंक, सऊदी अरब और चीन—हर दरवाज़े पर पाकिस्तान की आर्थिक नीति ने आत्मनिर्भरता की नहीं, बल्कि स्थायी याचना की भाषा बोली है। सत्ता बदली, चेहरे बदले, नारे बदले, पर अर्थव्यवस्था का मूल स्वभाव नहीं बदला। हर सरकार ने यह दावा किया कि वह कटोरा तोड़ देगी, लेकिन व्यवहार में केवल उसका रंग बदला गया और उसे कभी ‘लोन’, कभी ‘बेलआउट’ तो कभी ‘डिपॉज़िट’ का सम्मानजनक नाम दे दिया गया।

जब राज्य स्वयं अपने अस्तित्व के लिए बार-बार बाहरी सहायता पर निर्भर हो, तब समाज के निचले पायदान पर खड़ा नागरिक आत्मसम्मान की कौन-सी पाठशाला से निकलेगा? खाड़ी देशों में पहुँचे ये भिखारी केवल व्यक्तिगत विफलता की कहानी नहीं हैं, वे उस सामूहिक मानसिकता का प्रतिबिंब हैं जिसे वर्षों से यह सिखाया गया कि देश में मेहनत से नहीं, सिफ़ारिश, जुगाड़ या पलायन से ही जीवन चल सकता है। यह मानना भोलेपन के अतिरिक्त कुछ नहीं कि सख़्त वीज़ा प्रक्रियाओं के बावजूद इतनी बड़ी संख्या में लोग वहाँ यूँ ही पहुँच गए। इसके पीछे एक सुनियोजित तंत्र, एक संगठित माफिया और एक मौन राज्य-संरक्षण की बू स्पष्ट दिखाई देती है।

देश के भीतर भी दृश्य अलग नहीं है। साफ़ पीने का पानी तक खरीदने को विवश नागरिक, बेरोज़गारी से त्रस्त युवा, अपर्याप्त वेतन पर जीवन ढोते कर्मचारी और घर बचाने के लिए संपत्ति बेचते परिवार—ये सभी उस आर्थिक पतन के संकेत हैं जिसे लंबे समय तक राजनीतिक नारों से ढका गया। जब जीवन यापन स्वयं संघर्ष बन जाए, तब अपराध और भीख नैतिक पतन नहीं, बल्कि मजबूरी के औज़ार बन जाते हैं। यही कारण है कि भीख के साथ-साथ चोरी, ऑनलाइन फ्रॉड और आर्थिक अपराधों की प्रवृत्ति भी तेज़ी से बढ़ी है, देश के भीतर भी और बाहर भी।

सऊदी अरब और यूएई की चेतावनियों को किसी साज़िश के चश्मे से देखना आत्म-प्रवंचना होगी। ये चेतावनियाँ दरअसल उस आईने की तरह हैं, जिसमें पाकिस्तान को अपना वास्तविक चेहरा देखने का अवसर मिला है। दुर्भाग्य यह है कि कुछ संगठित गिरोहों और असफल नीतियों की कीमत अब पूरे राष्ट्र को चुकानी पड़ रही है। यदि वीज़ा दरवाज़े बंद होते हैं, तो उसका दुष्प्रभाव उन लाखों ईमानदार पाकिस्तानियों पर पड़ेगा, जिनका इन गतिविधियों से कोई लेना-देना नहीं है।

इस संकट से निकलने का मार्ग बाहर नहीं, भीतर है। जब तक राज्य स्वयं भीख की मानसिकता से मुक्त नहीं होगा, तब तक नागरिकों से आत्मसम्मान की अपेक्षा करना छल होगा। कटोरा केवल नागरिकों के हाथ से नहीं, सबसे पहले सत्ता के हाथ से गिराना होगा। आर्थिक आत्मनिर्भरता, जवाबदेह शासन और गरिमापूर्ण रोज़गार के बिना यह विडंबना और गहराती जाएगी—और इतिहास दर्ज करेगा कि जिस देश की सरकारें दुनिया से माँगती रहीं, उसी देश के नागरिक पूरी दुनिया में माँगते फिरते रहे।

