Friday, 2 January 2026

मासूमों की मौत और सत्ता का अहंकार: जब ‘घंटा’ बन गया जवाब


 लोकतंत्र की आत्मा प्रश्न से जीवित रहती है।

और जब सत्ता उसी प्रश्न को ‘फोकट’ कहकर अपमानित करने लगे, तो लोकतंत्र के क्षरण की शुरुआत हो जाती है।

मध्यप्रदेश सरकार के वरिष्ठ मंत्री कैलाश विजयवर्गीय द्वारा कहा गया—
“फोकट प्रश्न मत पूछिए… क्या-क्या घंटा हो गया”—
केवल एक असंयमित वक्तव्य नहीं है। यह उस सत्तागत अहंकार का प्रकटीकरण है, जो जनता के दुःख और प्रश्नों को महत्वहीन समझने लगता है।

जब इंदौर के भागीरथपुरा क्षेत्र में गंदा पानी पीने से मासूम बच्चों और बुजुर्गों की मृत्यु की खबरें सामने आईं, तब इस त्रासदी पर उठे सवालों को कैलाश विजयवर्गीय द्वारा ‘घंटा’ कहकर टाल देना केवल संवेदनहीनता नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक उत्तरदायित्व से पलायन है।

‘घंटा’ : सत्ता की भाषा, सत्ता की सोच

यह ‘घंटा’ किसी सामान्य बातचीत का शब्द नहीं था।
कैलाश विजयवर्गीय के वक्तव्य में यह उस मानसिकता का संकेतक बन गया, जिसमें—

  • जनता का प्रश्न असुविधा है
  • पीड़ित की पीड़ा बोझ है
  • और जवाबदेही सत्ता की प्राथमिकता नहीं

लोकतंत्र में यह सोच अत्यंत घातक होती है, क्योंकि यहां प्रश्न सत्ता का अपमान नहीं, उसकी परीक्षा होता है।

संवेदनहीनता का पूर्व इतिहास

यह पहला अवसर नहीं है जब कैलाश विजयवर्गीय के वक्तव्यों ने पीड़ितों के प्रति उपेक्षा का भाव प्रकट किया हो।
महिला खिलाड़ियों से जुड़े प्रकरण हों या चुनावोत्तर हिंसा के प्रसंग—हर बार जिम्मेदारी स्वीकार करने के स्थान पर वक्तव्य का केंद्र पीड़ित ही बना।

यह क्रम बताता है कि यह केवल शब्दों की चूक नहीं, बल्कि राजनीतिक आचरण की समस्या है।

इंदौर: स्वच्छता के दावों के नीचे छुपी सड़ांध

इंदौर, जिसे देश का सबसे स्वच्छ शहर कहा जाता है, उसी शहर में पेयजल लाइन में सीवेज का गंदा पानी मिलना प्रशासनिक विफलता का गंभीर उदाहरण है।
भागीरथपुरा में हुई मौतें केवल हादसा नहीं, बल्कि व्यवस्था की सामूहिक असफलता हैं।

और जब ऐसी असफलता पर सवाल उठाने वालों को कैलाश विजयवर्गीय जैसे जिम्मेदार मंत्री ‘फोकट’ कहें, तो यह सत्ता की संवेदनशीलता पर गहरा प्रश्नचिह्न लगाता है।

पीआर बनाम पश्चाताप

घटना के बाद अस्पतालों के दौरे, मुआवजे की घोषणाएं और अधिकारियों का निलंबन—
ये सब तब तक खोखले प्रतीत होते हैं, जब तक सत्ता अपने लहजे और दृष्टिकोण पर आत्ममंथन न करे।

क्योंकि समस्या केवल पाइपलाइन की नहीं, उस सोच की है जिसे कैलाश विजयवर्गीय जैसे मंत्री सार्वजनिक रूप से व्यक्त कर रहे हैं।

लोकतंत्र की चेतावनी

दूषित जल शरीर को नष्ट करता है,
परंतु दूषित भाषा लोकतंत्र की आत्मा को।

जब कैलाश विजयवर्गीय जैसे वरिष्ठ मंत्री जनता के प्रश्नों को ‘घंटा’ कहकर खारिज करते हैं, तो यह संकेत होता है कि सत्ता प्रश्नों से डरने लगी है।

अंतिम आह्वान

कैलाश विजयवर्गीय द्वारा दूषित पानी से हुई मासूमों की मौत पर जो लहजा अपनाया गया, वह केवल एक बयान नहीं बल्कि सत्ता के अहंकार की पोल खोलता है। 140 करोड़ जनता के सवालों को “फोकट” या “घंटा” कहकर टालना लोकतंत्र के मूल सिद्धांतों के खिलाफ है।

इसलिए आज हम सबको मिलकर एक सशक्त आवाज़ उठानी होगी—एक ऐसी आवाज़ जो सत्ता को याद दिलाए कि वह जनता की सेवक है, मालिक नहीं। जनता के हक और सवालों की इज्जत करना ही असली लोकतंत्र है।

जागो, बोलो और यह सुनिश्चित करो कि भविष्य में किसी मासूम की जान की कीमत पर कोई भी “घंटा” नहीं कह सके। यही हमारा अंतिम आह्वान है—जनता की ताकत की घंटी बजाओ, ताकि किसी भी सरकार को अपनी जवाबदेही भूलने का मौका न मिले।

जय माँ भारती!