मनुष्य ने बार-बार यह बताया कि वह ईश्वर की सर्वश्रेष्ठ कृति है।
यह कोई दैवी घोषणा नहीं थी—यह आत्मघोषणा थी। और हर आत्मघोषणा की तरह यह भी धीरे-धीरे एक खतरनाक भ्रम में बदल गई। क्योंकि जो प्राणी अपनी श्रेष्ठता स्वयं प्रमाणित करता फिरे, वह भीतर से पहले ही खोखला हो चुका होता है।
हैदराबाद के काचीगुडा क्षेत्र में पकड़ा गया आयात-निर्यात प्रतिष्ठान इस भ्रम को पूरी निष्ठुरता से उघाड़ देता है। वहाँ लगभग एक हजार लीटर बकरियों और भेड़ों का खून इंसानों के लिए बनाए गए ब्लड बैग में पैक कर रखा गया था।
आधुनिक मशीनें थीं—ऑटोक्लेव, लैमिनार एयर-फ्लो यूनिट, प्रयोगशाला जैसी संरचना। सब कुछ वैज्ञानिक था, सटीक था। अनुपस्थित थी तो केवल मनुष्यता।
ड्रग कंट्रोल अधिकारियों के अनुसार इस खून का इस्तेमाल गैरकानूनी क्लिनिकल ट्रायल, प्रयोग या लैब-कल्चर में किया जा सकता था। यह अपराध इसलिए भयावह नहीं कि कानून टूटा, बल्कि इसलिए कि यह अपराध शिक्षित हाथों से किया गया। यह जंगली हिंसा नहीं थी—यह योजनाबद्ध, लाभ-केंद्रित और ठंडी क्रूरता थी।
पशु जब मारता है, तो वह भूख या भय से मारता है।
मनुष्य तब मारने की तैयारी करता है, जब उसे मुनाफा दिखता है।
यही उसे पशु से अधिक खतरनाक बनाता है।
उसी समय मध्य प्रदेश से आई खबर यह स्पष्ट करती है कि यह अमानवीयता किसी प्रयोगशाला तक सीमित नहीं है। राज्य में तीस लाख फर्जी राशन कार्ड रद्द किए गए। इनमें वे लोग भी शामिल थे जो निजी कंपनियों में डायरेक्टर थे, जिनकी वार्षिक आय छह लाख रुपये से अधिक थी और जो नियमित रूप से आयकर रिटर्न भरते थे।
ये लोग भूखे नहीं थे।
फिर भी इन्होंने भूखे का अन्न लिया।
यह केवल धोखाधड़ी नहीं थी—यह नैतिक दस्युता थी।
यह अपराध इसलिए बड़ा है क्योंकि इसे मजबूरी ने नहीं, लालच ने जन्म दिया।
एक तरफ मनुष्य प्रयोगशालाओं में खून को व्यापार बना रहा है।
दूसरी तरफ वही मनुष्य राशन की कतारों में गरीब को पीछे धकेल रहा है।
तरीके अलग हैं, स्थान अलग हैं—पर आत्मा एक ही है: संवेदनहीन, आत्मकेंद्रित और निर्लज्ज।
आज का मनुष्य कानून तोड़ने से नहीं डरता, क्योंकि उसने पहले नैतिकता को तोड़ दिया है। उसके पास ज्ञान है, तकनीक है, सत्ता तक पहुँच है—लेकिन आत्मसंयम नहीं है। यही कारण है कि वह अब किसी भी हिंसक पशु से अधिक खतरनाक होता जा रहा है।
पशु से करुणा की अपेक्षा नहीं की जाती।
मनुष्य से की जाती है—और वही अपेक्षा वह बार-बार तोड़ता है।
तो अब प्रश्नों से बचना कायरता होगी—
क्या मनुष्य सचमुच ईश्वर की सर्वश्रेष्ठ कृति है, या वह अपनी ही सभ्यता का सबसे बड़ा अपराधी बन चुका है?
क्या विज्ञान नैतिकता के बिना भी वैध है?
क्या संपन्नता अब गरीब का हक छीनने का अधिकार बन चुकी है?
और सबसे असहज प्रश्न—
यदि यही मनुष्य का ‘विकास’ है, तो फिर पतन किसे कहेंगे?
शायद अब यह कहना बंद करने का समय आ गया है कि मनुष्य स्वभाव से श्रेष्ठ होता है।
श्रेष्ठता घोषणा से नहीं, आचरण से सिद्ध होती है—और आज की खबरें बता रही हैं कि मनुष्य इस परीक्षा में लगातार असफल हो रहा है।


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