Friday, 20 February 2026

अफ़ग़ान महिलाओं की मौन त्रासदी: अब हिंसा भी कानूनी

 अफ़ग़ानिस्तान, 2026 — सुनिए और समझिए, यह इतिहास नहीं, यह वर्तमान का जघन्य सच है! एक ऐसा कानून, जिसमें पति को अपनी पत्नी को मारने की अनुमति है। हाँ, आपने सही पढ़ा! चोट न लगे, हड्डी न टूटे — तब घरेलू हिंसा अपराध नहीं। घर की चारदीवारी, जो कभी सुरक्षा का प्रतीक थीं, अब डर, दासता और अंधकार की गुफाएँ बन चुकी हैं।

तालिबान के सर्वोच्च नेता हयातुल्लाह आकुन जादा ने इसे औपचारिक रूप दे दिया। महिलाओं का दर्जा अब गुलामों के बराबर है। पति को “मालिक” कहा गया और उसके हाथों की छड़ी कानूनी अनुमति के साथ चल सकती है। दर्द, आघात, डर — अब इनकी कोई कीमत नहीं।

कानून कहता है: अगर चोट गंभीर न हो, घाव न बने, तो मारना अपराध नहीं। न्याय का दर्पण टूटा हुआ है, और उसका एक टुकड़ा भी महिलाओं के लिए नहीं बचा। अगर महिला न्याय चाहती है, तो उसे अदालत में पूरी तरह ढकी हुई और पुरुष संरक्षक के साथ उपस्थित होना होगा। वही संरक्षक अगर उसका अत्याचारी पति हो — तो अदालत जाने का मतलब ही सजा भुगतने के लिए उसी के सामने जाना है।

अगर महिला बिना पति की अनुमति अपने माता-पिता के घर जाए, तो केवल वह नहीं, उसके परिवार को भी जेल का रास्ता तय है। यानी पीड़िता ही अपराधी है, और अपराधी को संरक्षण मिलता है।

2021 में तालिबान के सत्ता में आने के बाद से महिलाओं की दुनिया सिकुड़ती गई। पहले स्कूल, फिर नौकरी, फिर सार्वजनिक स्थल, फिर सैलून और जिम — अब घर की चारदीवारी भी सुरक्षित नहीं। लड़कियों को माध्यमिक स्कूलों से रोका गया, महिलाओं को नौकरियों से बाहर किया गया। सार्वजनिक जीवन, स्वतंत्र आवाज़, सुरक्षा — सब कुछ मिटाया जा रहा है। खिड़कियां, जो कभी जीवन की हलचल दिखाती थीं, अब ढकी जाएँ, ब्लॉक किए जाएँ — क्योंकि तालिबान कहता है कि महिलाओं को देखना “अनैतिक” है।

यह केवल दमन नहीं, यह सिस्टमेटिक नरसंहार है। आधी आबादी के अस्तित्व पर हमला। अफ़ग़ानिस्तान आज दुनिया का सबसे प्रतिबंधित देश बन गया है, जहां महिलाओं की हर सांस पर कानून का जंजीर लटकती है।

और दुनिया? वह मौन है। तालिबान प्रतिनिधियों को बुलाया जा रहा है, व्यापारिक समझौते किए जा रहे हैं, प्रतिबंध हटाने की तैयारी है। 14 मिलियन महिलाएँ सार्वजनिक जीवन से मिटाई जा रही हैं। उनके सम्मान और सुरक्षा को रौंदा जा रहा है।

यह केवल अफ़ग़ानिस्तान का कलंक नहीं है। यह पूरी मानवता का काला दाग़ है। जब कानून दुर्व्यवहार को बढ़ावा देता है और विश्व इसे सामान्य मानता है, तो मौन भी अपराध है।

अब सवाल उठता है — कब तक हम चुप रहेंगे? कब तक गुस्सा दबाए रहेंगे? कब तक महिलाओं की पीड़ा पर आंखें मूँदेंगे? अफ़ग़ान महिलाओं की चुप्पी हमें शर्मिंदा कर रही है, और दुनिया केवल देख रही है, लेकिन कोई आवाज़ नहीं उठा रहा।

यह सिर्फ़ अफ़ग़ानिस्तान की शर्म नहीं है — यह विश्व की अंतरात्मा पर निशान है। जब अत्याचार कानूनी बन जाए और दुनिया इसे सामान्य समझे, तो सन्नाटा भी अपराध बन जाता है।

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