चिकन नेक नहीं, वज्ररेखा: भारत की वह सीमा जिसे छूना भी दुस्साहस है

 आजकल बांग्लादेश की सड़कों पर भारत-विरोध के नारे गूंज रहे हैं। शरीफ उस्मान हादी की मृत्यु के बाद भड़की हिंसा ने एक बार फिर यह प्रश्न खड़ा कर दिया है कि क्या यह आक्रोश केवल भावनात्मक उबाल है, या इसके पीछे कोई सुनियोजित रणनीतिक दुष्प्रचार छिपा है? ढाका, चटगांव सहित अनेक शहरों में भारतीय दूतावासों और सहायक उच्चायोगों के बाहर जिस प्रकार पत्थरबाज़ी, आगजनी और धमकियों का प्रदर्शन हुआ—वह चिंता का विषय अवश्य है, किंतु उससे अधिक यह एक भ्रमपूर्ण आत्ममुग्धता का संकेत देता है।


प्रदर्शनकारियों के नारों में एक शब्द बार-बार उछला—सिलीगुड़ी कॉरिडोर, जिसे वे ‘चिकन नेक’ कहकर भारत की रणनीतिक कमजोरी बताने का प्रयास कर रहे हैं। यहाँ तक कि भारत के उत्तर-पूर्वी राज्यों को अलग-थलग करने और इस गलियारे को काट देने जैसी उन्मादी घोषणाएँ भी की गईं। परंतु प्रश्न यह है—क्या ये नारे जमीनी हकीकत से टकराने की क्षमता रखते हैं?

उत्तर स्पष्ट है—बिल्कुल नहीं।

सिलीगुड़ी कॉरिडोर: भूगोल नहीं, भारत की संकल्प-रेखा

भारत के मानचित्र पर पश्चिम बंगाल के उत्तरी छोर पर स्थित सिलीगुड़ी कॉरिडोर मात्र 20–22 किलोमीटर चौड़ा अवश्य है, पर इसका सामरिक महत्व अपार है। यही वह जीवनरेखा है, जो भारत की मुख्य भूमि को असम, अरुणाचल प्रदेश, नागालैंड, मणिपुर, मिज़ोरम, मेघालय, त्रिपुरा और सिक्किम से जोड़ती है। लगभग साढ़े चार करोड़ नागरिकों का जीवन, राष्ट्र की सैन्य आपूर्ति, आर्थिक संपर्क और प्रशासनिक एकता—सब इसी से होकर प्रवाहित होते हैं।

दक्षिण में बांग्लादेश, पश्चिम में नेपाल, उत्तर में भूटान और उससे आगे चीन की चुंबी घाटी—यह क्षेत्र भौगोलिक रूप से जितना संवेदनशील है, उतना ही रणनीतिक रूप से सुदृढ़ भी।

बांग्लादेश की सियासत और भारत-विरोध का उभार

2024 में शेख हसीना सरकार के पतन और मुहम्मद यूनुस के नेतृत्व में अंतरिम व्यवस्था के बाद बांग्लादेश की राजनीति अस्थिरता के दौर से गुजर रही है। इसी अस्थिरता में भारत-विरोध को एक सहज बलि का बकरा बनाया जा रहा है। हादी की मृत्यु के बाद भारत पर उंगलियाँ उठाना, जबकि हसीना भारत में शरण लिए हुए हैं—यह राजनीतिक अवसरवाद का परिचित खेल है।

चीन और पाकिस्तान के साथ बढ़ती निकटता के संकेत भी दिए जा रहे हैं, किंतु यह सब शब्दों की कूटनीति से अधिक कुछ नहीं।

भारत की तैयारी: ‘चिकन नेक’ से ‘आयरन फोर्ट्रेस’ तक

भारत ने सिलीगुड़ी कॉरिडोर को कभी कमजोरी मानकर नहीं छोड़ा। पिछले एक दशक में इसे अभेद्य सैन्य दुर्ग में परिवर्तित कर दिया गया है।

