Sunday, 2 August 2009

आजादी

8 साढ़े 8 का समय है। मां चूल्हे बैठी पत्थर उबाल रही है। जिससे बच्चे फरेब खाकर सो जाएं। मेरी मां का नाम करुणा है मालूम नहीं मेरे नानाजी ने क्या सोचकर यह नाम रखा था। मणीमाला मेरी छोटी बहन है। वह बापू के साथ बैठकर आजादी की कहानी सुन रही है। कैसे हमारे दादा-परदादा ने देश को आजाद कराया था। मेरे तीन छोटे भाई हैं। एक नाम शेखर है उसकी उम्र 10 साल है, दूसरा भाई अब्दुल है वह सात साल का है, तीसरे की उम्र दो साल है उसका नाम सुखदेव है। उसे हम प्यार से सुख पुकारते हैं। अरे यह तीनों आजादी के महारथी फरेब खाकर सो गए। मां ने देखा तो अश्रुओं की धार बह गयी। मां ने चूल्हे में पानी डालकर चूल्हा बुझा दिया। सब वहीं सो गए।
सुबह
आंख खुली तो देखा मणिमाला आंगन में गोबर का लेप लगा रही थी। तीन महारथी सो ही रहे थे। दद्दू पूजा कर रहे थे, वह सुभाषचंद्र बोस की ही पूजा करते हैं। मां कुएं से पानी भरने गई है। बापू मजदूरी करने जारहे थे की अचानक आवाज आई शिवा बाहर आ। यह आवाज हमारे गांव के पुलिस चौकी के हवलदार गोवर्धन की थी। पहले हमारे मकान के पास ही रहता था। मकान क्या हमारी तरह कच्चा झोपड़ा ही था, लेकिन जब से हवलदार बना तो पैसे की जैसे वर्षा होने लगी है। एक बुलेट भी ले ली है, कहता है अगर शहर में होता तो आमदनी के स्रोत होते इन भूखे नंगे से क्या लूं। जो सरकार भेजती है उससे ही गुजारा करना पड़ता है।
बापू
और दद्दू बाहर गए और कहा जी हुजूर
हवलदार- हुजूर के बच्चे, आज थाने आ जाना वरना साहब इतना मारेंगे कि सात पुश्तें याद रखेंगी। बेवकूफ कहीं का- गधे का बच्चा अच्छा एक रुपया दे
नहीं
है साहब।
हवलदार- भिखारी कहीं का, कभी पैसे नहीं होते और फिर गुनगुनाता हुआ चला गया।
बापू
और दद्दू पुलिस चौकी गए वहां से लौटे तो माथे से खून बह रहा था- मैंने पूछा क्या हुआ- तो बापू ने कहा कुछ नहीं साहब ने कहा है कि आज टी.वी. वाले सवाल जवाब करने गांव आ रहे हैं- पूछें कि नेताजी आए थे तो कहना हां। और हमारे दुख दर्द पूछे। नेताजी बहुत अच्छे हैं, कुछ भी सवाल करें तो हां में ही कहना। गलती से भी ना न निकले। और नेताजी की तारीफ करना।
दद्दू
कहां हैं, उन्हें और 10-15 जनों को चोरी के इल्जाम में हवालात में बंद कर दिया। कहीं जोश में आकर उल्टा - सीधा न बोल दें। फिर दोपहर में टी.वी. वाले आए और आसपास के लोगों से सवाल करने लगे- कुछ देर बाद हमसे सवाल करने भी आए। हमारी मां से पूछा आपका नाम क्या है?
मां ने कहा करुणा।
क्या
नेताजी यहां आए थे?
जी
हां साहब, वही हम गरीबों के सहारा हैं।
नेताजी ने अपने भाषण में कहा था कि भारत के 62 साल आजादी के पूरे होने पर हमने बहुत विकास किया है हर गांव में खाना पहुंच गया है। हमने गांव के लिए 50 करोड़ रुपए दिए हैं। तो क्या आपको दोनों समय भर पेट खाना मिलता है?
जी
हां साहब। यह सुनते ही मेरा छोटा भाई बोला आप हर दिन भर पेट खाना खाती हैं- हमें तो नहीं देती। मैंने भाई के मुंह पर हाथ रख दिया। बच्चा है हुजूर।
अच्छा
-अच्छा आपको पता है, अब आपको आजाद हुए 62 साल हो गए हैं। अब आप स्वतंत्र हैं। आपको किसी से खौफ खाने की जरूरत नहीं है।
जी
हैं साहब
न
जाने टीवी वालों ने क्या दिखा दिया कि रात में पुलिस चौकी से हवलदार आए और मां बापू को ले गए- सुबह होने पर मां की लाश कुएं में मिली और बापू की खेत में। टीवी वाले साहब ने ठीक कहा था अब हमें किसी से डरने की जरूरत नहीं है। हम आजाद हैं शायद इसीलिए ही मेरे मां- बापू को 62साल की आजादी पर हर दिन की कैद से आजाद कर दिया है। हम सब खुश हैं कि आजाद देश में गुलामों को भी आजाद कर दिया जाता है।

