
लोग खुश हैं कि वक्त बदल गया।
राम राज से रावण राज हो गया।।
बीच बाजार में शिक्षक पिट गया।
लोग खुश हैं कि वक्त बदल गया।।
लोग खुश हैं कि वक्त बदल गया।
आजादी का गान न जाने कहां खो गया।।
अपने ही देश में प्रशनचिंह बन गया।
लोग खुश हैं कि वक्त बदल गया।।
लोग खुश हैं कि वक्त बदल गया।
आंख खुलते ही हाथ में कटोरा मिल गया।।
कोला का प्याला फिर जहर साबित हो गया।
लोग खुश हैं कि वक्त बदल गया।।
लोग खुश हैं कि वक्त बदल गया।
नए संस्कृति के नशे में झूम रहे हैं।।
सूपणखा के संगीत पर लक्ष्मण को नचा रहे हैं।
लोग खुश हैं कि वक्त बदल गया।।
लोग खुश हैं कि वक्त बदल गया।
आंख बंद करके खुद को देश भक्त बता रहे हैं।।
हनुमान द्वारा राम बेचे जा रहे हैं।
लोग खुश हैं कि वक्त बदल गया........

यह कविता आज के समय पर सीधा वार करती है और झूठी खुशी की परतें उतार देती है। आप प्रतीकों से सत्ता, बाजार और आस्था की उलटबांसी दिखाते है। शिक्षक की पिटाई, आज़ादी का गुम होना और कटोरे का हाथ में आना मन को चुभता है। राम, रावण, हनुमान और सूपणखा के संदर्भ व्यंग्य को धार देते हैं।
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