  • नए सैन्य ठिकाने:
    असम के धुबरी में लाचित बोरफुकन मिलिट्री स्टेशन, बिहार के किशनगंज और पश्चिम बंगाल के चोपड़ा में नए गैरिसन—तेज़ तैनाती और चौकसी के लिए।
  • आधुनिक सैन्य शक्ति:
    हाशिमारा एयरबेस पर तैनात राफेल लड़ाकू विमान, ब्रह्मोस सुपरसोनिक मिसाइल रेजिमेंट, S-400 वायु रक्षा प्रणाली—यह केवल हथियार नहीं, बल्कि स्पष्ट संदेश हैं।
  • बहुस्तरीय सुरक्षा संरचना:
    ट्रिशक्ति कोर, ब्रह्मास्त्र कोर, मैकेनाइज्ड इन्फैंट्री, पैरा स्पेशल फोर्सेज और उन्नत एयर डिफेंस—पूर्वी कमान की संपूर्ण शक्ति यहाँ एकत्र की जा सकती है।

सेना के वरिष्ठ अधिकारियों के शब्दों में—
“आज सिलीगुड़ी भारत की सबसे सशक्त रक्षा पंक्ति है, जहाँ आक्रमण नहीं, केवल घेराबंदी संभव है—और वह भी हमलावर की।”

वैकल्पिक संपर्क और भूटान की भूमिका

भारत ने एक और महत्वपूर्ण कदम उठाया है—निर्भरता का विकेंद्रीकरण। नए रेल-रोड नेटवर्क, म्यांमार के माध्यम से समुद्री मार्ग, नेपाल और बांग्लादेश के रास्ते वैकल्पिक कनेक्टिविटी—सब पर कार्य प्रगति पर है।

इसके साथ ही भूटान जैसा भरोसेमंद मित्र भारत के साथ खड़ा है। डोकलाम संकट ने यह स्पष्ट कर दिया कि भूटानी भूमि का भारत-विरोधी उपयोग केवल कल्पना है।

खुफिया तंत्र और सीमा सुरक्षा

RAW, IB, सैन्य खुफिया एजेंसियाँ, उपग्रह निगरानी, AI-आधारित सर्विलांस, स्मार्ट फेंसिंग, थर्मल कैमरे—BSF, SSB और ITBP की संयुक्त तैनाती के साथ किसी भी असामान्य गतिविधि पर रीयल-टाइम प्रतिक्रिया संभव है।

चीन-पाकिस्तान-बांग्लादेश: संयुक्त खतरा या संयुक्त भ्रम?

यह तर्क बार-बार उछाला जाता है कि यदि चीन और पाकिस्तान मिलकर दबाव बनाएं तो भारत कठिनाई में पड़ सकता है। किंतु तथ्य इसके विपरीत हैं—

  • पाकिस्तान भौगोलिक रूप से अप्रासंगिक दूरी पर है।
  • चीन के लिए भारत-भूटान-नेपाल के जटिल भूगोल के बीच सीधी सैन्य कार्रवाई लगभग असंभव है।
  • डोकलाम के बाद चीन भलीभांति समझ चुका है कि भारत न तो रणनीतिक रूप से, न कूटनीतिक रूप से पीछे हटता है।

निष्कर्ष: भ्रम टूटेगा, भारत अडिग रहेगा

आज सिलीगुड़ी कॉरिडोर कोई संकरी भूमि नहीं, बल्कि सैन्य शक्ति, कूटनीति, आधारभूत संरचना और तकनीक का संगम है। जो इसे काटने की धमकी दे रहे हैं, उन्हें पहले यह समझना होगा कि उनके अपने देश में इससे कहीं अधिक नाज़ुक ‘चिकन नेक’ मौजूद हैं।

2017 के डोकलाम से लेकर आज तक भारत ने बार-बार यह सिद्ध किया है कि यह क्षेत्र कमजोरी नहीं, रणनीतिक आत्मविश्वास का प्रतीक है।

भारत का संदेश स्पष्ट है—
धमकियाँ शोर हैं, तैयारी सत्य है।
और सिलीगुड़ी—अब केवल गलियारा नहीं, राष्ट्र की दृढ़ इच्छाशक्ति है।

जय माँ भारती!