Sunday, 12 July 2009

पता


आज उसने मेरा पता पूछ लिया।
मैं हक्का बक्का रह गया, कि उसे क्या बताऊं,
क्या
समझाऊं इस लापता का तो कोई पता ही नहीं है
वह अचरज में आया और फिर पूछा भाई साहब अपने घर का पता बता दीजिए।
मैंने
रौंद आंखों से, भरे गले से कहा घर तो मेरा हिन्दुस्तान में है।
यहां तो सिर्फ मकान है, और कुछ नहीं।
यहां की दीवारें भी मुझे नहीं पहचानती हैं।
मकान के प़ेड पर चिड़िया भी नहीं चहकती है।
पता
तो मेरा हिंद में है, जहां पर चिट्ठी आने पर कोयल कूकती है
जहा
खिड़की भी मेरी चिट्ठी का इंतजार करती है।

Sunday, 24 May 2009

कर्म करो........

आज मेरी पत्रिका के मालिक ने मुझे बुलाया और कहा लेबर डे पर कुछ लिखो यह विषय मेरे लिए बिल्कुल नया था। वास्तविकता तो यह थी कि मैंने इस विषय में कभी कुछ लिखा ही नहीं था और न कभी पढ़ा। हां बजट के वक्त मजदूर विरोधी सरकार पर या इलेक्शन के समय पार्टी मजदूरों का भला करेगी, इसके अलावा कुछ लिखा ही नहीं था. परंतु मालिक ने कहा तो लिखना तो था ही अन्यथा मुझे बिना नोटिस दिए बाहर फेंक देते।
इसिलए
मैंने मजदूर पर रिसर्च करनी शुरू कर दी। कई लाईब्रेरियों को छान डाला उसके बाद चंद किताबें मिली जिनकी मदद से कुछ लिखा जा सकता था। सबसे मजेदार यह बात सामने आई की एक किताब में लिखा था की 1884 में मजदूरों के नेता लोखंडे ने ब्रिटिश सरकार के सामने चंद मांगें रखी थीं। जो इस प्रकार थी- ़
1)
हर शनिवार को मजदूरों को छुट्टी दी जाए।
2)
काम के दौरान आधे घंटे खाने की छुट्टी
3)
काम की शुरुआत सुबह ़.30 बजे व सूरज ढलने पर काम की समाप्ती ।
4)
मजदूरों का वेतन हर 15 तारीख तक मिल जानी चाहिए।
5)
अगर कोई मजदूर काम करते वक्त घायल हो जाता है, जिससे वह अपने काम पर हाजिर नहीं हो पाता है तो उसके ठीक होने तक तनख्वाह मिलती रहनी चाहिए।
वह
मांगे हमारी मांगों से काफी मिलती जुलती थीं। इसिलए मैंने विचार किया 1984 से 2009 तक में कोई परिवर्तन हुआ है या स्थिती और करुणामय हो गई है। वीचार करके मैं घबरा गया तथा स्वयं को भी मजदूर की श्रेणी में खड़ा पाया।
मैं
एक फैक्टरी में भी गया, जहां मैंने देखा एक मजदूर का हाथ मशीन में आने से कट गया। वह दर्द से तड़पते-तड़पते बेहोश हो गया। मगर कोई उसकी ओर आना तो दूर की बात किसी ने देखा भी नहीं। यह दृश्य देखकर मुझे गुस्सा आया। मैं उस मजदूर को उठाकर अस्पताल ले गया। दो तीन बाद जब उसकी स्थिती सामान्य हुई तो मैंने उससे कहा राम खिलावन तुम्हारे साथी कैसे हैं, मेरा वाक्य खत्म भी नहीं हुआ की उसने मुझे टोकते हुए कहा - नहीं साहब मेरे साथियों को कुछ न कहिए। यदी कोई भी काम छोड़कर आता तो उनके आधे दिन की पगार काट ली जाती। उनका भी तो परिवार है। उनके घर में तो चूल्हे जलते हैं। यह उत्तर सुनते ही मैं स्तब्ध रह गया। और मैंने पाया की वास्तविकता में हम ओल्ड फैशन ही हैं। तभी तो 1884 की मांगों को दोहराते हैं और शून्य ही पाते हैं।
राम खिलावन की नौकरी चली पर वह बेहद खुश है। क्योंकि उसके 10 साल के लड़के को उसी जगह उसी मशीन पर रख लिया। और वह फैक्ट्री के बाहर भीख मांगता है। सबसे कहता है कर्म करो, फल की चिंता न करो। दूसरी तरफ मुझे लेख लिखने में इतनी देर होने के प चात भी मेरी नौकरी बच गई पर महीने की 1 छुट्टी से मैं हाथ धो बैठा। हम सब खुश हैं, क्योंकि हमें बचपन से सिखाया जाता है तुम्हें सिर्फ कर्म करना है, फल तुम्हारे मालिक के लिए है। इसलिए कम करो, कर्म करो, कर्म करो.........।