Thursday, 11 December 2025

नैतिकता का दंड या कुंठित समाज का खेल?

आज समाज की दशा यह है कि दूसरों की खुशी हमें चुभने लगी है और दूसरों के दुःख में हमें आनंद प्राप्त होता है। सोचिए—एक पड़ोसी अपने घर में उत्सव मना रहा है, कोई मित्र अपनी सफलता का जश्न मना रहा है, और हम अपने भीतर की अधूरी इच्छाओं, असंतोष और कड़वाहट को उनकी मुस्कान पर उंडेल रहे हैं। कभी कहा जाता था कि शत्रु भी पर्व-त्योहार पर विराम ले लेता है, पर आज हमारी मानसिकता ऐसी हो गई है कि दूसरों की प्रसन्नता ही हमें खटकने लगी है। इसी बेरहम मानसिकता की भेंट चढ़ी है इंद्रेश उपाध्याय जी की शादी—जिस दिन उनके जीवन का सबसे सुंदर क्षण होना चाहिए था, उस दिन हमने समाज के रूप में अपनी ही खोखली मानसिकता का प्रदर्शन कर दिया।


पिछले चंद दिनों में जिस तरह से उनकी ट्रोलिंग और आलोचना हुई, वह केवल उनके व्यक्तित्व का नहीं, हमारी आत्मा का एक्सपोज़र है। हमने यह दिखा दिया कि हम दूसरों के सुख में असहिष्णु और दूसरों के दुःख में प्रफुल्लित होना सीख चुके हैं। स्मृति मंधाना की शादी टूटी तो उनके पुराने वीडियो वायरल किए गए; अब वही मानसिकता इंद्रेश जी के साथ लागू हो रही है। जिस दिन उन्हें आशीर्वाद और दुआओं की जरूरत थी, उस दिन हमने अपने भीतर की जलन और कड़वाहट का परिचय दिया।

इंद्रेश उपाध्याय कौन हैं? कोई फिल्मी सितारा, अरबपति, उद्योगपति या राजनेता नहीं। वे एक सौम्य, विनम्र गृहस्थ-कथावाचक हैं। उनके पिताजी ने जीवन भर कथा कही और वही संस्कार उनके भीतर पले-बढ़े। पर समाज ने उनके विवाह को तमाशा बना दिया—हेलीकॉप्टर उतरा, सजावट महंगी, होटल भव्य!—यह प्रश्न नहीं है। समस्या यह है कि धर्म से जुड़े व्यक्ति का सुख और सम्मान हमारी आँखों में खटकता है।

इस देश के खिलाड़ी दो-दो, तीन-तीन विवाह कर लेते हैं, करोड़ों खर्च कर देते हैं, खुलेआम अनैतिक जीवनशैली अपनाते हैं—और हम उन्हें आदर्श मानते हैं। बॉलीवुड सितारे फूहड़ता, नशा, ड्रग्स, बहुविवाह और खुले संबंध अपनाते हैं—फिर भी हमारे आइडल बन जाते हैं। पर कथावाचक यदि सामान्य गृहस्थ जीवन में खुशी ले, अच्छे कपड़े पहनें, परिवार के साथ जीवन जिए, तो वही समाज नैतिकता का डंडा उठा देता है।

सबसे विषैले हमले उनके निजी जीवन, उनकी पत्नी के अतीत और परिवार पर किए गए। किसी स्त्री के संघर्ष, उसके दुःख, उसके निर्णय—यह सब हमने कंटेंट बनाकर वायरल किया। क्या हमें इस बात का ज्ञान है कि वास्तविकता क्या है? नहीं। फिर भी हम न्यायाधीश बन बैठे हैं।

पुरानी कथाएँ, पुराने ऑडियो, पुराने बयान—इन सबको काट-छाँट कर प्रस्तुत कर दिया गया। क्या हम यह सोचते हैं कि कोई भी मानव अपने जीवन में अपरिपक्व क्षण नहीं बिताता? विचार समय के साथ बदलते हैं, पर समाज ने तय कर दिया कि उनके दो पुराने वाक्यों से पूरी जिंदगी की छवि तय होगी। यही समाज की नैतिक गिरावट है।

कथावाचक समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचते हैं। वे अपने यजमान से कमाते हैं, हम नहीं देते। कोई अपनी धनराशि से यात्रा करता है, दान करता है, कथा करवाता है—यह उसका अधिकार है। परंतु कथावाचक पर सवाल उठाना, उनके निजी जीवन पर तीर चलाना, उनकी पत्नी और परिवार पर निशाना साधना—यह समाज की नैतिकता नहीं, केवल भीतर की खोखली कुंठा है।

धर्म मंच से नहीं मरता। धर्म तब मरता है जब किसी की खुशी देखकर हमारे भीतर शांति नहीं बचती। आज हमने इंद्रेश जी के सबसे पवित्र दिन को अपवित्र बनाने का प्रयास किया। कल यही भीड़ किसी और घर पर हमला करेगी। और जिस दिन यह लक्ष्य हमारा परिवार होगा, यह भीड़ हमारे साथ नहीं होगी।

इंद्रेश उपाध्याय कोई सन्यासी नहीं, बल्कि सामान्य गृहस्थ कथावाचक हैं। उन्हें उतना ही सुख, सम्मान और गरिमा का अधिकार है जितना हमें। यदि उनकी खुशी हमें चुभती है, समस्या उनके सुख में नहीं—हमारी सोच में है।

अपनी सोच बदलिए। अपनी कुंठा त्यागिए। और दूसरों को जीने दीजिए। यही समाज का सबसे बड़ा धर्म है।

इंद्रेश जी और उनकी पत्नी को हमारी ओर से हार्दिक शुभकामनाएँ। सुखी रहें, प्रसन्न रहें और समाज भी कम से कम इतना तो समझे कि किसी की खुशी अपराध नहीं होती।

जय माँ भारती


Sunday, 7 December 2025

सपनों का आसमान बिक गया, फर्श पर रह गया इंसान

 कभी कहा गया था कि “हवाई चप्पल पहनने वाला भी हवाई जहाज़ में दिखना चाहिए।” यह वाक्य केवल चुनावी नारा नहीं था, यह आम आदमी के हक का, उसकी आकांक्षा का और देश के उजले आसमान का प्रतीक था। लेकिन आज वही आसमान एक निजी एयरलाइन की मनमानी का शिकार बन गया है। एयरपोर्ट पर लोग भूखे, थके, और असहाय फर्श पर पड़े हैं। गर्भवती महिलाएं दर्द से तड़प रही हैं। कोई पिता अपनी बेटी के लिए लहूलुहान होकर मदद मांग रहा है। कोई पति अपनी पत्नी का ताबूत लेकर हरिद्वार में अंतिम संस्कार तक नहीं पहुँच पा रहा। कोई अपनी शादी के रिसेप्शन से छूट गया है। यह दृश्य किसी तकनीकी खराबी का नहीं, किसी प्राकृतिक आपदा का नहीं—यह इंडिगो के अहंकार और सुनियोजित ब्लैकमेल का प्रत्यक्ष प्रमाण है।


इंडिगो, जिसके पास भारत के घरेलू हवाई बाजार का लगभग 65–68 प्रतिशत हिस्सा है, 3 दिसंबर से 7 दिसंबर तक देशभर में उड़ानों को रद्द कर जनता को बंधक बना रहा। पांच दिनों में हजारों फ्लाइट रद्द हुईं, लाखों यात्री फंसे, अरबों रुपये का नुकसान हुआ, और सबसे बड़ा नुकसान हुआ—सामान्य नागरिकों के सपनों और भरोसे का। स्क्रीन पर बार-बार चमकता “कैंसिल्ड” शब्द किसी यात्री की आँखों में भरी पीड़ा की व्याख्या कर रहा था। मुंबई, दिल्ली, बेंगलुरु, अहमदाबाद से लेकर छोटे शहर गुवाहाटी, भुवनेश्वर, रांची तक—हर जगह यही दृश्य। जो टिकट 3,000 रुपये की थी, वह 4–5 हज़ार तक पहुंच गई। लोग ट्रेन की जनरल बोगियों का सहारा लेने को मजबूर हुए। जो फंस गए, वे फर्श पर पड़े, भूखे-प्यासे और थके हुए।

यह घटना सिर्फ मुनाफाखोरी नहीं थी। यह एक सुनियोजित ब्लैकमेलिंग रणनीति थी। नागरिक उड्डयन महानिदेशालय(Directorate General of Civil Aviation)ने जुलाई 2025 में पायलटों की सुरक्षा के लिए नए नियम लागू किए। हर पायलट को पर्याप्त आराम, सीमित रात की ड्यूटी और सप्ताह में 48 घंटे की छुट्टी का अधिकार मिला। एयर इंडिया, अकासा, विस्तारा और स्पाइसजेट ने नियमों का पालन करते हुए पायलटों की भर्ती बढ़ाई। केवल इंडिगो ने विरोध किया। उसके पास प्रति विमान केवल 13 पायलट थे, जबकि अन्य एयरलाइंस में यह संख्या 19–26 थी। नियम लागू होते ही अधिक पायलट रखने पड़ते और मुनाफा घटता। इसका हल खोजने के बजाय उसने देश और यात्रियों को बंधक बनाना चुना।

सरकार को मजबूर होना पड़ा कि वह नियम स्थगित करे। यात्रियों की सुरक्षा, पायलटों की नींद, अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा मानक—सबके लिए आड़े हाथ आए। यह केवल इंडिगो की जीत नहीं थी; यह भारतीय व्यवस्था की हार थी। यह दिखाता है कि जब मुनाफा इंसान की जान से बड़ा हो जाता है, तो जनता की पीड़ा तुच्छ हो जाती है। एयरपोर्ट पर लेटे लोग केवल यात्री नहीं, वे उस व्यवस्था का आईना हैं जिसने अपने नागरिक को असहाय छोड़ दिया।

सबसे दुखद यह था कि क्रोध और निराशा निर्दोष ग्राउंड स्टाफ पर उतरी, जबकि असली दोषी एयरकंडीशंड दफ्तरों में बैठे बयान दे रहे थे। गर्भवती महिलाएं, कैंसर मरीज, अंतिम संस्कार से वंचित लोग, शादी और यात्रा से छूटे युवकों—इनकी कीमत केवल “हम खेद व्यक्त करते हैं” जैसी औपचारिकताओं में समेट दी गई।

यह घटना केवल इंडिगो की समस्या नहीं है। यह पूरे भारतीय तंत्र की कमजोरी का सबक है। क्या एक निजी कंपनी इतनी ताकतवर हो सकती है कि वह पूरे देश को ब्लैकमेल कर दे और नियम बदलवा ले? क्या भारतीय नागरिक और उसकी सुरक्षा केवल आर्थिक आंकड़ों के लिए बलिदान हो सकते हैं? जब हवाई चप्पल पहनने वाले का सपना फर्श पर टूटता है और हवाई जहाज़ केवल अमीरों का प्रतीक बन जाता है, तब स्पष्ट होता है कि देश की नीतियाँ कमजोर हैं और कंपनियाँ अत्यधिक ताकतवर।

आज यह संदेश साफ है—राष्ट्र तब तक सशक्त नहीं होगा जब तक न्याय, करुणा और जवाबदेही सत्ता और बाज़ार के बीच संतुलित न हों। यात्रियों की थकान, उनकी पीड़ा, उनके अधूरे संस्कार और बिखरे हुए सपनों को केवल “माफी” कहकर छिपाया नहीं जा सकता। यह भारत का शर्मनाक क्षण है। यदि अब सुधार नहीं हुआ, तो यह केवल इंडिगो की जीत नहीं, बल्कि एक पूरे भारत की हार होगी।

फर्श पर बिखरे इंसान, थकान और आंसू में लिपटे,
सपनों का आसमान अब सिर्फ मुनाफ़े का खेल बन गया।
जहाँ करुणा की कीमत नहीं, वहां न्याय भी रुक जाता है,
और रोष का गीत सिर्फ खामोशी में गूँजता रह जाता है।